सैनिक नहीं, ड्रोन हैं 'असली' लड़ाके, तबाही के 'कारोबार' में शामिल देश कौन हैं?
अमेरिका, इजरायल और ईरान के ड्रोन भीषण तबाही मचा रहे हैं। सैनिक, महीनों के ऑपरेशन के बाद भी ऐसा नहीं कर पाते। क्या है ड्रोन का भविष्य, आइए समझते हैं।

ड्रोन। Photo Credit: Khabargaon
ईरान, इजरायल और अमेरिका। दुनिया की सारी बहसें, इन तीन देशों के इर्दगिर्द घूम रहीं हैं। इजरायल और अमेरिका मिलकर ईरान पर मिसाइलें दाग रहे हैं, जवाब में ईरान पड़ोसी देशों के साथ-साथ खाड़ी के देशों में भीषण हवाई हमले कर रहा है। जंग में न तो इजरायल, न अमेरिका, न ईरान की सेना, जमीनी कार्रवाई कर रही है। जंग मिसाइल और ड्रोन की मदद से लड़ी जा रही है। अंजाम यह हुआ है कि खाड़ी के देशों में अमेरिकी सैन्य ठिकाने तबाह हो चुके हैं, इजरायल की राजधानी यरुशलम की इमारतें तक हिल गईं हैं।
ईरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्ला अली खामनेई और सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के सचिव अली लारिजानी मारे जा चुके हैं। इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड्स कॉर्प्स (IRGC) का शीर्ष नेतृत्व खत्म हो चुका है।
हमास और इजरायल की जंग की तरह, इजरायल की सेनाएं, गाजा या रफाह में नहीं घुसी हैं। हमले हवा में हो रहे हैं। यह जंग, सैन्य कार्रवाई से कहीं ज्यादा महंगी पड़ रही है। इजरायल और अमेरिका के लिए राहत की बात यह है कि उन्हें सैन्य नुकसान कम हो रहा है, ईरान के लिए दुखद यह है कि उसकी सेना और आम नागरिक हमलों में मारे जा रहे हैं।
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पश्चिम एशिया का 'महायुद्ध' जिसमें शामिल कई देश
ईरान के स्वास्थ्य मंत्रालय ने दावा किया है कि 28 परवरी से अब तक कम से कम 1444 लोग मारे जा चुके हैं, 18551 लोग घायल हो चुके हैं। ईरान इस जंग में एकतरफा हार नहीं रहा है। वह अपनी ड्रोन और मिसाइल क्षमता की बदौलत 10 से ज्यादा देशों से एक साथ भिड़ रहा है। अमेरिका, इजरायल, सऊदी अरब, यूएई, कतर, बहरीन, कुवैत, जॉर्डन, साइप्रस, इराक और लेबनॉन जैसे देशों में अमेरिकी ठिकानों को तबाह कर रहा है। ईरान में मौतें ज्यादा हुईं हैं लेकिन घाटा अमेरिका और इजरायल का ज्यादा हुआ है।
ड्रोन vs ड्रोन की लड़ाई, कौन किस पर भारी?
द न्यूयॉर्क टाइम्स' की एक हालिया रिपोर्ट बताती है कि कैसे अमेरिका अपने मिसाइल और ड्रोन पर पानी की तरह पैसे बहा रहा है, जिसे ईरानी, सस्ते ड्रोन मारकर गिरा दे रहे हैं। ईरान के कामिकेज या शाहेद ड्रोन का मुकाबला करने में अमेरिका और इजरायल के पसीने छूट रहे हैं। एक शाहेद ड्रोन की कीमत करीब 20 हजार डॉलर से 30 हजार डॉलर के बीच में हैं, जबकि इसे गिराने के लिए अमेरिका जिन पैट्रियट मिसाइलों का इस्तेमाल कर रहा है, उनकी एक यूनिट की कीमत 4 मिलयन डॉलर तक होती है। अखबार, अमेरिका की रणनीति पर कह रहा है, 'मक्खी मारने के लिए बजूका' का इस्तेमाल किया जा रहा है।
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छोटे देशों के आगे घुटने टेक रही महाशक्तियां?
