सुप्रीम कोर्ट ने पर्यावरण कानून के मील के पत्थर माने जाने वाले 40 साल पुराने 'एमसी मेहता बनाम भारत' मामले को बंद करने का आदेश दिया है। चीफ जस्टिस सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली तीन जजों की पीठ ने स्पष्ट किया कि इस ऐतिहासिक याचिका का अब निस्तारण किया जाता है और इसमें अब कोई नया आवेदन स्वीकार नहीं किया जाएगा।
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को पर्यावणविद एमसी मेहता की 1985 की ऐतिहासिक जनहित याचिका का निपटारा किया। इस महत्वपूर्ण घटना के बाद दिल्ली में प्रदूषण कंट्रोल पर लगभग चार दशकों तक लगातार न्यायिक निगरानी रही। दिल्ली की बसों को CNG में बदलने से लेकर पटाखों पर रोक लगाने और पुरानी कमर्शियल गाड़ियों को धीरे-धीरे हटाने तक इस इस केस के जरिए ही संभाव हो सका।
कोर्ट ने निर्देश दिया कि इस केस में लंबित सभी अंतरिम आवेदनों को अब अलग-अलग स्वतंत्र रिट याचिकाओं के रूप में दर्ज किया जाए। कोर्ट ने जनहित याचिकाओं के दुरुपयोग को लेकर कहा कि कुछ याचिकाएं तो देश के बाहर से आती हैं।
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नए टॉपिक से होगी सुनवाई
जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली की बेंच ने पुरानी याचिका को बंद करते हुए वायु प्रदूषण के मुद्दे की गंभीरता को देखते हुए एक नया स्वतः संज्ञान मामला दर्ज करने का निर्देश किया। अब प्रदूषण से जुड़ी सुनवाई नए टॉपिक 'In Re: Issues of Air Pollution in the National Capital Region' के नाम से जानी जाएगी। इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट ने रजिस्ट्री को निर्देश देते हुए कहा कि पुराने मामले में लंबित सभी अंतरिम आवेदनों को अब नए मामले के तहत अलग-अलग रिट याचिकाओं के रूप में दर्ज किया जाएगा।
मामला क्या था?
बता दें कि साल 1985 में पर्यावरणविद एमसी मेहता ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दाखिल की थी। इसमें दिल्ली में व्याप्त वायु प्रदूषण की समस्या को उजागर किया गया था। दशकों से कोर्ट इसी याचिका के नाम पर कई नए-नए मुद्दों पर सुनवाई कर रहा था। इसी याचिका के तहत आयु पूरी कर चुके वाहनों का मामला, सीएनजी, पटाखे बंदी आदि कई बड़े मसलों पर कोर्ट सुनवाई करती रही है।
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'फंड बाहरी ताकतों से मिलता है'
सुनवाई के दौरान CJI ने जनहित याचिकाओं के दुरुपयोग पर चिंता जताते हुए कहा कि कुछ पीआईएल देश के बाहर से आती हैं, जिन्हें बाहरी ताकतों से फंड मिलता है। वायु प्रदूषण जैसे संवेदनशील मामलों में कोर्ट की अनुमति के बिना कोई भी नई याचिका स्वीकार नहीं की जानी चाहिए। कोर्ट ने रजिस्ट्री को सख्त आदेश दिया कि भविष्य में बिना पूर्व अनुमति के इस तरह के नए आवेदन या मिसलेनियस एप्लीकेशन पर विचार नहीं किया जाए।
सुनवाई को प्रभावी बनाने के लिए नए निर्देश
इसी दौरान शीर्ष कोर्ट ने दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण की निगरानी कर रही संस्था CAQM और संबंधित राज्यों को कड़े निर्देश जारी किए हैं। CAQM को यह सुनिश्चित करना होगा कि उसकी सभी रिपोर्ट सुनवाई से पहले सभी पक्षकारों को उपलब्ध कराई जाएं। इसके साथ ही दिल्ली, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और राजस्थान की सरकारों को अपनी कम्प्लायंस रिपोर्ट समय से पहले फाइल और बांटनी होगी।
