बड़ी मछलियां, तालाब की छोटी मछलियों को निगल जाती हैं। अंग्रेजी कहावत 'बिग फिश ईट्स स्मॉल फिश' ऐसी कहावत है, जिसका राजनीति में खूब इस्तेमाल किया जाता है। हो भी क्यों न हो, बड़ी राजनीतिक पार्टिया, अक्सर छोटी राजनीतिक पार्टियों को खुद में शामिल कराने की सारी कवायदें करती हैं। भारत की राजनीति में राजनीतिक दलों के इर्द गिर्द ही इन दिनों सियासत झूल रही है, पहली भारतीय जनता पार्टी, दूसरी कांग्रेस। 

कांग्रेस आजादी के तत्काल बाद सत्ता में रही, भारतीय जनता पार्टी की शुरुआत ही 6 अप्रैल 1980 से हुई है। भारतीय जनता पार्टी 46 साल पुरानी पार्टी है, कांग्रेस की स्थापना  28 दिसंबर 1885 को हुई थी। कांग्रेस 141 साल पुरानी पार्टी है। दोनों दल ही भारतीय राजनीति के दो ध्रुव हैं, एक को उत्तर कह सकते हैं, दूसरे को दक्षिण। 

दोनों राजनीतिक दलों ने अपने सहयोगी दलों में शामिल रही कई राजनीतिक पार्टियों का विलय किया है। विलय के लिए साम-दाम-दंड-भेद की सारी नीतियां अपनाई जाती रही हैं। बिहार से लेकर पश्चिम बगाल तक, राजनीतिक दलों का ऐसा प्रयोग नया नहीं है। बीजेपी हो या कांग्रेस, दोनों दल छोटे दलों का विलय करने में हिचकते नहीं हैं।

यह भी पढ़ें: 'सायोनी घोष जा सकती हैं तो भरोसा किस पर...', महुआ मोइत्रा TMC संकट पर क्या कहा?

TMC का कांग्रेस में विलय, खारिज पर कवायद क्यों?

पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव हुए तो ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस की करारी हार हुई। प्रचंड बहुमत वाली ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस सिर्फ 80 सीटों पर सिमटी। हैरान करने वाली बात यह रही कि ऋतब्रत बनर्जी की अगुवाई में ममता बनर्जी को तगड़ा झटका लगा, 60 विधायकों ने अलग गुट बना लिया।

ममता बनर्जी की असली तृणमूल कांग्रेस के पास 20 से कम विधायक हैं, TMC के 20 से ज्यादा सांसद, अब बीजेपी की नेतृत्व वाले एनडीए सरकार को समर्थन दे रहे हैं।  8 जून, 2026 को नई दिल्ली में कांग्रेस मल्लिकार्जुन खड़गे की अगुवाई में एक बैठक हुई, जिसमें दावा किया गया कि तृणमूल कांग्रेस का कांग्रेस में विलय होगा। 

विचारधारा के स्तर पर दोनों राजनीतिक दल एक जैसे हैं लेकिन बंगाल में कट्टर दुश्मन हैं। 1 जनवरी 1998 को ममता बनर्जी ने कांग्रेस से अलग होकर तृणमूल कांग्रेस की नींव रखी थी, यह नींव अब कमजोर पड़ चुकी है। ममता बनर्जी जिन नेताओं को अपना समझती थीं, वे बीजेपी में चले गए हैं, या जाने की कवायद कर रहे हैं।

यह भी पढ़ें: 'असली TMC गुट हमारा, हमें ही मान्यता मिले', बागी सांसद ने और क्या कहा?

उपेंद्र कुशवाहा, विलय की कवायद विधान परिषद के लिए तरसे 

उपेंद्र कुशवाहा, राष्ट्रीय लोक मंच के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। उनके बेटे दीपक प्रकाश बिहार सरकार में पंचायती राज मंत्री हैं। 18 जून को विधान परिषद का चुनाव होने जा रहा है, NDA के 9 उम्मीदवारों ने नामांकन दाखिल किया है लेकिन दीपक प्रकाश का नाम ही शामिल नहीं है। वह न तो विधानसभा के सदस्य हैं, न ही विधान परिषद के। मंत्री पद पर बने रहने के लिए 6 महीने के भीतर किसी एक सदन का सदस्य बनना अनिवार्य है। बीजेपी ने दीपक को विधान परिषद भेजने पर सहमति नहीं जताई। 

दीपक प्रकाश को विधान परिषद में हिस्सेदारी न मिलने की सबसे बड़ी वजह यह बताई जा रही है कि बीजेपी चाहती थी कि उपेंद्र कुशवाहा अपनी पार्टी राष्ट्रीय लोक मंच का विलय बीजपी में कर दें। वह विलय के लिए तैयार नहीं हुए तो बीजेपी ने झटका दे दिया। उपेंद्र कुशहावा बीजेपी में कुशवाहा समुदाय के बड़े नेता हैं, इस बार उनके 4 विधायक जीते हैं। उनके बेटे का सियासी भविष्य अभी अधर में लटका नजर आ रहा है। 

