बिहार के नए मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की ताजपोशी हो गई है। भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) में साल 2014 में आए सम्राट चौधरी का उभार काफी तेजी से हुआ है। विधान परिषद में बीजेपी के नेता से लेकर मुख्यमंत्री तक का उनका यह सफर काफी तेजी से तय हुआ है। अलग-अलग दलों से संबंध रखने के चलते ही तेजस्वी यादव उन्हें 'प्रादुर्भाव से समाजवादी' बताकर बधाई दे रहे हैं। बीजेपी ने सम्राट चौधरी पर भरोसा जताया है और उन्हें नीतीश कुमार जैसे कद्दावर नेता की जगह भरनी है। इसके इतर सम्राट चौधरी और बीजेपी के सामने तीन सवाल हमेशा आने वाले हैं। ये सवाल सम्राट चौधरी की डिग्री, उनकी उम्र और परिवारवाद से जुड़े हुए हैं।

 

रोचक बात है कि कई बार बीजेपी के ही नेता विपक्षी तेजस्वी यादव को 9वीं फेल बताते हैं और उनके बारे में कहते हैं कि उनकी हैसियत सिर्फ इस वजह से है कि वह लालू प्रसाद यादव के बेटे हैं। यही वजह है कि सम्राट चौधरी का नाम तय होते ही तेजस्वी ने उन्हें 'लालू यादव की पाठशाला' से निकला हुआ नेता बताया। अब सबकी निगाहें सम्राट चौधरी पर होंगी और उनसे बार-बार ये सवाल भी पूछे जाएंगे। देखना यह होगा कि अपनी डिग्री को लेकर बार-बार उठने वाले सवालों और अपनी असली उम्र को लेकर सम्राट चौधरी कैसे और क्या जवाब देते हैं। इससे पहले यह पूरा मामला समझ लेते हैं।

क्या है उम्र वाला विवाद?

साल 1999 में 16 नवंबर की तारीख थी और सम्राट चौधरी के घर पर उनका जन्मदिन मनाने की तैयारी चल रही थी। उसी वक्त राजभवन से खबर आई कि राज्यपाल सूरजभान ने सम्राट चौधरी को कम उम्र के आधार पर राबड़ी देवी की कैबिनेट से बर्खास्त कर दिया और सिर्फ बर्खास्त नहीं किया बल्कि राज्य सरकार को आदेश दिया कि चौधरी के खिलाफ धोखाधड़ी, जालसाजी और गलत बयानी का मामला दर्ज किया जाए। साथ ही मंत्री बनने के बाद से मिले वेतन और भत्ते उनसे वसूलने का भी निर्देश दिया। आरोप यह था कि सम्राट की उम्र मंत्री बनने के लिए जरूरी 25 साल से कम थी। दिलचस्प है कि तब इस मामले की जो रिपोर्ट मीडिया ने की उनमें सम्राट चौधरी का नाम राकेश चौधरी मिलता है। 

 

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29 नवंबर, 1999 में इंडिया टुडे मैगज़ीन में छपी संजय कुमार झा की रिपोर्ट मिलती है। रिपोर्ट के मुताबिक, राज्यपाल ने चौधरी की उम्र से जुड़े दस्तावेज़ों में कई विसंगतियां पाईं। स्कूल छोड़ने के प्रमाण पत्र में उम्र 31 साल मिली। कुंडली के अनुसार उनकी उम्र केवल 26 साल थी। मतदाता सूची में उम्र 24 साल थी और 1995 में कोर्ट में पेश किए गए एक हलफनामे में कहा गया था कि उस समय उनकी उम्र 16 साल थी। इस हिसाब से 1999 में उम्र 20 साल होनी चाहिए थी। राकेश या कहें कि सम्राट के बड़े भाई जो बिहार इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी में पढ़ रहे थे, उनके जन्म प्रमाण पत्र के अनुसार 1999 में 22 साल के थे।

 

पढ़कर लग रहा होगा सुडोकू का खेल चल रहा है। संभवतः राज्यपाल सूरजभान का मैथ मजबूत होगा। नहीं तो ये नंबर्स कंफ्यूज कर देने के लिए पर्याप्त हैं। ख़ैर उम्र के चक्कर में मंत्री पद चला गया था लेकिन अगर वह बर्खास्त नहीं किए जाते फिर भी यह पद जाता क्योंकि 19 नवंबर यानी बर्खास्तगी से 3 दिन बाद उनको मंत्री बने 6 महीने हो जाते और तब तक ना वह MLA बन पाए थे, ना ही एमएलसी।

 

क्यों बर्खास्त हो गए थे सम्राट चौधरी?

