सियासत में ऐसा कम होता है कि कोई नेता 'हर किसी से दोस्ती, ना काहू से बैर' का रवैया अपनाए। लोग सियासी दुश्मनी को, निजी दुश्मनी में तब्दील कर लेते हैं। अजित पवार, सियासत के अपवाद थे। महाराष्ट्र में उनके सीनियर नेता भी उन्हें 'दादा' बुलाते थे। पक्ष हो या विपक्ष, अजित पवार से व्यक्तिगत तौर पर सबके अच्छे रिश्ते थे। महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री अजित अनंतराव पवार की बारामती विमान हादसे में मौत हो गई है।
अजित पवार अपने चाचा शरद पवार से प्रभावित होकर राजनीति में आए और फिर छा गए। उनकी पहली पहचान यह रही कि वह शरद पवार के भतीजे हैं, दूसरी पहचान यह थी कि वह कई बार महाराष्ट्र के उप मुख्यमंत्री रहे लेकिन कभी मुख्यमंत्री नहीं बन पाए। अजित पवार, शरद पवार के भाई अनंतराव पवार के बेटे थे।
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जब परिवार में सब ठीक हुआ, जान गंवा बैठे
अजित पवार, नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी के मुखिया थे। अपने चाचा की पार्टी से अलग होकर उन्होंने साल 2022 में अपनी नई राजनीति शुरू की थी। जीवन के अंतिम काल में उनके रिश्ते अपने चाचा से फिर ठीक हो गए थे। महाराष्ट्र निकाय चुनावों में उन्होंने साथ मिलकर चुनाव लड़ा था। बहन सुप्रिया सुले के साथ उनके रिश्ते भी संभल गए थे। अब जब पवार परिवार में सब ठीक था, उनकी मौत हो गई।
कैसे सियासत में छाए अजित पवार?
शरद पवार महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री रहे हैं। उन्होंने साल 1999 में कांग्रेस से अलग होकर नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी (NCP) बनाई थी। यहीं से अजीत पवार के राजनीतिक जीवन ने करवट बदली और महाराष्ट्र के अजात शत्रु बनते चले गए। शरद पवार, अपने भतीजे अजित पवार को गठबंधन की सरकारों में राज्य में प्रितनिधित्व देते गए, हर बार उन्हें डिप्टी सीएम बनाते रहे।
अजित पवार का जन्म 22 जुलाई 1959 हुआ था।
महाराष्ट्र की सियासत में उन्हें लोग दादा के नाम से जानते हैं। उन्होंने महाराष्ट्र विधानसभा में कई भूमिकाएं निभाईं। कभी नेता विपक्ष रहे, कभी सरकार के सबसे बड़े चेहरों में से एक। उन्होंने जब दुनिया को अलविदा कहा, तब वह डिप्टी सीएम थे। अजित पवार साल 2022 से लेकर 2023 तक, महाराष्ट्र में नेता प्रतिपक्ष थे, लेकिन उन्होंने 2022 में गठबंधन किया और सरकार में आ गए। उनके देवेंद्र फडणवीस से रिश्ते बहुत अच्छे रहे हैं। सबसे ज्यादा उनके नाम महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बनने का रिकॉर्ड है।
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राजनीति कैसे शुरू हुई?
अजित पवार का गढ़ बारामती था। साल 1991 में उन्होंने अपने राजनीतिक पारी की यहां से शुरुआत की, सांसद बने। वह खुद लड़कर यहां से कभी नहीं हारे हैं। देवलाली परवरा में जन्मे अजित पवार, अपने चाचा के साथ परछाईं की तरह साथ रहे। अजित पवार ने साल 1982 में पहली बार को-ऑपरेटिव सूगर फैक्ट्री के एक बोर्ड का चुनाव लड़ा था। शरद पवार के भतीजे थे, चुनाव जीत गए। साल 1991 में वह पुणे जिला सहकारी बैंक के चेयरमैन बने।
16 साल तक उन्होंने यह पद संभाला। साल 1991 में पहली बार वह बारामती संसदीय क्षेत्र सांसद बने। उन्होंने चुनाव तो जीता लेकिन यह सीट अपने चाचा शरद पवार के लिए छोड़ दी। तब पीवी नरसिम्हा राव की सरकार में उन्हें रक्षा मंत्रालय की जिम्मेदारी मिलने वाली थी। बारामती पवार परिवार की सुरक्षित सीट थी तो अजित पवार ने पीछे हटने का फैसला किया।
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बारमती से क्यों अजित पवार को था इतना प्यार?
अजित पवार 8 बार बारामती से विधायक चुने जा चुके हैं। साल 1991 में मिली जीत की शुरुआत, साल 1995, 1999, 2004, 2009 और 2014 तक लगातार चली। वह साल 1991 से लेकर 1992 तक के बीच सुधाकर राव नाइक की सरकार में कृषि मंत्री भी रहे।
साल 1992 में वह मृदा संरक्षण और ऊर्जा योजना मंत्री बने। साल 1999 में अजित पवार कांग्रेस और एनसीपी के गठबंधन सरकार में कैबिनेट मंत्री बने और उन्होंने ग्रामीण विकास मंत्रालय का कार्यभार संभाला।
साल 2003 में सुशील कुमार शिंदे मुख्यमंत्री बने। अजित पवार को उन्होंने अपने कैबिनेट में शामिल किया। साल 2004 के विधानसभा चुनावों में भी वह जीते तो फिर उन्हें मंत्रालय मिला। उन्हें एक बार फिर जल मंत्रालय की कमान मिली। अशोक चह्वाण जब मुख्यमंत्री बने तो भी अजित पवार का कद बढ़ा।
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कितनी बार डिप्टी सीएम रहे अजित पवार?
