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12 साल मोदी सरकार, पहली बार सड़कों पर उतरा सवर्ण समाज; इरादे क्या हैं?

सवर्ण समाज के लोग अपनी चिंताओं को लेकर मोदी सरकार के खिलाफ मुखर हैं। 12 सालों में पहली बार है कि मोदी सरकार जो नियम लेकर आई है यह समाज ना सिर्फ उसके खिलाफ हैं, बल्कि आर पार की लड़ाई लड़ने के मूड में हैं।

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नियमों के खिलाफ विरोध करते छात्र। Photo Credit- PTI

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13 जनवरी 2026 को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षण संस्थानों के लिए नए नियम लेकर आया, जिसको लेकर पूरे देश में सवर्ण समाज सड़कों पर आ गया। दरअसल, यूजीसी ने विश्वविद्यालयों में जातिगत भेदभाव को रोकने और जाति आधारित उत्पीड़न रोकने के लिए नए नियम जारी किए हैं, इन्हीं नियमों को लेकर सवर्ण समाज के लोग विरोध में कर रहे हैं। यह विरोध-प्रदर्शन सड़कों से लेकर सोशल मीडिया पर हो रहा है। 

 

सड़कों पर हो रहे प्रदर्शनों की वीडियो और फोटो सोशल मीडिया पर देखे जा सकते हैं। तमाम सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर इसके खिलाफ अभियान चलाए जा रहे हैं। यह वर्ग इन नए नियमों को सरकार से वापस लेने की मांग कर रहा है, जबकि इसके समर्थक वर्ग का मानना है कि नए नियमों के चलते विश्वविद्यालयों और शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव को रोका जा सकेगा। मगर, इन प्रदर्शनों में एक ऐसी चीज देखने को मिल रही है, जो हैरान करती है।

 

दरअसल, जो सवर्ण समाज (ब्राह्मण और राजपूत) 2014 के बाद से भारतीय जनता पार्टी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दिखा रहा था, अब वही समाज इनके खिलाफ खुलकर नारेबाजी कर रहा है। यह ऐसी नाराजगी है, जो पिछले 12 सालों (2014-26) तक नहीं देखी गई है। सवर्ण समाज की नाराजगी बीजेपी को भारी पड़ सकती है। ऐसे में आईए जानते हैं कि 12 साल पुरानी मोदी सरकार के खिलाफ सवर्ण समाज पहली बार सड़कों पर क्यों उतरा है? इस खबर में यह भी जानने की कोशिश करेंगे कि आखिर सवर्ण समाज के इरादे क्या हैं...

सुप्रीम कोर्ट ने नियम को रोका

हालांकि, यूजीसी के नियमों पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी है। कई याचिकाओं पर गुरुवार को सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि 2012 में जारी किए गए नियम ही लागू रहेंगे। सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि प्राथमिक तौर पर ये प्रावधान अस्पष्ट हैं और इनका दुरुपयोग किया जा सकता है। कई याचिकाकर्ताओं ने इन नियमों को विभाजनकारी, भेदभाव पैदा करने वाले और संविधान के खिलाफ बताया था। इन लोगों का तर्क था कि ये नियम UGC ऐक्ट, 1956 के भी खिलाफ हैं।

 

यह भी पढ़ें: UGC के नए नियमों पर सुप्रीम कोर्ट ने लगाई रोक, 2012 वाले नियम ही लागू रहेंगे

सड़कों से लेकर सोशल मीडिया पर आदोलन

बुधवार (28 जनवरी) को उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले में सैकड़ों की संख्या में सवर्ण सेना के सदस्यों ने UGC बिल के खिलाफ प्रदर्शन किया। इस दौरान प्रदर्शनकारी नारे लगाते दिखे।  प्रदर्शनकारियों ने कहा, 'मोदी तेरी कब्र खुदेगी UGC की छाती पर, मोदी तेरी हिटलर शाही नहीं चलेगी, नहीं चलेगी.... अमित शाह चोर है।' इसके बाद सवर्ण आर्मी ने अपने संगठन जिंदाबाद के नारे लगाए।

 

इसके अलावा यूजीसी के नए नियमों के विरोध में देवरिया जिले में भी बड़ी संख्या में छात्र, युवा, अधिवक्ता और सामाजिक संगठनों से जुड़े लोग सड़कों पर उतर आए। लोगों ने उग्र प्रदर्शन किया। काफी समय बाद डीएम ऑफिस के सामने देवरिया की जिलाधिकारी पहुंची और लोगों को समझाते नजर आईं, इस दौरान लोगों ने प्रधानमंत्री के खिलाफ नारे लगाए।

 