अमेरिका, दुनिया का सबसे ताकतवर देश है। पश्चिम एशिया का सबसे मजबूत देश, इजरायल है, जो मुस्लिम देशों के बीच में खड़ा है, मुस्लिम देशों को ही तबाह कर रहा है लेकिन सारे मुस्लिम देश मिलकर उसका बाल बांका नहीं कर पाते हैं। दो महाशक्तियों के साथ-साथ 7 से ज्यादा देशों से ईरान भिड़ रहा है, उन्हें तबाह कर रहा है। तबाही इतनी भीषण है कि दुबई में कई अमेरिकी ठिकानों को ईरान उड़ान चुका है।
रूस और यूक्रेन की जंग साल 2022 से चल रही है। रूस, दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी सैन्य शक्ति है। लोग दावा कर रहे थे कि एक हफ्ते में यह जंग रूस जीत जाएगा, 4 साल हो गए, रूस नहीं जीत पाया। यूक्रेन, अपने ड्रोन की ताकत, रूस के राष्ट्रपति के आधिकारिक निवास क्रेमलिन तक ड्रोन बरसा चुका है। यूक्रेन के पास तुर्की से मिले घातक ड्रोन हैं। जंग की शुरुआत से ही तुर्की के ड्रोन का इस्तेमाल, यूक्रेन कर रहा है।
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तुर्की, इसलिए यूक्रेन की मदद कर रहा है कि वह नॉर्थ अटलांटिक ट्रिटी ऑर्गेनाइजेशन (NATO) का सदस्य देश है। नाटो के देश ही परोक्ष रूप से इस जंग में रूस की मदद कर रहे हैं। ये ड्रोन, इतने सस्ते हैं कि 400 से 500 अमेरिकी डॉलर में मिल जाते हैं। दमदार इतने कि रूस के करोड़ों डॉलर से बने T-90 टैंकों और आधुनिक डिफेंस सिस्टों को तबाह कर चुके हैं। रूस को 'काला सागर' में जितने जख्म मिले हैं, यूक्रेन ने ड्रोन से ही दिए हैं।
यूक्रेन तो फिर भी बड़ा देश है। हूती विद्रोही, सऊदी अरब, अमेरिका और इजरायल को आए दिन नुकसान पहुंचाते हैं। हूती विद्रोही ईरानी तकनीक से बने सस्ते ड्रोन का इस्तेमाल करते हैं। सऊदी अरब के तेल ठिकानों पर हमले करते हैं, अमेरिकी नौसेना और इंटरनेशनल शिपिंग को कई बार निशाना बना चुके हैं। 2020 में अजरबैजान और अर्मेनिया में जंग छिड़ी थी। छोटे से देश अजरबैजान ने तुर्की के बेकर बायराकटार टीबी2 जैसे ड्रोन से भीषण तबाही मचाई थी।
अर्मेनिया के पास सोवियत काल के दौरान के बड़े टैंक और एयर डिफेंस सिस्टम हैं, इनके बाद भी अजरबैजान ने कम नुकसान के साथ अपना मकसद पूरा कर लिया था।
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ड्रोन बनाने में कौन से देश सबसे आगे हैं?
