ईरान के सर्वोच्च नेता आयतोल्ला अली खामेनेई की मौत हो गई है। अमेरिका-इजरायल के संयुक्त हमलों में वह शनिवार को मारे गए। 4 दशकों से ईरान की शासन व्यवस्था को संभालने वाले आयतोल्ला अली खामेनेई, अमेरिका और इजरायल की आंखों में हमेशा खटकते रहे। ईरानी रिपब्लिक ने अपने सबसे बड़े नेता को अब खो दिया है। वह अपना उत्तराधिकारी चुनकर नहीं गए थे। अब उनके उत्तराधिकार को लेकर नया संकट पैदा हो गया है।
आयतुल्ला खामेनेई ने अपने जीवनकाल में किसी भी नेता को अपना उत्तराधिकारी नहीं चुना था। अब ईरान में सर्वोच्च लीडर कौन होगा, हर किसी के मन में यही सवाल है। इजरायल और अमेरिका, ईरान के सुप्रीम नेतृत्व का विरोध करते रहे हैं। ईरान ने अपना रुख साफ कर दिया है कि इस हमले का करारा जवाब दिया जाएगा। ईरान ने कई अमेरिकी सैन्य प्रतिष्ठानों को गंभीर क्षति पहुंचाई है।
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कैसे चुने जाते हैं ईरान के सर्वोच्च लीडर?
ईरान में सुप्रीम लीडर का चुनाव 'असेंबली ऑफ एक्सपर्ट' करती है। असेंबली में 88 निर्वाचित मौलवी होते हैं। यही असेंबली नया नेता चुनेगी। यह काम 1979 में इस्लामी गणराज्य की स्थापना के बाद केवल एक बार ही हुआ था, जब आयतोल्ला रुहोल्लाह खुमैनी की मौत पर खामेनेई को जल्दबाजी में चुना गया था।
सुप्रीम लीडर के चुनाव में जल्दबाजी कर रहा है ईरान?
ईरानी शासक वर्ग स्थिरता दिखाने के लिए जल्दी से फैसला लेना चाहता है। एक्सपर्ट्स की असेंबली के सदस्य जल्द ही बैठक करने वाले हैं, लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने घोषणा की है कि हमले जारी रहेंगे। ऐसे में किसी सभा का जोखिम है। ईरान का संविधान कहता है, 'नया नेता पुरुष ही हो, राजनीतिक योग्यता हो लेकिन धार्मिक जानकारी भी हो, इस्लामी गणराज्य के प्रति वफादारी जैसे गुण अनिवार्य हैं।'
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कौन सी बात खटक रही है?
अमेरिका और इजरायल, ईरान में ऐसी सरकार चाहते हैं, जो सुधारवादी हो, उदारवादी हो और लोकतांत्रिक हो। अभी एक्सपर्ट असेंबली में पुराने मौलवी बहुतायत संख्या में हैं, ऐसे में जो भी नेता चुना जाएगा, वह उनकी विचारधारा वाला ही हो। असेंबली सुधारवादी मौलवियों को बाहर कर सकती है, जो ज्यादा सामाजिक स्वतंत्रता और वैश्विक एकता में भरोसा रखते हों। अगर ऐसा नहीं होगा तो इजरायल और अमेरिका के साथ नए नेतृत्व का भी टकराव हो सकता है।
सुप्रीम लीडर बनने की रेस में शामिल चेहरे कौन हैं? आइए जानते हैं उनके बारे में-
मोजतबा खामेनेई, जिनके पिता का दशकों शासन रहा
आयतुल्ला खामेनेई के दूसरे बेटे मोजतबा खामेनेई के हाथों में ईरान की कमान, बैक डोर से रही है। वह पर्दे के पीछे काफी प्रभावशाली रहे हैं। उनके इस्लामिक रिवॉल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) और बसिज मिलिशिया से मजबूत संबंध हैं। खामेनेई की वजह से उन्हें वैसी ही इज्जत मिलती है, जो किसी देश के राजकुमार को मिलती है। ईरान की सबसे ताकतवर संस्थाओं पर उनका नियंत्रण है। विरासत संबंधी नियमों में, शिया विद्वानों का मत बंटे हुए हैं।
मोजतबा नहीं चाहते कि सत्ता संबंधी अधिकार, पिता से बेटे को मिल जाए। ईरान से राजशाही की विदाई की एक वजह यह भी थी। ईरान में जहां राजशाही को उखाड़ फेंका गया था। एक और समस्या यह है कि मोजतबा टॉप रैंकिंग वाले इस्लामिक मौलवियों में शामिल भी नहीं हैं। उनके पास कोई आधिकारिक पद नहीं है। अमेरिका ने साल 2019 में उन पर प्रतिबंध भी लगा चुका है। उनके पिता के कातिल, इजरायल और अमेरिका हैं, ऐसे में अगर वह बने तो भी तकरार जारी रहेगा।