- नवंबर 2010 से नवंबर 2011: पृथ्वीराज चव्हाण मुख्यमंत्री थे। कांग्रेस-एनसीपी की साझा सरकार में पहली बार अजित पवार डिप्टी सीएम बने।
- 2011-2014: पृथ्वीराज चव्हाण दोबारा सीएम बने। अजित पवार डिप्टी सीएम रहे। इसके बाद लंबे अरसे तक डिप्टी सीएम बनने के लिए तरसे।
- जून 2019: देवेंद्र फडणवीस ने एनसीपी के साथ गठबंधन की कोशिश की थी। बगावत वाली इस सरकार में अजित पवार डिप्टी सीएम रहे। बस यह कार्यकाल 80 घंटे से भी कम वक्त तक रहा।
- दिसंबर 2019 से जून 2022: उद्धव ठाकरे ने एनडीए गठबंधन से अलग होकर महा विकास अघाड़ी बनाई। शिवसेना, एनसीपी और कांग्रेस की साझा सरकार में वह डिप्टी सीएम रहे।
- जुलाई 2023 से नवंबर 2024: एकनाथ शिंदे-देवेंद्र फडणवीस सरकार में शामिल होकर लगातार 5वीं बार डिप्टी सीएम बने।
- दिसंबर 2024 से जनवरी 2026 तक: देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व वाली महायुति सरकार में एकनाथ शिंदे के साथ छठी बार डिप्टी सीएम रहे। अब यह पद रिक्त है।
चाचा से अनबन क्यों हुई?
शुरुआत होती है साल 2019 से। महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव के नतीजे आए। शिवसेन रूठ गई, उद्धव ठाकरे अड़ गए कि मुख्यमंत्री वही रहेंगे। देवेंद्र फडणवीस इसके लिए तैयार नहीं हुई। बीजेपी के पास 105 सीटें थी तो सीएम पद भी पार्टी अपने पास रखना चाहती थी। शिवसेना के पास 56 सीटें थीं। उद्धव ठाकरे की वजह से गठबंधन टूटा तो देवेंद्र फडणवीस ने एनसीपी से मदद मांगी।
अजित पवार तैयार हो गए, शपथ ग्रहण तक मामला भी गया लेकिन शरद पवार ने इस फैसले को खारिज कर दिया। पहली बार अजित पवार ने शरद पवार को बिना बताए यह फैसला लिया था। किसी तरह इस अध्याय का पटाक्षेप हुआ। अजित पवार को पार्टी का साथ नहीं मिला, डिप्टी सीएम बनने के अरमान अधूरे रहे। 80 घंटों के अंदर सरकार गिर गई।
अजित पवार लौटे तो लेकिन पार्टी तोड़ने के लिए
1 दिसंबर 2019 दो वह एक बार फिर से अपनी पार्टी में लौट आए। शिवसेना, एनसीपी और कांग्रेस साथ हो गए। एमवीए की सरकार बनी। अजित पवार डिप्टी सीएम बने। 16 दिसंबर को उन्होंने अपने पद की शपथ ली। साल 2022 में जब शिवसेना में फूट पड़ी तो एकनाथ शिंदे सीएम बने। सरकार गिरने के बाद नेता विपक्ष अजित पवार बन गए।
अजित पवार ने तय किया कि अब वह सत्तारूढ़ दल के साथ रहेंगे। उन्हें लग रहा था कि सुप्रिया सुले पर ज्यादा ध्यान दिया जा रहा है, इसलिए पार्टी तोड़ ली और जुलाई 2023 में उन्होंने 40 से ज्यादा विधायकों के साथ अपनी पार्टी अलग की। 7 फरवरी 2024 को उन्हें पार्टी चिह्न भी मिल गया। शरद पवार का गुट, अब एनसीपी (एसपी) के नाम से जानी जाती है।
विवाद कौन से रहे हैं?
साल 2002 में वह जलमंत्री थे। लवासा प्रोजेक्ट में धांधली के उन पर आरोप लगे थे। सितंबर 2012 में 70 हजार करोड़ के स्कैम में फंसे। आरोप साबित नहीं हो पाया।
किरीट सोमैया ने उन पर आरोप लगाया था कि अजित पवार के परिवार के पास 100 करोड़ रुपये से ज्यादा बेनामी संपत्ति है। साल 2020 में उन पर विदर्भ सिंचाई स्कैम में शामिल होने के भी उन पर आरोप लगे। राज्य सहकारी बैंक स्कैम में उनका नाम खींचा गया। कई मामलों में वह साफ बरी हो गए। 2025 में पुणे के पॉश इलाके मुंधा में एक स्कैम को लेकर हंगामा हुआ। यह लैंड डील सिर्फ 300 करोड़ में हो गई, जबकि इसकी मार्केट वैल्यू कहीं ज्यादा है। यह जमीन पार्थ पवार की कंपनी अमाडिया एंटरप्राइजेज को बेची गई थी। इसे लेकर खूब हंगामा हुआ।