 

अब आपके मन में यह सवाल आ सकता है कि क्या राज्यपाल को रैंडमली ख़्याल आया होगा कि चलो आज सम्राट जो तब तक राकेश थे, उनकी उम्र देखी जाए? जवाब है नहीं। दरअसल, शकुनि चौधरी और उनकी मां पार्वती चौधरी ने उन दिनों पार्टी बदली थी। दोनों समता पार्टी से RJD में पधारे थे। परिणामस्वरूप उनके पुत्र को मंत्री पद मिला था। यह बात समता पार्टी वालों को रास नहीं आई तो समता पार्टी के नेता रघुनाथ झा और पी.के. सिन्हा ने तत्कालीन राज्यपाल जस्टिस बी.एम. लाल और राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ए.के. बसु को याचिका दायर कर कहा कि चौधरी की उम्र 25 साल नहीं हुई है इसलिए वह मंत्री बनने की शर्त पूरी नहीं करते। बीएम लाल ने ए के बसु को मामले की जांच कर 25 दिनों के भीतर रिपोर्ट देने का निर्देश दिया था। लाल बाद में रिटायर हो गए। जब कार्यवाहक राज्यपाल आए तो उन्होंने एके बसु को 5 नवंबर तक अपनी रिपोर्ट पेश करने का आदेश दिया। बसु ने रिपोर्ट तैयारी की और राज्यपाल को सौंप दिया। इंडिया टुडे की 1999 वाली ही रिपोर्ट बताती है कि राज्यपाल को सौंपी गई रिपोर्ट में लिखा गया था कि ‘राकेश चौधरी उर्फ सम्राट चौधरी ने जांच में सहयोग नहीं किया। साथ ही यह साबित करने में नाकाम रहे कि उनकी उम्र मंत्री बनने योग्य यानी 25 साल है।’

 

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दिलचस्प है कि लालू-राबड़ी समझ चुके थे कि एक नया सियासी बखेड़ा होने वाला है। बर्खास्तगी से ठीक एक दिन पहले यानी 15 नवंबर की बात है। मुख्यमंत्री और पूर्व मुख्यमंत्री राजभवन पहुंचे, राज्यपाल सूरजभान से मिले। दोनों ने राज्यपाल के सामने यह बात रखी कि आप राकेश चौधरी को मंत्री पद से हटाने के लिए औपचारिक अनुरोध कीजिए, जिस पर सरकार फैसला लेगी लेकिन मुलाकात के अगले ही दिन राज्यपाल ने औपचारिक तौर पर नोटिफिकेशन जारी करके उनके मंत्री को बर्खास्त ही कर दिया।


सम्राट की उम्र है कितनी?

हमने सम्राट चौधरी के तीन चुनावी हलफनामे निकाले। सबसे पहले बात 2005 के बिहार विधानसभा चुनाव की। परबत्ता सीट से RJD ने सम्राट चौधरी को टिकट दिया लेकिन 2005 के चुनावी हलफनामे में सम्राट अपना नाम राकेश कुमार लिखते हैं। एफिडेविट में सम्राट नाम का ज़िक्र कहीं नहीं मिलता है और उसी कागज में वह अपनी उम्र 26 साल बताते हैं। इस लिहाज से 1999 में जब उनका मंत्री पद गया तब उम्र लगभग 20 साल की रही होगी।

 

अब बात 2010 की। 2010 में वह खगड़िया जिले की परबत्ता सीट से चुनाव लड़ रहे थे। चुनाव से पहले एफिडेविट जमा किया, जिसमें नाम लिखा है- सम्राट चौधरी उर्फ राकेश कुमार। इसमें वह अपनी उम्र 28 वर्ष बताते हैं। ध्यान दीजिए 2010 में सम्राट खुद को 28 साल का बता रहे थे। 2005 के हलफनामे से तुलना करें तो सम्राट की उम्र 2010 में 31 साल होनी चाहिए थी लेकिन वह 28 साल लिखते हैं यानी या तो 2005 वाली जानकारी ग़लत थी या 2010 वाली। दूसरी बात, इस लिहाज से 1999 में उनकी उम्र लगभग 17 से 18 साल के बीच रही होगी, जो मंत्री बनने की उम्र से लगभग 8 साल कम हुआ और दूसरी बात यह कि तब वह अपना 31वां जन्मदिन मना रहे थे यानी 2010 वाली उम्र से भी 3 साल आगे का बर्थडे। 

 

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अब बात 2020 की कर लेते हैं। तब तक सम्राट चौधरी बीजेपी ज्वाइन कर चुके थे। पार्टी ने उन्हें 2020 में MLC बना दिया यानी विधानपरिषद में भेजा। यहां भी उन्होंने एफिडेविट जमा किया। इस एफिडेविट में उनका नाम सिर्फ सम्राट चौधरी मिलता है उर्फ लगाकर राकेश कुमार वह नहीं लिखते हैं इस कागज में वह अपनी उम्र बताते हैं 51 साल। यानी जो सम्राट 2010 में 28 साल के थे वह 2020 में 38 साल के नहीं हुए बल्कि 51 साल के हो गए। 10 साल के अंतराल में उनकी उम्र 23 साल बढ़ गई।