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अली रेजा आरफी, तकनीक के धुरंधर हैं
अलीरेजा आरफी की उम्र 67 साल है। वह कम चर्चित लेकिन दिग्गज इस्लामिक विद्वान हैं। उन पर अली खामेनेई भरोसा जताते थे। वह एक्सपर्ट्स की असेंबली के उप प्रमुख हैं। गार्जियन काउंसिल के सदस्य हैं। यही संस्था, चुनावी उम्मीदवारों की कानूनी जांच करती है। वह ईरान के मदरसा तंत्र के प्रमुख हैं। खामेनेई ने उन्हें कई अहम पदों पर नियुक्त किया था। वह राजनीतिक तौर पर उतने चर्चित नहीं हैं, सेना और IRGC के नजदीक नहीं हैं लेकिन धार्मिक नजरिए से उनका पद पड़ा है। वह टेक्नोलॉजी समझते हैं, अरबी और अंग्रेजी में लिखते हैं। 24 से ज्यादा इस्लामिक किबातें लिख चुके हैं।
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मोहम्मद मेहदी मीरबागेरी, खामेनेई से भी ज्यादा कट्टर है यह मौलाना
मोहम्मद मेहदी मीरबागेरी की उम्र 60 साल है। वह इस्लामिक कट्टरपंथ में भरोसा रखते हैं। वह एक्सपर्ट असेंबली के सदस्य हैं। वह रूढ़िवादी शासन व्यवस्था के हिमायती हैं। उन्होने गाजा में मारे गए लोगों की मौत तक को जायज ठहरा दिया था। उन्होंने कहा था, 'अल्लाह के नजदीक जाने के लिए अगर आधी दुनिया भी मर जाए तो वह सही है।' वह पश्चिम शासन व्यवस्था के कट्टर विरोधी हैं। उनका मानना है कि मुसलमानों और काफिरों के बीच जंग जरूरी है। वह कुम स्थित इस्लामिक साइंसेज एकेडमी के प्रमुख हैं।
हसन खुमैनी, जिसकी विरासत अमेरिका को सालती है
हसन खुमैनी, बाकी दावेदारों की तुलना में ज्यादा जवान हैं। 50 साल की उम्र है। वह ईरान में इस्लामिक रिपब्लिक की स्थापना करने वाले आयतोल्लाह रुहोल्लाह खुमैनी के पोते हैं। उन्हें धार्मिक तौर पर भी लोग पसंद करते हैं और उन्हें वहां के कट्टरपंथी मुसलमान असली वारिस मानते हैं। उनके पास कोई पद नहीं है।
वहां की सेना, अमीर और मुफ्तियों का उन्हें समर्थन नहीं है। वह अपने साथियों की तुलना में थोड़े कम कट्टरपंथी हैं। साल 2016 में उन्हें 'असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स' का चुनाव लड़ने से रोक दिया गया होगा।
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हाशेम होसैनी बुशेहरी, ऐसा इस्लामिक स्कॉलर, जो सबको अखरेगा
हाशेम होसैनी बुशेहरी की उम्र 60 साल है। वह विरासत से जुड़ी संस्थाओं को संभालते हैं। एक्सपर्ट ऑफ असेंबली उन पर भरोसा जताती है। वह पहले वाइस प्रेसीडेंट हैं। अली खामेनेई के बेहद करीबी थे। लो प्रोफाइल रहते हैं लेकिन सुलझे दिमाग के हैं। वह, असेंबली के आंतरिक मैनेजमेंट को सुलझाने में माहिर रहे हैं।
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ईरान और अमेरिका-इजरायल युद्ध, अब तक जो पता है
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि यह हमला तेहरान सरकार को उखाड़ फेंकने के लिए है और पूरे हफ्ते भारी बमबारी जारी रहेगी। एक हमले में ईरान में एक प्राइमरी स्कूल में 100 से ज्यादा लड़कियां मारी गईं। इसके जवाब में ईरान ने खाड़ी और पड़ोसी देशों के अमेरिकी ठिकानों पर हमला किया। इजरायल पर मिसाइलें दागीं। कई हवाई अड्डे क्षतिग्रस्त हो गए हैं, घनी आबादी वाले इलाके हिल गए हैं और तेल आपूर्ति बाधित हुई है। दुबई में भीषण तबाही मची है, उड़ानें बाधित हुईं हैं। तेहरान में खामेनेई की मौत पर जश्न मनाया जा रहा है। भारत में भी हमले के खिलाफ विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं।
