अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का दावा है कि ईरान के साथ अच्छी बातचीत चल रही है, जबकि ईरान किसी भी बातचीत से इनकार कर रहा है। उसका कहना है कि मित्र देश बातचीत की जमीन तैयार करने में जुटे हैं, लेकिन अभी तक कोई वार्ता नहीं हो रही है। कुछ विश्लेषकों का भी मानना है कि अमेरिका और ईरान के बीच अभी तक कोई प्रत्यक्ष बातचीत नहीं हुई है। मिस्र और पाकिस्तान के जरिये कुछ शुरुआती संदेश और 15 सूत्रीय युद्धविराम प्लान ही भेजा गया है।
अब सवाल उठता है कि ट्रंप की तमाम कोशिशों के बावजूद ईरान बातचीत करने को क्यों राजी नहीं हो रहा है, उसे क्या डर सता रहा है। डोनाल्ड ट्रंप का ट्रैक रिकॉर्ड कैसा है, जिससे ईरान का मौजूदा प्रशासन सतर्क है और क्यों कहा जा रहा है कि चाहकर भी अमेरिका और ईरान के बीच कोई समझौता होने की उम्मीद न के बराबर है।
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कितनी गहरी है अविश्वास की खाई?
- युद्ध शुरू होने से पहले अमेरिका और ईरान के बीच ओमान की मध्यस्थता में वार्ता हो रही थी। ट्रंप प्रशासन ने भी बताया कि बातचीत अच्छी चल रही है। ओमान के विदेश मंत्री ने भी प्रगति का उल्लेख किया। अमेरिका ने ईरान को 12 दिनों का समय दिया। 2 मार्च को वियना में अमेरिका और ईरान के बीच तकनीकी वार्ता प्रस्तावित थी। मगर दो दिन पहले 28 फरवरी को इजरायल के साथ मिलकर अमेरिका ने बमबारी शुरू कर दी। बाद में ईरान ने कहा कि अमेरिका ने बातचीत को युद्ध की तैयारी के लिए बहाने की तरह इस्तेमाल किया।
- अमेरिका और ईरान के बीच साल 2015 में परमाणु समझौता हुआ था। 2018 में ट्रंप ने अपने पहले कार्यकाल में अमेरिका को एकतरफा तौर पर समझौते से अलग कर लिया। ईरान पर यूरेनियम संवर्धित करने और समझौते का पालन न करने का आरोप लगाया। तेहरान पर दबाव बनाने की रणनीति के तहत कड़े प्रतिबंधों का ऐलान कर दिया।
- परमाणु समझौता खत्म करने के दो साल बाद डोनाल्ड ट्रंप के आदेश पर अमेरिकी सेना ने बगदाद के नजदीक एक ड्रोन हमले में आईआरजीसी के मुखिया कासिम सुलेमानी की हत्या कर दी। जवाब में ईरान ने बगदाद स्थित अमेरिकी दूतावास पर मिसाइल से हमला किया और सुलेमानी की हत्या का बदला लेने की बात कही।
- ओमान की राजधानी मस्कट में अप्रैल 2025 में ईरान और अमेरिका के बीच बातचीत का नया दौर शुरू हुआ। ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची और अमेरिका के विशेष दूत स्टीव विटकॉफ के बीच 13 जून तक कई दौर की बातचीत हुई। इसी रात को इजरायल ने ईरान के तीन परमाणु प्लांटों पर बमबारी शुरू कर दी। बाद में अमेरिकी सेना ने भी हमला किया। जवाब में ईरान ने कतर स्थित अमेरिकी बेस को निशाना बनाया। इजरायल और ईरान के बीच 12 दिनों तक जंग चली।
- हमले के करीब आठ महीने बाद फरवरी 2026 में अमेरिका ने ईरान के साथ एक और दौर की बातचीत शुरू की। ओमान की मध्यस्थता में वार्ता अच्छी चल रही थी। 26 फरवरी को आखिरी बैठक हुई। 2 मार्च को जिनेवा में तकनीकी बैठक होनी थी। अमेरिका ने ईरान से परमाणु कार्यक्रम को खत्म करने, बैलेस्टिक मिसाइल कार्यक्रम को समाप्त करने और इजरायल को मान्यता देने की मांग रखी थी। मगर ईरान ने सभी मांगों को खारिज कर दिया था। हालांकि बातचीत अच्छी दिशा में चल रही थी। 2 मार्च को बैठक से दो दिन पहले 28 फरवरी को अमेरिका-इजरायल ने हमला कर दिया।
- एक साल के भीतर दो बार मिले धोखे से ईरानी प्रशासन सतर्क है। वह फूंक फूंकर पांव रख रहा है। ईरान में बातचीत में विश्वास रखने वालों लोगों को भी अमेरिकी हमले के बाद झटका लगा है। युद्ध के माहौल में वह भी बातचीत की पहल नहीं कर सकते हैं, क्योंकि एक साल में दो बार अमेरिका उनकी सोच के विपरीत जाकर ईरान पर हमला कर चुका है।
- अमेरिका और ईरान के बीच दुश्मनी करीब चार दशक पुरानी है। ईरान में लोगों को यह विश्वास नहीं हो रहा है कि ट्रंप की पहल पर इतनी पुरानी दुश्मनी कैसे कुछ ही घंटों में समाप्त हो जाएगी। ईरान को अमेरिका के दावों पर भरोसा नहीं है। ट्रंप की रणनीति उनके शब्दों से ठीक उलट होती है। वे अक्सर बातचीत को सैन्य तैयारी करने के लिए टूल की तरह इस्तेमाल करते हैं। यही कारण है कि ईरान को लग रहा है कि ट्रंप बातचीत की इस पहल के पीछे भी कोई सैन्य रणनीति तो नहीं बना रहे हैं।
कहां-कहां फंस रहा पेच?