डिग्री पर भी सवाल

सम्राट चौधरी पर सवाल सिर्फ उम्र को लेकर नहीं उठ रहे बल्कि शिक्षा को लेकर भी सवाल पूछे जा रहे हैं। 2005 हो या 2010. सम्राट चौधरी ने दोनों ही बार चुनावी दस्तावेज में अपनी उच्चतम पढ़ाई 7वीं पास बताई है लेकिन लेकिन 10 साल बाद यानी 2020 के एफिडेविट में एजुकेशन वाले खाने में डिटेल्स बदली हुई मिलती हैं। 2020 में चौधरी ने लिखकर दिया है कि उनके पास Doctor of Litt. की डिग्री है। वह भी अमेरिका की कैलिफोर्निया पब्लिक यूनिवर्सिटी से लेकिन क्या इस नाम की कोई यूनिवर्सिटी अमेरिका में है भी? इंटरनेट पर काफी खोजबीन करने के बाद पता चलता है कि कैलिफोर्निया पब्लिक यूनिवर्सिटी नाम की एक संस्था है तो सही लेकिन यह एक नॉन ट्रेडीशनल और ऑटोनॉमस यूनिवर्सिटी है जो डिस्टेंस एजुकेशन के मॉडल पर चलती है। यूनिवर्सिटी की वेबसाइट पर जाकर स्टडी प्रोग्राम्सवाले सेक्शन पर क्लिक करेंगे तो अलग-अलग विभाग के नाम दिखेंगे। इनमें एक है आर्ट्स एंड ह्यूमैनिटीज। इस बॉक्स में दाख़िल होने पर पता चलता है कि यूनिवर्सिटी में Doctor of Letters (D.Litt) और Doctor of Literature (D.Litt) दोनों ही कोर्सेज़ चलते हैं. हालांकि, सम्राट के एफिडेविट से पता नहीं चलता है कि उनका Doctor of Litt. कौन सा है। लेटर्स वाला या लिट्रेचर वाला। अब ज़रा D.Litt के बारे में जानकारी ले लेते हैं. फिर एक ज़रूरी सवाल जो बिहार के डिप्टी सीएम की पढ़ाई के टाइमलाइन से उठता है, उस पर आएंगे।

 

Doctor of Litt. एक मानद डिग्री है, जो ह्यूमैनिटीज, लिट्रेचर, फिलॉसफी या हिस्ट्री जैसे विषयों में ख़ास योगदान के लिए दी जाती है। मान लीजिए किसी ने साहित्य में कुछ एकदम फाड़ू काम कर दिया तो कोई अव्वल दर्जे की यूनिवर्सिटी उसे D.Litt की मानद उपाधि देती है। मतलब यह हुआ कि इस डिग्री के लिए कोई एडमिशन लेकर पढ़ाई नहीं करनी होती है। अमूमन यह PhD के बाद मिलती है। एकेडमिक्स की दुनिया में इसका रौला है लेकिन शर्त वही है कि कैंडिडेट ने कुछ जबर काम किया हो। अब सवाल यग है कि जो सम्राट चौधरी 2010 तक खुद को 7वीं पास बता रहे थे उन्होंने 10 साल में ही मैट्रिक, इंटर, ग्रेजुएशन, पोस्ट ग्रेजुएशन फिर PhD तक कैसे कर ली? क्या उन्होंने 2010 में ही एफिडेविट जमा करने के बाद 8वीं क्लास में एडमिशन ले लिया था? अगर लिया भी था और हर साल वह पास हो रहे थे तब भी 10 साल में वह पोस्ट ग्रेजुएशन तक ही कंप्लीट कर पाए होंगे। 3 साल में मैट्रिक, 2 साल में इंटरमीडिएट, 3 साल में ग्रेजुएशन और 2 साल में पोस्ट ग्रेजुएशन। कुल जोड़ बनता है 10 तो क्या पोस्ट ग्रेजुएशन के दौरान ही उन्होंने कुछ ऐसा रिसर्च पेपर लिख दिया कि उन्हें D.Litt का सर्टिफिकेट मिल गया?

 

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परिवारवाद पर भी फंसेंगे सम्राट चौधरी

बिहार में बीजेपी या जेडीयू की मुख्य विरोधी आरजेडी के नेता तेजस्वी यादव के खिलाफ सबसे बड़ा हथियार यह इस्तेमाल होता है कि वह परिवारवाद का प्रोडक्ट हैं। नीतीश कुमार जब यह आरोप लगाते थे तो आरजेडी के पास कोई जवाब नहीं होता था। बीजेपी भी बढ़-चढ़कर इसी पर तेजस्वी यादव और आरजेडी को घेरती थी। अब सम्राट चौधरी को बीजेपी ने मुख्यमंत्री बनाया है जिनकी पहली बड़ी पहचान यही रही है कि वह शकुनी चौधरी के बेटे हैं। इतना ही नहीं, सम्राट चौधरी खुद उसी आरजेडी से निकलने हैं जो अब उनकी मुख्य विरोधी पार्टी है।

 

ऐसे में देखना होगा कि मुख्यमंत्री के रूप में काम करते हुए सम्राट चौधरी इन सवालों का कितना और कैसे जवाब देते हैं। साथ ही, यह भी देखना होगा कि इन सवालों के जवाब जब विपक्ष की ओर से पूछे जाएंगे तब वह कितने सहज रह पाते हैं।