नेपाल में हुए आम चुनावों के बाद राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (RSP) सरकार बनाने जा रही है। पार्टी के नेता बालेंद्र शाह, 'जेन जी' क्रांति के बाद सबसे बड़े नेता बनकर उभरे थे, अब उन्हीं के हाथों में नेपाल की बागडोर जाने वाली है। वामपंथी,सेक्युलर और उदार राजनीति से अलग हटकर, बालेंद्र शाह की राजनीति राष्ट्रवादी ढर्रे पर चलने वाली है। वह अमेरिका, चीन और भारत के खिलाफ कई बार आपत्तिजनक बयान दे चुके हैं।
 
नेपाल में मार्क्सवादी सरकारें रही हैं। राजा वीरेंद्र वीर शाह बिक्रम बीर की हत्या के बाद, नेपाल में राजनीतिक अस्थिरताजम गई थी। नेपाल में मार्क्सवादी-माओवादी सरकारें रहीं, जिनका झुकाव, भारत के खिलाफ ही रहा। चाहे पुष्प कुमार दहल प्रचंड हों या केपी शर्मा ओली, हर मौके पर इन नेताओं ने भारत विरोधी बयान दिए हैं। ऐसे में बालेंद्र शाह की अब तक की नीति, क्यों लोगों को परेशान कर रही है, आइए समझते हैं-

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भारत और नेपाल का विवाद क्या है?

भारत और नेपाल करीब 1,751 किलोमीटर लंबी सीमा साझा करते हैं। भारत के 5 राज्य नेपाल की सीमा से सटे हुए है। सिक्किम, पश्चिम बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड। दोनों देशों के बीच धर्म, भाषा, संस्कृति और वैचारिक एकता तो है लेकिन जमीनों को लेकर तकरार भी है। भारत और नेपाल के बीच सीमा विवाद लंबे समय से चले आ रहे हैं। 19वीं शताब्दी से इन विवादों का निपटारा न अंग्रेज कर पाए, न ही आजाद भारत की सरकारें। भारत और नेपाल के बीच अब कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा को लेकर विवाद है। नेपाल कहता है कि भारत ने इन क्षेत्रों पर कब्जा किया है। राष्ट्रवादी सरकार आने पर यह टकराव और बढ़ सकता है।

कैसे भारत की मुश्किलें बढ़ाता है नेपाल का राष्ट्रवाद?

साल 2020 में नेपाल ने एक नक्शा जारी किया। नए नक्शे में भारत के इन क्षेत्रों को अपना क्षेत्र दिखा दिया। भारत में चिंता बढ़ गई, क्योंकि ये वही इलाके हैं, जो भारत के लिए सामरिक नजरिए से बेहद अहम हैं। इनमें से कुछ भारत और चीन सीमा के पास हैं, जहां भारत पूरी तरह से नियंत्रण चाहता है। राष्ट्रवादी सरकार उभरने से इन विवादों के फिर से भड़कने की आशंका है।

नेपाल में धुर राष्ट्रवादियों का एक धड़ा ऐसा भी है, जिसके इशारे पर नेपाल में भारत-विरोधी प्रदर्शन होते हैं। यह द्विपक्षीय संबंधों को तनावपूर्ण बना रहा है। यह भारत के लिए खतरा इसलिए है क्योंकि इससे क्षेत्रीय अस्थिरता बढ़ सकती है। चीन को हस्तक्षेप का मौका मिल सकता है। 

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पहाड़ी बनाम मधेशियों का टकराव

नेपाल के मधेशी समुदाय के झुकाव भारत की ओर रहा है। इस समुदाय के साथ भारत का रोटी-बेटी का संबंध रहा है। नेपाल की कुल आबादी का 25 फीसदी से ज्यादा हिस्सा मधेशी समुदाय का है। नेपाल के राष्ट्रवादियों को यह बात अखरती रही है। उनका आरोप है कि पहाड़ियों का प्रतिनिधित्व सरकार में ज्यादा है, सत्ता और संसाधनों पर पहाड़ियों का नियंत्रण है। सेना और पुलिस जैसे क्षेत्रों में मेधेशियों का प्रतिनिधित्व बहुत कम है। पहाड़ी मानते हैं कि मधेशी, भारत समर्थक हैं, जिसकी वजह से अनबन और बढ़ जाती है। 

नेपाल का चीन प्रेम भी भारत के लिए रणनीतिक संकट

भारत और चीन जैसी दो महाशक्तियों के बीच नेपाल एक बफर राज्य है। पहाड़ी क्षेत्रों के राष्ट्रवादी तत्वों की नीतियां, चीन के करीब उसे ले जाती हैं। मधेशियों का राष्ट्रवाद भारत के प्रति झुकाव वाला है, वहीं पहाड़ियों का राष्ट्रवाद इससे ठीक अलग। भारत, चीन की बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) के तहत नेपाल में इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स, जैसे पोखरा एयरपोर्ट और क्रॉस-बॉर्डर रेलवे जैसी पहल का विरोध करता है। ये भारत के सीमावर्ती इलाके हैं, जहां चीन को बुलाना, मतलब भारत की परेशानी बढ़ाना है। 

 

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भारत विरोधी रंग कैसे लेता है नेपाल का राष्ट्रवाद?

नेपाल में राष्ट्रवाद अक्सर भारत-विरोधी भावनाओं की तरह नजर आता है। भारत पर आर्थिक निर्भरता, राजनीतिक हस्तक्षेप और  'बिग ब्रदर सिंड्रोम' के लिए दोषी माना जाता है। भारत नेपाल के आंतरिक विषयों में कभी हस्तक्षेप नहीं करता है लेकिन किसी भी विदेशी हस्तक्षेप का पक्षधर भी नहीं है।  

साल 2022 में हुए नेपाल चुनाव में 60 फीसदी से ज्यादा पार्टियों ने सीमा विवाद का इस्तेमाल, भारत विरोधी सुरों को हवा देने के लिए किया है। यह भारत और नेपाल के दशकों पुराने संबंधों के लिए खतरा रहा है। इस मनमुटाव का चीन जैसे देश फायदा लेते हैं।  

बालेंद्र शाह का भारत पर रुख क्या है?

बालेंद्र शाह, तब अचानक चर्चा में आए थे, जब साल 2023 में भारत के नए संसद भवन में 'अखंड भारत' के भित्तिचित्र के जवाब में, उन्होंने अपने मेयर कार्यालय में 'ग्रेटर नेपाल' का नक्शा लगाया था। उन्होंने इस नक्शे में यूपी, बिहार और उत्तराखंड के कुछ हिस्सों को नेपाल का हिस्सा दिखा दिया था।

 

प्रभास की बहुचर्चित फिल्म 'आदिपुरुष' में सीता को 'भारत की बेटी' बताए जाने पर उन्होंने काठमांडू में सभी भारतीय फिल्मों पर प्रतिबंध लगा दिया था। आदिपुरुष काठमांडू में रिलीज ही नहीं हो पाई थी। 

 

बालेंद्र शाह की राजनीति अभी, भारत, चीन और अमेरिका जैसे बड़े देशों के प्रभाव अलग है। वह 'नेपाल प्रथम' की राजनीति पर चलते हैं। वह खुद मधेशी पृष्ठभूमि से आते हैं लेकिन खुद को पहाड़ी के तौर पर पेश करते हैं।