इस समय देश में तमाम मुद्दों के बीच विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षण संस्थानों के लिए लाया गया नया नियम बड़ा मुद्दा है। इसको लेकर सवर्ण समाज सड़कों पर आ गया है और समाज ने सरकार से इसे वापस लेने की मांग की है। मगर, इसी बीच गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट ने यूजीसी के नए नियमों पर रोक लगा दी है। कई याचिकाओं पर गुरुवार को सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि 2012 में जारी किए गए नियम ही लागू रहेंगे। 

 

यूजीसी के नए नियम Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations, 2026 को लेकर बवाल के बीच सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान तत्काल इस पर रोक लगा दिया। नए नियम के खिलाफ जो याचिका दायर की गई थी, उसमें सेक्शन 3 (C) को असंवैधानिक बताया गया था।

 

मगर, इस बीच सड़कों से लेकर सोशल मीडिया पर छात्र नए नियमों को लेकर मोदी सरकार के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं। इसका सबसे बड़ा एपिसेंटर उत्तर प्रदेश बना है। प्रदेश के कई जिलों में सवर्ण समाज के लोग और छात्र सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन कर रहे हैं। वे नए नियमों को वापस लेने की मांग कर रहे हैं। वहीं, इस मुद्दे को लेकर कई राजनीतिक दलों ने भी अपना स्टैंड साफ कर दिया है। इसमें सपा, कांग्रेस से लेकर बसपा तक शामिल है। ऐसे में आइए जानते हैं कि UGC के नए नियम पर विपक्ष क्या कर रहा है...

 

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अखिलेश यादव का रिएक्शन

इस पूरे विवाद पर समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने कहा, 'दोषी बचे नहीं और निर्दोष फंसे नहीं।' उन्होंने इसे बीजेपी की चाल बताते हुए कहा कि इन नियमों से पीडीए समाज को कोई राहत नहीं मिलेगी, ज्यादातर संस्थाओं पर गैर पीडीए समाज के लोग काबिज हैं। कुल मिलाकर अखिलेश यादव ने यूजीसी के नए नियमों को लेकर संतुलित बयान दिया है। वह सवर्ण और पिछड़े लोगों को नाराज नहीं करना चाहते हैं। 

 

बहुजन समाज पार्टी की मुखिया मायावती ने यूजीसी के नए नियम का विरोध करने वालों पर निशाना साधा है। उन्होंने कहा कि सामान्य वर्ग के केवल जातिवादी मानसिकता के लोगों ही इसे अपने खिलाफ भेदभाव और षडयंत्रकारी मानकर इसका विरोध कर रहे हैं। उन्होंने इस विरोध को गलत बताया। 

सावधान रहने की जरूरत- मायावती

यूपी की पूर्व सीएम ने कहा कि बसपा का यह मानना है कि इस तरह के नियमों को लागू करने के पहले अगर सभी को विश्वास में ले लिया जाता तो यह बेहतर होता और देश में फिर सामाजिक तनाव का कारण भी नहीं बनता। उन्होंने कहा, 'इस ओर भी सरकारों व सभी संस्थानों को जरूर ध्यान देना चाहिए। साथ ही, ऐसे मामलों में दलितों और पिछड़ों को भी, इन वर्गों के स्वार्थी व बिकाऊ नेताओं के भड़काऊ बयानों के बहकावे में भी कतई नहीं आना चाहिए, जिनकी आड़ में ये लोग आए दिन घिनौनी राजनीति करते रहते हैं अर्थात् इन वर्गों के लोग जरूर सावधान रहें।'

कांग्रेस का स्टैंड क्या है?

इस पूरी मुद्दे पर कांग्रेस ने मोदी सरकार और बीजेपी के ऊपर निशाना साधा है। यूपी कांग्रेस के अध्यक्ष अजय राय ने कहा, 'जिस तरह से उन्होंने अपनी नाकामी छिपाने के लिए हिंदू-मुस्लिम किया, अब यूजीसी के जरिए वे लोगों को बांटने की कोशिश कर रहे हैं। मुझे लगता है कि अब वे जाने वाले हैं। बीजेपी अपने आखिरी दौर में है। वे किसी भी तरह सत्ता में बने रहना चाहते हैं। वे हिंदुओं में फूट डालना चाहते हैं। कांग्रेस पार्टी ऐसा नहीं होने देगी, कांग्रेस के लिए सब एक हैं।'

 

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शिवसेना (UBT) का रुख

शिवसेना (UBT) नकी सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने कहा, 'शिक्षा मंत्री के मौखिक आश्वासन लिखित गाइडलाइंस के मुकाबले कानून की जांच में टिक नहीं पाएंगे, तो उनके स्पष्टीकरण का क्या फायदा। यूजीसी गाइडलाइंस का गलत इस्तेमाल नहीं होगा, इस बारे में इन मौखिक आश्वासनों के बजाय, एक मंत्री के तौर पर उन्हें इसे वापस ले लेना चाहिए।'

सीएम स्टालिन किसके साथ?

वहीं, तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने कहा यूजीसी के नए नियमों का समर्थन किया है। उन्होंने कहा, 'केंद्र सरकार को इन गाइडलाइंस या उनके मुख्य मकसद को कमजोर करने के लिए दबाव नहीं बनने देना चाहिए। जैसा कि मंडल कमीश की सिफारिशों के आधार पर आरक्षण को लागू करने के दौरान देखा गया था, मौजूदा UGC_Rollback का विरोध उसी पुरानी सोच से प्रेरित है। केंद्र सरकार को ऐसे दबाव को इन रेगुलेशंस या उनके मुख्य मकसद को कमजोर करने की इजाजत नहीं देनी चाहिए।'