पावर एटलस, ग्लोबल फायर पावर, एयरोटाइम, WORLDOSTATS, आर्मी टेक्नोलॉजी और द डिफेंस पोस्ट जैसी एजेंसियों की रैंकिंग बताती है कि साल 2026 में भी अमेरिका, चीन, रूस, इजरायल और तुर्की जैसे देश, ड्रोन बाजार के सबसे बड़े खिलाड़ी बने हुए हैं। अमेरिका, ड्रोन तकनीक वाले देशों में सबसे ताकतवर देश बना हुआ है। अमेरिका से पास तकनीक भी है और सबसे बड़ा ड्रोन बेड़ा भी।
अमेरिका: कहकर मारता है फिर भी लोग पकड़ नहीं पाते
ड्रोन तकनीक का यह देश बादशाह है। हजारों यूनिट्स हैं, 'MQ-9 रेपर' और 'RQ-4 ग्लोबर हॉक' जैसे ड्रोन महंगे ड्रोन हैं, जिन्हें 60 हजार फीट की ऊंचाई पर 30 घंटे से ज्यादा समय तक उड़ाया जा सकता है। ये ड्रोन, स्टेलत्थ तकनीक से लैस होते हैं, जिन्हें रडार पकड़ नहीं पाता है। सेटेलाइट कंट्रोल में इतने सटीक हैं कि ईरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्ला अली खामेनेई मर भी गए और ड्रोन को ईरान का रडार सिस्टम पकड़ तक नहीं पाया। तेहरान में घुसकर उन्होंने अली खामेनेई को मारा लेकिन इसे न्यूट्रल में करने में ईरान नाकाम रहा। ये डिफेंस सिस्टम को चकमा देने में माहिर हैं।
चीन: खतरनाक कारोबारी, जो बचाता रहा कई देशों की लाज
ड्रोन शक्ति में चीन दुनिया का दूसरा सबसे ताकतवर देश है। उत्पादन में अमेरिका को भी यह देश पीछे छोड़ता है। 8 हजार से से ज्यादा सक्रिय ड्रोन, चीन में हमेशा तैयार रहते हैं। चीन न केवल ड्रोन अपने लिए बनाता है, दूसरे देशों को बेचता भी है। चीन के पास 'विंग लूंग II' और 'CH-5 रेनबो' जैसे ड्रोन हैं, जो ताकत में अमेरिकी ड्रोन को टक्कर दे सकते हैं। चीन दुनिया के 30 से ज्यादा देशों को ड्रोन बेचता है। पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे देश, ड्रोन के लिए इसी पर निर्भर हैं।
तुर्की: पहला देश, जिसने जंग का तरीका ही बदल दिया
तुर्की का आधिकारिक नाम अब तुर्किए है। यह देश, सस्ते ड्रोन बनाने में माहिर है। 5 साल की मेहनत से इस देश ने अपनी रैंकिंग ऐसे सुधारी है कि अब फ्रांस और ब्रिटेन जैसे देशों से कहीं ज्यादा आगे है। तुर्की ड्रोन का सबसे बड़ा व्यापारी बन रहा है। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत में जिन ड्रोन के दम पर पाकिस्तान हमले कर रहा था, वे तुर्की और चीन मेड थे। तुर्की ही बायराकटार टीबी2 बनाता है, जिसने अकेले, तुर्की को 'ड्रोन सुपरपावर' में बदल दिया है। कम कीमत में आने वाले ये ड्रोन, दुश्मनों पर काल बनकर टूटते हैं।
इजरायल: हर तरफ दुश्मन, फिर भी अजेय है
इजरायल, नई ड्रोन तकनीक का जन्मदाता कहा जा रहा है। इजरायल के पास 'हेरोन टीपी' और 'हर्मेस 900' जैसे घातक ड्रोन हैं। इजरायली ड्रोन, अपनी जासूसी क्षमताओं और रडार सिस्टम से बचने की क्षमताओं की वजह से बेहद घातक होते हैं। आलम यह है कि भारत जैसे बड़े देश भी इजरायल से ड्रोन खरीदते हैं। इजरायल, रक्षा क्षेत्र में भारत का बड़ा भागीदार है। एक दशक में भारत और इजरायल, आर्थिक और सामरिक रूप से और करीब आए हैं।
ईरान: एक साथ 12 मुल्कों से भिड़ने वाला देश
विश्वयुद्ध के बाद, ऐसा मौका कभी नहीं आया कि किसी जंग में 2 या 3 से ज्यादा देश शामिल हों। ईरान, इजरायल और अमेरिका की जंग में, 12 देशों पर गाज गिरी है। खाड़ी के जिन देशों में अपनी सेनाओं के सैन्य बेस अमेरिका ने बनाए थे, ईरान उन्हें बड़ी क्षति पहुंचा रहा है। इस जंग में कुवैत, बहरीन, UAE और दुबई पर जैसा कहर टूटा है, महीनों की जंग में जमीनी लड़ाई लड़कर ऐसा नहीं किया जा सकता था। ईरान अपने ड्रोन से हमले कर रहा है।
ईरान के सस्ते आत्मघाती ड्रोन, इजरायल और अमेरिका की नाक में दम कर रहे हैं। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में अमेरिका जो भी गंवा रहा है, वह इन्हीं ड्रोन की बदौलत हो रहा है। ईरान ने वैश्विक प्रतिबंधों के बाद भी अपनी ड्रोन क्षमताएं विकसित की हैं। ईरान के पास 'शाहेद' जैसे ड्रोन हैं, जो भीषण तबाही मचाते हैं।
ईरान सैकड़ों ड्रोन एक साथ दागता है। किसी भी देश की एयर डिफेंस सिस्टम भ्रम में पड़ जाता है कि किसे पहले गिराएं। इतने बड़े पैमाने पर लक्षित हमले होते हैं, जिन्हें न इजरायल का डिफेंस सिस्टम रोक पाता है, न अमेरिका का। यह तकनीक 'स्वार्म' कहलाती है, ईरान इसका बेताज बादशाह साबित हो रहा है।
कितने तरह के होते हैं ड्रोन?
