प्लास्टिक के पर्यावरण पर पड़ने वाले नुकसान के बारे में लगभग सभी जानते हैं और यह लंबे समय से वैज्ञानिक शोध का अहम विषय रहा है। हम देख रहे हैं कि प्लास्टिक नदियों, हवा और जमीन को धीरे-धीरे जहरीला बना रहा है। वैज्ञानिकों के अनुसार, प्लास्टिक सिर्फ प्राकृतिक पर्यावरण ही नहीं बल्कि हमारी सेहत और दवाओं की प्रभावशीलता के लिए भी खतरा बनता जा रहा है। विज्ञान में इस समस्या को ‘प्लास्टिस्फियर’ और ‘हवाई माइक्रोप्लास्टिक’ के खतरनाक मेल के रूप में बताया जाता है।
इसी से जुड़ा एक नया अध्ययन सामने आया है, जिसमें कहा गया है कि प्लास्टिक की सतह पर पनपने वाले वायरस एंटीबायोटिक रेसिस्टेंस को फैलाने में अहम भूमिका निभा सकते हैं। इससे न केवल इंसानों की सेहत बल्कि पूरे पर्यावरण के लिए भी एक नया और गंभीर खतरा पैदा हो रहा है।
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हवा में मौजूद प्लास्टिक
हम अक्सर यह मानते हैं कि प्लास्टिक प्रदूषण केवल समुद्र या मिट्टी तक ही सीमित है, लेकिन अब यह हमारी सांसों के साथ हवा में भी मौजूद है। इसका मुख्य कारण सिंथेटिक कपड़े जैसे पॉलिएस्टर, टायरों का घिसना और प्लास्टिक कचरे का छोटे-छोटे टुकड़ों में टूटना है। ये कण इतने सूक्ष्म होते हैं कि नाक के बालों और फेफड़ों के प्राकृतिक फिल्टर को पार कर सीधे खून तक पहुंच सकते हैं।
वैज्ञानिकों के अनुसार, हवा में मौजूद ये प्लास्टिक कण वायरस और बैक्टीरिया के लिए एक तरह की 'फ्री टैक्सी' का काम करते हैं। पानी या मिट्टी की तुलना में रोगाणु प्लास्टिक की सतह पर अधिक समय तक जीवित रह पाते हैं। ये कण उन्हें हमारे फेफड़ों के उन गहरे हिस्सों तक पहुंचा देते हैं, जहां वे सामान्य रूप से नहीं पहुंच पाते।
कैसे फैलाते हैं प्रतिरोधक
प्लास्टिस्फीयर में जब एक ही जगह पर बड़ी संख्या में बैक्टीरिया जमा हो जाते हैं, तो उन पर एंटीबायोटिक दवाओं और प्रदूषकों का दबाव पड़ता है। ऐसे हालात में कुछ खास जीन बैक्टीरिया को और मजबूत बना देते हैं, जिससे दवाओं के असर से बचने वाले बैक्टीरिया तेजी से बढ़ने लगते हैं। अध्ययन में यह भी सामने आया है कि वायरस बैक्टीरिया के बीच जीनों का आदान-प्रदान आसानी से करा सकते हैं। इससे बीमारियों का फैलाव और भी आसान हो जाता है। इतना ही नहीं, कुछ वायरस ऐसे जीन भी अपने साथ लेकर चलते हैं जो हर तरह की परिस्थितियों में बैक्टीरिया को जीवित रहने में मदद करते हैं।
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पानी और मिट्टी में भूमिका
रिसर्च में यह भी सामने आया है कि वायरस अपने आसपास के पर्यावरण के अनुसार अपना व्यवहार बदल लेते हैं। पानी में मौजूद प्लास्टिक पर पाए जाने वाले वायरस अलग तरह से सक्रिय होते हैं जबकि मिट्टी में मौजूद वायरस का असर अलग होता है। पानी में ये वायरस बीमारियां फैलाने में तेजी से काम करते हैं। वहीं, मिट्टी में मौजूद कुछ वायरस बैक्टीरिया को नष्ट कर उनके फैलाव को कम करने में भी मदद कर सकते हैं।
खुद को कैसे बचा सकते हैं?
हवा से प्लास्टिक को पूरी तरह हटाना मुश्किल है लेकिन कुछ कदम उठाए जा सकते हैं-
- नायलॉन या पॉलिस्टर के बजाय सूती या ऊनी कपड़ों का अधिक उपयोग करें।
- अच्छी गुणवत्ता वाले HEPA फिल्टर वाले प्यूरीफायर माइक्रोप्लास्टिक को रोकने में सक्षम होते हैं।
- घरों में सूखे झाड़ू के बजाय गीला पोंछा लगाएं ताकि हवा में तैरते प्लास्टिक के कण जमीन पर बैठ जाएं और सांस में न जाएं।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने 'रोगाणुरोधी प्रतिरोध' (AMR) को दुनिया के लिए 10 सबसे बड़े वैश्विक स्वास्थ्य खतरों में से एक माना है। प्लास्टिक इसमें ईंधन का काम कर रहा है। वैज्ञानिकों का कहना है कि आगे इस संबंध में और अध्ययन किए जाने चाहिए ताकि यह समझा सके कि प्लास्टिक पर वायरस और बैक्टीरिया जीन का आदान-प्रदान कैसे करते हैं।