ईरान का कहना है कि वह परमाणु हथियार नहीं बनाएगा। मगर उसका परमाणु कार्यक्रम नागरिक उद्देश्य की खातिर है। अमेरिका चाहता है कि ईरान पूरी तरह से यूरेनियम का संवर्धन रोक दे, लेकिन ईरान को यह शर्त मंजूर नहीं है। उसका कहना है कि यूरेनियम संवर्धन करना उसका अधिकार है। ट्रंप ईरान के बैलेस्टिक मिसाइल कार्यक्रम को पूरी तरह से रोकना चाहते हैं। ईरान को यह भी स्वीकार नहीं है। ट्रंप का दावा है कि ईरान युद्ध हार चुका है। वे चाहते हैं कि ईरान सरकार उनके सामने आत्मसमर्पण करे, लेकिन यह भी तेहरान को मंजूर नहीं है। ईरान का कहना है कि युद्ध अब उसकी मर्जी से खत्म होगा।
डोनाल्ड ट्रंप के 15 सूत्रीय प्रस्ताव के जवाब में ईरान ने पांच मांगें अमेरिका को भेजी हैं। उसकी मांग है कि ईरान पर हमला और सियासी हत्याओं पर रोक लगे। ईरान पर दोबारा हमला न हो, इसके खातिर एक तंत्र बनाया जाए। युद्ध में हुए नुकसान की भरपाई हो। लेबनान में हिजबुल्लाह, गाजा में हमास और यमन में हूती के खिलाफ युद्ध रोका जाए। होर्मुज की खाड़ी पर ईरान के अधिकार को अंतरराष्ट्रीय मान्यता मिले। जैसे ईरान को अमेरिका की मांगें मंजूर नहीं, वैसे अमेरिका भी चाहकर ईरान की मांगों को नहीं मान सकता है।
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19 मार्च को सऊदी अरब की राजधानी रियाद में पाकिस्तान, मिस्र, तुर्की और सऊदी अरब के विदेश मंत्रियों ने बैठक की। इसमें युद्ध को खत्म करने के कूटनीतिक रास्तों पर बातचीत हुई। दो दिन पहले ही इजरायल ने हमले में ईरान के राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के सचिव अली लारीजानी को मार दिया। ऐसे में रियाद में बैठक करने वाले देशों के सामने यह संकट खड़ा हो गया कि वह अब ईरान में बातचीत किससे करें, क्योंकि अमेरिका के साथ बातचीत में लारीजानी भूमिका अहम थी।
अमेरिकी हमले में ईरान के सर्वोच्च नेता मोजतबा खामेनेई के पिता के अलावा कई करीबियों की जान जा चुकी है। ऐसे हालात में उनका अमेरिका के साथ बातचीत के टेबल पर आना बेहद मुश्किल है। आईआरजीसी जैसे धार्मिक सैन्य संगठन में इसका गलत संदेश जाएगा। ईरान में कट्टरपंथियों में नाराजगी बढ़ सकती है और मोजतबा की पकड़ कमजोर होगी। उन्हें अपनी पकड़ मजबूत बनाने की खातिर अपने पिता की तरह ही प्रतिशोध की आवाज को बुलंदी से उठाना पड़ेगा। इन तथ्यों के आधार पर विश्लेषकों को लगता है कि अमेरिका के साथ ईरान का हाल फिरहाल कोई समझौता होता नहीं दिख रहा है।
