अमेरिका, इजरायल और ईरान की जंग से दुनिया परेशान है। भारत जैसे बड़ी आबादी वाले देश में ऊर्जा संकट की स्थिति है। गैस के लिए लंबी कतारें लग रही हैं, तेल की कीमतों में अस्थिरता बनी हुई है। डोनाल्ड ट्रंप, ईरान के तेल भंडारों पर लगी पाबंदियां को अब हटाने का दबाव बढ़ रहा है। जंग के 3 हफ्ते हो चुके हैं और कोई नतीजा निकलता नजर नहीं आ रहा है।

ईरान ने हॉर्मुज स्ट्रेट को दुनिया के लिए बंद कर दिया है। दुनिया का 20 फीसदी तेल, यहीं से होकर गुजरता है। चीन को छोड़कर, दूसरे किसी देश तक, तेल और गैस की सप्लाई निर्बाध रूप से नहीं पहुंच रही है। इससे तेल की कीमतें बहुत तेजी से बढ़ गई हैं। यह बढ़ोतरी अभी और तेज हो सकती है। 

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क्या हैं ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमतें?

ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमत अब 112 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया है। अमेरिका में पेट्रोल की औसत कीमत 4 डॉलर प्रति गैलन के करीब है। डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन की अब मजबूरी है कि हर संभव तरीके से तेल की कमी को कम किया जाए। महंगाई और ऊर्जा संकट से अमेरिका और दुनिया पर बहुत दबाव पड़ रहा है। 

ईरान पर हमला, अमेरिका को अलग-थलग कर गया?

डोनाल्ड ट्रंप सरकार ने अमेरिका में ही पहले से स्ट्रैटेजिक रिजर्व से तेल निकाला, रूस पर कुछ पाबंदियां हटाईं और घरेलू उत्पादन बढ़ाया। तेल की कीमतें यूरोप और अमेरिका में अभी भी बहुत ज्यादा हैं। अगर ऐसा ही रहा तो अमेरिका दुनिया की नजरों में विलेन बनेगा और वैश्विक दबाव बढ़ेगा। पहले ही अमेरिकी सरकार, जंग के मोर्चे पर अलग-थलग पड़ गई है। वह कभी चीन से मदद मांग कर रहे हैं, कभी फ्रांस से, कभी नॉर्थ अटलांटिक ट्रिटी ऑर्गेनाइजेशन (NATO) से। कोई उनकी सुन नहीं रहा है।

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में खड़े जहाज। Photo Credit: PTI

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क्या है अमेरिका का प्लान?

CNN ने की एक रिपोर्ट में दावा किया है कि डोनाल्ड ट्रंप, अब ईरान के उन तेल के जहाजों पर पाबंदियां हटाने की योजना बना रहे हैं जो पहले से समुद्र में हैं। इससे करीब 140 मिलियन बैरल तेल बाजार में आ सकता है। डोनाल्ड ट्रंप, झुक रहे हैं, वजह उनकी मजबूरी भी है। ईरान में जमीनी सैन्य कार्रवाई की धमकी दे रहे ट्रंप को यह अहसास तो हो गया है कि ईरान पर हमला करके, सिर्फ उनके नहीं, पूरी दुनिया के हाथ जलेंगे। 

क्यों झुकना पड़ा है ट्रंप को?

ट्रंप प्रशासन को तेल की कीमतें जल्दी कम करनी हैं। युद्ध से तेल सप्लाई बहुत कम हो गई है। हॉर्मुज स्ट्रेट बंद होने से रोजाना बहुत सारा तेल नहीं पहुंच पा रहा। विशेषज्ञों की राय यह है कि यह तेल बाजार में अब तक की सबसे बड़ी समस्या है।

क्या किया जा चुका है?

  • अमेरिका  स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व से तेल निकाल रहा है
  • रूस के तेल पर कुछ पाबंदियां हटाईं गईं हैं
  • अमेरिका में तेल उत्पादन और ट्रांसपोर्ट तेज हुआ है
  • कीमतों पर रत्तीभर भी असर नहीं पड़ा है

अब ईरान के तेल पर क्या हो रहा है?

डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन समुद्र में मौजूद ईरानी तेल पर अस्थाई तौर पर पाबंदी हटाने का फैसला लिया है। समुद्र में ईरान का लगभग 140 मिलियन बैरल तेल है। इससे अमेरिका के सहयोगी देश तेल खरीद सकेंगे। सीधा लाभ थाईलैंड और वियतनाम जैसे देशों को होगा। अधिकारी कहते हैं कि यह तेल वैसे भी चीन को बिक जाता, लेकिन अब सहयोगी देशों को मिलेगा। इससे ईरान को थोड़ा पैसा मिलेगा। अमेरिका का कहना है कि ईरान को अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग सिस्टम से पैसे लेने में मुश्किल होगी।

डोनाल्ड ट्रंप के खिलाफ लोगों का गुस्सा बढ़ता जा रहा है। Photo Credit: PTI

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क्या कह रहे हैं अमेरिकी अधिकारी?

अमेरिका के ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट ने दावा किया है कि यह कदम ईरान के खिलाफ इस्तेमाल किया जा रहा है, जिससे कीमतें कम रहें। अमेरिका ईरान के खिलाफ 'ऑपरेशन एपिक फ्यूरी' चला रहा है। यह सैन्य ऑपरेशन, बिना किसी नतीजे के तीसरे हफ्ते में पहुंच गया है। 

ईरान पर फंस कैसे गए हैं डोनाल्ड ट्रंप?

डोनाल्ड ट्रंप ने पहले बराक ओबामा की आलोचना की थी, क्योंकि उन्होंने ईरान को पैसे दिए थे। अब उन्हें खुद ऐसा कदम उठाना पड़ रहा है। यह रिपब्लिकन के लिए शर्मंदगी की तरह है। युद्ध की वजह से अमेरिका पर आर्थिक दबाव बहुत ज्यादा है। चौतरफा आलोचना हो रही है।

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तेल पर प्रतिबंध हटाने का क्या असर होगा?

ईरान का 140 मिलियन बैरल तेल दुनिया की 1.5 दिन की खपत जितना है। इससे थोड़ी राहत मिल सकती है, लेकिन लंबे समय तक नहीं। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर हॉर्मुज स्ट्रेट जल्दी नहीं खुला तो और कड़े फैसले लेने पड़ सकते हैं। ईरान के तेल पर पूरी तरह पाबंदियां हटानी पड़ सकती है।

अब आगे क्या हो सकता है?

गैसोलीन के समर ब्लेंड पर पर्यावरण नियम हटाने पड़ सकते हैं। इस फैसले का भी असर ज्यादा नहीं होगा। डोनाल्ड ट्रंप का कहना है कि जंग खत्म होने पर तेल की कीमतें, पहले से कम हो जाएंगी। अभी तक होर्मुज खोलने का ईरान ने कोई प्लान नहीं बताया है। ईरान और खाड़ी के देशों में तेल के ठिकानों पर जो हमले हुए हैं, उनसे उबरने में महीनों लग सकते हैं, जाहिर सी बात है कि इसका खर्च भी आम जनता को उठाना होगा।