वह अब तक 3 बार पार्टी बना चुके हैं। साल 2009 में उन्होंने जेडीयू में राष्ट्रीय समता पार्टी का विलय किया था। सम्राट चौधरी भी इसी पार्टी से रहे। 2021 में उन्होंने राष्ट्रीय लोकसमता पार्टी का जेडीयू में विलय किया। विलय के बाद अनबन हुई फरवरी 2023 में उन्होंने नई पार्टी राष्ट्रीय लोक मोर्चा के नाम से बना ली।  अब एक धड़ा कह रहा है, बीजेपी विलय चाहती है। 

यह भी पढ़ें: बगावत, इस्तीफे और मर्जर की चर्चा; 48 घंटों में TMC में आया सियासी भूचाल

JAP का कांग्रेस में विलय, फिर भी कांग्रेसी नहीं बन पाए पप्पू यादव

पूर्णिया के सांसद पप्पू यादव ने साल 2024 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले अपनी पार्टी का विलय 20 मार्च 2024 में कांग्रेस में कर दिया। प्रियंका गांधी ने उनका पार्टी में स्वागत किया, वादा किया गया कि पूर्णिया की सीट दी जाएगी। राष्ट्रीय जनता दल के नेता लालू यादव और उनके बेटे तेजस्वी यादव, कांग्रेस के इस फैसले पर राजी ही नहीं हुए। उन्होंने अपना उम्मीदवार पूर्णिया से उतारा। पप्पू यादव निर्दलीय ही चुनाव जीत गए। वह तब से लेकर अब तक कांग्रेस में शामिल होने के लिए बेताब ही दिखे लेकिन न तो उन्हें राहुल गांधी ने भाव दिया, न ही प्रियंका गांधी ने। वह खुद को कांग्रेस का कट्टर नेता बता देते हैं लेकिन टीस है कि पार्टी का शीर्ष नेतृत्व उन्हें अपना ही नहीं मान पाता है। 

यह भी पढ़ें: स्पीकर के फैसले के खिलाफ TMC को नहीं मिली अंतरिम राहत, 16 जून को अगली सुनवाई

कैप्टन अमरिंदर, न खुदा ही मिला न विसाल-ए-सनम

कैप्टन अमरिंदर राजीव गांधी के दोस्त थे। कट्टर कांग्रेसी। 1980 के दौर में जब कांग्रेस से सिख समाज बेहद नाराज था, तब भी वह कांग्रेस में ही बने रहे। कांग्रेस ने उन्हें कई मौके दिए। वह मुख्यमंत्री भी बनते रहे लेकिन तभी पंजाब में नवजोत सिंह सिद्धू कांग्रेसी हो गए। 15 जनवरी 2017 में वह बीजेपी छोड़कर आधिकारिक तौर पर कांग्रेसी हो गए। पंजाब में 2017 में कैप्टन अमरिंद सिंह भारी बहुमत से मुख्यमंत्री बने, राज्य में उनकी मजबूत सरकार रही लेकिन सिद्धू की वजह से परेशानियां बढ़ने लगीं। नवजोत सिद्धू ने इतना कलह किया कि 18 सितंबर 2021 को उन्हें इस्तीफा देना पड़ा। 

इस्तीफे के बाद कैप्टन अमरिंदर ने 2 नवंबर 2021 को अपनी नई पार्टी 'पंजाब लोक कांग्रेस' बनाई। जिसके खिलाफ दशकों से लड़ रहे थे, उसी बीजेपी से गठबंधन करके चुनावी मैदान में उतरे। 2022 में अपनी सीट भी गंवा बैठे, बीजेपी की भी जमानत जब्त हुई। सिर्फ 2 सीट बीजेपी जीत पाई। 19 सितंबर 2022 को उन्होंने नई दिल्ली आकर अपनी पार्टी का विलय कर दिया। अपने जीवन के 8वें दशक में एक बार फिर कैप्टन अमरिंदर बीजेपी से नाराज हैं। उन्हें केवल सिंह ढिल्लो को बीजेपी का पंजाब अध्यक्ष बनाना रास नहीं आया था। अब ऐसा कहा जा रहा है कि बीजेपी उन्हें भाव देने के पक्ष में नहीं है।

यह भी पढ़ें: TMC में बगावत वाली 'ऑफिशियल चिट्ठी' आ गई, सायोनी घोष समेत 19 सांसदों के दस्तखत

उदित राज, करोड़ों समर्थक वाले नेता, अब कहां हैं?

उदित राज दावा करते थे कि उनके करोड़ों समर्थक थे। वह खुद को बहुजनों का नेता बताते थे। उनका अपना राजनीतिक दल भी था। इंडियन जस्टिस पार्टी। 24 फरवरी 2014 को उन्होंने तत्कालीन बीजेपी अध्यक्ष राजनाथ सिंह की मौजूदगी में अपने सियासी दल का विलय कर लिया। 2014 में उन्हें उत्तर पश्चिम दिल्ली से उतारा गया, बीजेपी सांसद रहे। 2019 में उन्हीं का टिकट काटकर बीजेपी ने गायक हंस राज हंस को उतार दिया। यह बात उदित राज को खटक गई, वह कांग्रेस में चले गए। उदित राज असंगठित श्रमिक एवं कर्मचारी कांग्रेस (KKC) के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।