- गाइडेड ग्लाइड बम: खतरनाक हथियार है, जिनका इस्तेमाल ड्रोन की तरह भी हो सकता है। हवा में उड़ते हैं, रिमोट या GPS कंट्रोल के जरिए तय निशाने को भेद सकते हैं।
- टारगेट ड्रोन: इस्तेमाल सेना युद्धाभ्यास में करती है। असली विमान के बदले इन ड्रोनों पर निशाना लगाकर मिसाइलों या हथियारों का परीक्षण किया जाता है।
- डिकॉय ड्रोन: दुश्मन की रडार पर ऐसे ड्रोन नजर नहीं आते हैं। ये राडार पर असली लड़ाकू विमान की तरह दिखते हैं, दुश्मन का ध्यान इन पर जाता है और मिसाइलें इन्हें निशाना बनाती हैं।
- रिसर्च ड्रोन: इनका इस्तेमाल वैज्ञानिक करते हैं। मौसम की जानकारी हासिल करना, विजिलेंस, निगरानी, उड़ान तकनीकों की पर्तें सुलझाना, ऐसे ड्रोन का मकसद है। जानकारी जुटाना, वन्यजीवों की निगरानी करना या नई उड़ान तकनीकों का परीक्षण करना।
- जासूसी ड्रोन: सीमा पर ऐसे ड्रोन का इस्तेमाल ज्यादा होता है। कैमरों और सेंसर से लैस ये ड्रोन, दुश्मन के इलाकों का पूरा खाका खींच लाते हैं। चुपके से जानकारियां लाते हैं, खुफिया जानकारियां हासिल करते हैं।
- कॉम्बेट ड्रोन: ईरान, जिन ड्रोन के जरिए पश्चिम एशिया के देशों में तबाही मचा रहा है, ये ड्रोन वही हैं। इनकी अलग-अलग रेंज होती है। ईरान की ड्रोन क्षमताओं की त्रासदी दुनिया देख रही है। जमीन से लेकर आसमान तक, ईरान तबाही मचा रहा है।
अतीत से आज तक का सफर क्या है?
'अनमैन्ड एविएशन, अ ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ एनमैन्ड एरियल व्हीकल्स' में लॉरेंस आर न्यूक लिखते हैं, '19वीं सदी में जब लोग पहले-पहल हवाई जहाज बनाने की कोशिश कर रहे थे, तब उन्होंने छोटे-छोटे मॉडल बनाए और उड़ाए। केली और स्ट्रिंगफेलो जैसे वैज्ञानिकों के बनाए गए जहाज, बड़े हवाई जहाज बनाने से पहले टेस्ट करने के लिए इस्तेमाल होते थे।'
शुरुआत में ये मॉडल बड़े और इंसानों द्वारा उड़ाए जाने वाले विमानों के परीक्षण के लिए बनाए गए थे। समय के साथ ये तकनीक विकसित हुई और आज 'एरियल टॉरपीडो' से लेकर आधुनिक जासूसी और अनमैन्ड कॉम्बेट एयर व्हीकल (UCAV) तक का सफर तय कर चुकी है। 1990 के दशक में 'UAV' शब्द लोकप्रिय हुआ, जिसने पुराने रिमोटली पायलटेड व्हीकल की जगह ली। जिसे दुनिया आज क्रूज मिसाइल के नाम से जानती है, उसकी शुरुआत भी एक एयरियल टॉरपीडो से हुई थी।
कितना बड़ा है ड्रोन का बाजार?
