राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) का निशान घड़ी है और ऐसा लग रहा है कि इस घड़ी की सुइयां रुक गई हैं। इस पार्टी के अध्यक्ष और महाराष्ट्र के डिप्टी सीएम अजित पवार का निधन हो गया है। उनके ही गृहक्षेत्र बारामती में उनका प्लेन क्रैश हो गया। हादसे के बाद महाराष्ट्र में शोक की लहर दौड़ गई है। यह वही पार्टी है जिसे उनके चाचा शरद पवार ने स्थापित किया और राजनीतिक विरासत पर अपना दावा ठोंकते हुए अजित पवार इसके अध्यक्ष बन गए थे।
कुछ दिनों पहले ही हुए निकाय चुनाव में पवार परिवार एकजुट होता दिखा था और चर्चा थी कि अब दोनों धड़े साथ आ जाएंगे। अब अजित पवार के निधन ने न सिर्फ पवार परिवार को बड़ा झटका लगा है बल्कि महाराष्ट्र की राजनीति में एक बड़ा शून्य पैदा हो गया है। अब देखना यह होगा कि अजित पवार की गैरमौजूदगी और शरद पवार की कम सक्रियता के बीच एनसीपी का क्या होता है।
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अजित पवार के निधन से एनसीपी के भविष्य पर बड़ा सवाल खड़ा हो रहा है। कई विकल्प हो सकते हैं, जिन पर पवार परिवार विचार कर सकता है। दुख की घड़ी से उबरने के बाद पवार परिवार और खासकर अजित पवार का परिवार राजनीति रूप से क्या करेगा, यह महाराष्ट्र की राजनीति में बेहद अहम हो सकता है। इस परिवार के पास कम से कम तीन स्थितियां बनती दिख रही हैं।
1. दोनों धड़ों का मर्जर
इस पर काफी समय से चर्चा चल रही थी। पिंपरी चिंचवड महानगर पालिका (PCMC) के चुनाव के दौरान जब दोनों धड़े साथ मिलकर चुनाव लड़े तो अजित पवार ने भी इस ओर इशारा किया था कि अब परिवार साथ है। मुख्य अदावत अजित पवार की थी और उन्हें शरद पवार के काम करने का तरीका स्वीकार नहीं हो रहा था। दूसरी तरफ, उनकी बहन और शरद पवार की बेटी सुप्रिया सुले ने अपने 'दादा' यानी अजित पवार के बारे में कभी गलत बातें नहीं कहीं।
चुनाव दर चुनाव यह देखा जा रहा है कि न सिर्फ एनसीपी (शरद पवार) बल्कि अजित पवार की एनसीपी को भी कई चुनावी झटके लगे हैं। ऐसे में पार्टी के अंदर सुगबुगाहट भी चल रही थी कि अपना किला बचाने के लिए दोनों को साथ आना होगा। PCMC के चुनाव में यह दांव उतना काम नहीं तो नहीं आया लेकिन पार्टी काडर जरूर उत्साहित दिखा।
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ऐसे में एनसीपी के सामने सबसे बेहतर विकल्प यही होगा कि दोनों धड़े एकसाथ आ जाएं और शरद पवार के रहते एक नए नेता की अगुवाई में पार्टी आगे बढ़े। हालांकि, यह काम काफी चुनौतीपूर्ण होगा क्योंकि अब दोनों धड़ों में काफी मतभेद हैं और दोनों धड़ों के लिए मर्जर का काम आसान नहीं होगा।
2. युवाओं को साझा नेतृत्व
अजित पवार के बेटे पार्थ पवार और भतीजे रोहित पवार पार्टी की नई पीढ़ी के नेता हैं। कई बार चर्चा भी होती है कि शरद पवार अपने नाती रोहित पवार को आगे बढ़ाते रहे हैं। अजित पवार के अलग जाने के बाद रोहित पवार कई मुद्दों पर पार्टी की बात रखते दिखे थे। कई बार वह इशारों-इशारों में अपने चाचा अजित पवार को भी आड़े हाथ लेते दिखे थे। दूसरी तरफ, पार्थ पवार अपने पिता अजित पवार की राजनीतिक विरासत के वारिस कहे जाते हैं और वह राजनीति में खूब सक्रिय भी हैं।
अब एक विकल्प यह भी होता है कि अजित पवार के बाद शरद पवार राजनीतिक नेतृत्व सीधे तीसरी पीढ़ी के हाथ में सौंप दें। यानी पार्थ और रोहित दोनों को जिम्मेदारी देकर शरद पवार असली कमान अपने हाथ में रखें। हालांकि, पार्थ पवार और रोहित पवार के बीच एक समय पर चुनाव के टिकट को लेकर टकराव रहा है, ऐसे में साझा नेतृत्व अलग तरह की परेशानी पैदा कर सकता है।
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3. बिखराव
पार्टी को एकजुट करने में सबसे बड़ी रुकावट हो सकता है अजित पवार की पत्नी सुनेत्रा पवार और उनके बेटे पार्थ परिवार का रुख। अगर इस परिवार से इतर किसी और को नेतृत्व मिलता है तो यह परिवार बगावत कर सकता है। आखिर अजित पवार ने भी इसी के लिए बगावत की थी। ऐसे में शरद पवार के लिए अपनी बहू और नाती को समझाना टेढ़ी खीर हो सकता है। शरद पवार ने 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान सुनेत्रा को बाहरी कह दिया था, जिस पर वह काफी आहत हुई थीं। यह भी एक मुद्दा बन सकता है।
अब अगर साझा नेतृत्व पर सहमति नहीं बनती और पार्टी एकजुट नहीं होती है तो बिखराव की आशंका है। इसकी बड़ी वजह यह है कि अजित पवार अच्छे पॉलिटिकल मैनेजेर थे। इसी मैनेजमेंट के दम पर उन्होंने अपने चाचा शरद पवार की नाक के नीचे से न सिर्फ पार्टी के विधायकों और सांसदों को अपने पाले में कर लिया था, बल्कि वह पार्टी के भी बॉस बनने में कामयाब रहे थे।