हाथों में तख्तियां लेकर और नारे लगाते हुए प्रदर्शनकारियों ने यूजीसी के नए नियमों को छात्र हितों के खिलाफ बताया। प्रदर्शनकारियों का कहना था कि नए नियमों से छात्रों के भविष्य पर बुरा असर पड़ेगा और उच्च शिक्षा को और ज्यादा कठिन बना दिया जाएगा। उन्होंने आरोप लगाया कि बिना छात्रों और शिक्षकों से व्यापक चर्चा किए ऐसे फैसले थोपे जा रहे हैं, जो बिल्कुल स्वीकार्य नहीं हैं।

 

प्रदर्शनकारियों ने चेतावनी दी है कि अगर यूजीसी के नए नियम वापस नहीं लेता है तो, आंदोलन को और तेज किया जाएगा और आने वाले दिनों में सड़कों पर बड़े स्तर पर विरोध प्रदर्शन किया करेंगे। वहीं, मृत्युंजय तिवारी नाम के एक शख्स ने यूजीसी रेगुलेशन, 2026 के रूल 3 (C) को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देते हुए कहा है कि नए नियम जातिगत भेदभाव को सिर्फ OBC और SC-ST तक सीमित करते हैं।

सवर्णों के इरादे क्या हैं?

दरअसल, इन नियमों को लेकर कई चिंताएं सामने हैं, जिनको लेकर सवर्ण छात्र परेशान हैं। इन चिंताओं की बड़ी वजह कई चीजों पर स्पष्टता नहीं है। गलत और फर्जी शिकायतों की स्थिति में क्या होगा, आपसी झगड़ों के बाद किसी ने शिकायत कर दी तो क्या होगा और किसी ने दुश्मनी निकालने के लिए जातिगत भेदभाव से जुड़ी शिकायत की गई तो क्या होगा? विरोध कर रहे लोगों का कहना है कि स्पष्टता न होने के चलते इसका दुरुपयोग किया जा सकता है।

 

 

 

 

सवर्ण छात्रों के साथ ही समाज के लोग इन्हीं चिंताओं को लेकर मोदी सरकार और बीजेपी के खिलाफ मुखर हैं। यह पहली बार है कि यह समाज 12 सालों में पहली बार मोदी सरकार जो नियम लेकर आई है ना सिर्फ उसके खिलाफ हैं, बल्कि आर पार की लड़ाई लड़ने के मूड में हैं। अगर ऐसा होता है तो इसका खामियाजा बीजेपी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को आगामी चुनावों में भेगतना पड़ सकता है। खास तौर से उत्तर प्रदेश के चुनावों में पार्टी को ब्राह्मण समाज की नाराजगी को झेलना पड़ सकता है।

 

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आखिर UGC के नए नियमों में है क्या?

प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टिट्यूट्स 2026 के नियम सभी उच्च शिक्षण संस्थानों पर लागू होंगे। इन संस्थानों में पढ़ने वाले छात्रों के साथ-साथ टीचर और स्टाफ भी इसकी जद में आएंगे। इसका मकसद किसी भी छात्र, स्टाफ या टीचर के खिलाफ जाति आधारित भेदभाव को होने से रोकना है। साथ ही, किसी व्यक्ति के सम्मान और शिक्षण संस्थान के सम्मान की रक्षा की जा सके।

 

इसमें बड़ा बदलाव किया गया है कि पहले जातिगत भेदभाव की परिभाषा में सिर्फ SC-ST थे, अब ओबीसी को भी शामिल कर लिया गया है। यानी अगर इन समुदायों के लोगों से भेदभाव होता है तो कार्रवाई की जाएगी। पहली चिंता यही है कि जब 2012 के नियमों में OBC नहीं थे तो अब उन्हें क्यों शामिल कर लिया गया? अगर कर लिया गया तो इसमें सवर्णों को क्यों शामिल नहीं किया गया?

नियम में अहम प्वाइंट्स

  • हर उच्च शिक्षण संस्थान में Equity Committee, Equal Opportunity Centre और helpline बनाना अनिवार्य।
  • भेदभाव की शिकायतों पर तुरंत कार्रवाई, लोकपाल की व्यवस्था।
  • संस्थानों को नियम न मानने पर फंडिंग रोकने या कोर्स अप्रूवल रद्द करने जैसी सजा हो सकती है।
  • भेदभाव की परिभाषा में स्पष्ट रूप से SC, ST और OBC के खिलाफ जाति आधारित भेदभाव को शामिल किया गया है।

किस वजह से बदले गए नियम?

दरअसल, साल 2012 में यूजीसी ने नियम लागू किए थे जिनके तहत जातिगत भेदभाव पर रोक लगाया जाना था। जनवरी 2016 में हैदराबाद यूनिवर्सिटी में रोहित वेमुला नाम के एक स्टूडेंट ने जातिगत भेदभाव के आरोप लगाते हुए आत्महत्या कर ली थी। उसके बाद से कई ऐसे मामले चर्चा में आए जिसमें दलित और ओबीसी छात्रों की आत्महत्या ने शैक्षणिक संस्थानों को सवालों के घेरे में खड़ा किया।


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