'ग्रैंड व्यू रिसर्च' की एक रिपोर्ट में यह अनुमान जताया गया है कि साल 2025 में वैश्विक 'मिलिट्री ड्रोन मार्केट' करीब 47.38 अरब अमेरिकी डॉलर का था। साल 2033 तक, यह 99.24 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है। दुनिया अब AI, मशीन लर्निंग, सेल्फ नेविगेशन जैसी तकनीक पर काम कर रहा है।
भविष्य के ड्रोन, रीयल-टाइम फैसले लेंगे, स्वार्म ऑपरेशन करने में सक्षम होंगे। ड्रोन को हथियार से विजिलेंस तक के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है, इनकी रेंज बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है। और लंबी दूरी की निगरानी संभव बना रही है।
सीमा सुरक्षा, एंटी टेरर ऑपरेशन, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर तकनीक पर ड्रोन कंपनियां जोर दे रहीं हैं। भारत, चीन और जापान जैसे देश, इस सेक्टर में क्षेत्रीय तनाव की वजह से और निवेश बढ़ा रहे हैं। यूरोप में NATO के देश भी बढ़ती जरूरतों की वजह से ड्रोन तकनीक विकसित करने पर जोर दे रहे हैं।
मिलिट्री ड्रोन बनाने वाली प्रमुख कंपनियां कौन सी हैं?
अमेरिकी कंपनियां, जिन्हें ड्रोन बनाने में महारत हासिल है
- जनरल एटॉमिक्स: MQ-9 रीपर और प्रिडेटर ड्रोन पूरी दुनिया में मशहूर हैं।
- नॉर्थरोप ग्रमॅन: यह कंपनी RQ-4 ग्लोबल हॉक जैसे ड्रोन बनाती है।
- लॉकहीड मार्टिन: RQ-170 सेंटिनल जैसे स्टील्थ ड्रोन यह कंपनी बनाती है।
- एयरोवाइरन्मेंट: स्विचब्लेड जैसे आत्मघाती ड्रोन, यही कंपनी बनाती है।
तुर्की कंपनियां, जिनका दुनिया में दबदबा
- बायकर टेक: सबसे सफल ड्रोन बायराकतार TB2 यही कंपनी बनाती है।
- टर्किश एयरोस्पेस इंडस्ट्रीज: अंका और अक्सुंगुर जैसे ड्रोन, TAI ही बनाती है।
इजरायली कंपनियां, जिनका खरीदार भारत भी है
- इजरायल एयरोस्पेस इंडस्ट्रीज: भारतीय सेना हेरॉन ड्रोन का इस्तेमाल करती है।
- एल्बिट सिस्टम्स: यह कंपनी हर्मिस सीरीज के ड्रोन बनाती है। भारत भी खरीदार है।
चीन, कॉम्बैट ड्रोन का सबसे बड़ा सप्लायर
- चाइना एयरोस्पेस साइंस एंड टेक्नोलॉजी कॉर्प: यह कंपनी CH (रेनबो) सीरीज के ड्रोन बनाती है।
- एविएशन इंडस्ट्री कॉर्पोरेशन ऑफ चाइना: यह कंपनी विंग लूंग सीरीज के कॉम्बैट ड्रोन बनाती है।
रूस, स्टील्थ कॉम्बैट ड्रोन पर दे रहा है जोर
- सुखोई: यह S-70 ओखोटनिक-B जैसा भारी स्टील्थ कॉम्बैट ड्रोन विकसित कर रही है।
- क्रोनश्टाट ग्रुप: ओरियन ड्रोन यही कंपनी बनाती है।
इस रेस में भारत का हाल क्या है?
भारत ड्रोन बनाने की रेस में अभी बहुत पीछे है। हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL), मिलिट्री ड्रोन प्रोजेक्ट पर काम कर रहा है। आइडिया फोर्ज, सेना के लिए विजिलेंस ड्रोन बनाता है। अअदाणी डिफेंस एंड एयरोस्पेस, इजरायल के साथ मिलकर हर्मिस सिरीज के ड्रोन बनाने की तैयारी में है। टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स मिलिट्री विजिलेंस और अटैकिंग ड्रोन पर काम कर रहा है।
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