प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का तमिलनाडु दौरा इन दिनों चर्चा में हैं। भारतीय जनता पार्टी, तमिलनाडु में जड़ें जमाने की कोशिश कर रही है। तमिलनाडु में अप्रैल से मई के बीच 2026 के विधानसभा चुनाव होने वाले हैं, जिसे लेकर सभी राजनीतिक दल, एड़ी चोटी का जोर लगा रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, तमिलनाडु की सत्तारूढ़ सरकार, द्रविड़ मुनेत्र कझगम (DMK) को लेकर हमलावर हैं। पार्टी के सर्वे-सर्वा एमके स्टालिन हैं, जो दक्षिण में बीजेपी के लिए बड़ी चुनौती बने हैं, द्रविड़ आंदोलन के प्रतिनिधि नेताओं में शुमार हैं। 

प्रधानमंत्री मोदी ने तमिलनाडु में एक जनसभा के दौरान कहा था  कि DMK के दिन गिने-चुने हैं, क्योंकि तमिलनाडु की जनता कुप्रशासन से मुक्ति चाहती है। उन्होंने DMK को 'करप्शन, माफिया और क्राइम' को बढ़ावा देने वाली CMC सरकार कहा था। उन्होंने DMK पर वंशवाद, भ्रष्टाचार, महिलाओं का अपमान और संस्कृति के दुरुपयोग को बढ़ावा देने का आरोप लगाया। प्रधानमंत्री के सवालों से इतर, क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर डीएमकी की राजनीति क्या है?

डीएमके तो वामपंथी दल है, न ही राष्ट्रवादी दल है, समाजवादी विचारधारा से भी डीएमका का बहुत लेना-देना नहीं है। लोकतंत्र की तीन प्रचलित विचारधाराओं से अलग हटकर, आखिर द्रविड़ मुनेत्र कझगम की राजनीति क्या है, इसे लेकर लोग अक्सर सवाल करते हैं। इस सवाल का जवाब, तब मिलेगा, जब हम, डीएमके के अतीत में झाकेंगे-

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द्रविड़ मुनेत्र कझगम है क्या?

द्रविड़ मुनेत्र कझगम की स्थापना कोंजीवरम नटराजन अन्नादुरई ने 15 सितंबर 1908 में की थी। लोग उन्हें पेरारिग्नर अन्ना के तौर पर भी जानते थे। वह  DMK के संस्थापक थे और इस पार्टी के पहले महासचिव बने। साल 1967 से लेकर 1969 तक, इन्होंने मद्रास के चौथे और अंतिम मुख्यमंत्री के तौर पर अपना कार्यकाल पूरा किया, फिर तमिलनाडु के पहले सीएम बने। 

अन्नादुरई, तमिल भाषा के लेखक थे, अभिनेता भी थे। उनकी लिखी किताबों पर फिल्में बनती थीं। एक सामान्य परिवार में जन्मे अन्ना दुरई ने पहले स्कूल टीचर के तौर पर काम किया, फिर पत्रकारिता में उतरे, फिर द्रविड़ पार्टी में शामिल हुए। उनके राजनीतिक गुरु पेरियार थे। पेरियर से टकराव हुआ तो तो उन्होंने द्रविड़ कझगम से अलग होकर नई पार्टी बनाई। 

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पेरियार से मतभेद क्यों हुए?

कोंजीवरम नटराजन अन्नादुरई, ईवी रामास्वामी पेरियार के शिष्य थे। वह उनके कट्टर समर्थक थे तो पार्टी में कद धीरे-धीरे बढ़ता चला गया। राजनीतिक तौर पर प्रभावशाली होने के बाद उनका अपने राजनीतिक गुरु पेरियार से द्रविनाड़ु के स्वतंत्र राज्य और भारत के साथ विलय को लेकर मतभेद बढ़ता चला गया। पेरियार चुनाव लड़ने और लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भरोसा नहीं कर पा रहे थे, वहीं अन्नादुरई सोचते थे कि इसके बिना राजनीतिक और सामाजिक बदलाव नहीं लाया जा सकता।

टकराव की एक वजह यह भी कही जाती है कि पेरियार ने 70 साल की उम्र में एक कम उम्र की लड़की से शादी कर ली और अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया। अन्नादुरई ने इसे अलोकतांत्रिक मानकर पार्टी छोड़ दी। व्यक्तिगत कारण: जब 70 वर्षीय पेरियार ने अपने से बहुत कम उम्र की मणिअम्मई से शादी की और उन्हें अपना उत्तराधिकारी घोषित किया, तो अन्नादुरै और उनके समर्थकों ने इसे अलोकतांत्रिक माना और पार्टी छोड़ दी।

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शुरुआत में कैसी थी डीएमकी विचारधारा?

डीएमकी की विचारधारा, अपनी मूल पार्टी, द्रविड़ कझगम से प्रभावित थी। उनके अलग द्रविनाड़ु की मांग करने वाले अलगाववादी नेता से राष्ट्रवादी नेता तक बनने का सफर बेहद दिलचस्प है। पहले वह तमिल संस्कृति को पहचान अलग राष्ट्र की मांग कर रहे थे, बाद में भारतीय लोकतंत्र की अहम कड़ी बने। शुरुआती दिनों में सीएन अन्नादुरई और उनकी पार्टी डीएमके ने दक्षिण भारत के लिए एक अलग और आजाद राष्ट्र 'द्रविनाडु' की मांग की थी। साल 1962 में जब भारत और चीन के बीच जंग छिड़ी और देश में अलगाववाद विरोधी कानून प्रबल हुए तो उन्होंने यह मांग छोड़ दी। 

वह ऐसे नेता रहे जिनकी केंद्र से कभी नहीं बनी। कांग्रेस केंद्र में सत्ता में थी, विरोध की वजह से कई बार जेल गए। साल 1965 मेके मद्रास हिंदी विरोधी आंदोलन की वजह से उन्हें जेल हुई। इस आंदोलन ने अन्नादुरई को हीरो बना दिया। वह हिंदी विरोध के सबसे बड़े नायक बन गए। साल 1967 में जब राज्य चुनाव हुए तो उन्हें भारी जीत मिली। अन्नादुरई ने सुयमरियाथाई विवाह को मंजूरी दी। इस शादी में पुरोहित, पंडित की जरूरत नहीं पड़ती, इसे आत्मसम्मान विवाह के भी नाम से गैर हिंदी भाषी राज्यों में लोग जानते हैं। इस विवाह को उन्होंने कानूनी मंजूरी दी।

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दो-भाषा नीति लागू की। तब दक्षिण के राज्यों में 3 भाषा नीति प्रचलित थी। उन्होंने चावल पर छूट दी, मद्रास राज्य का नाम बदलकर तमिलनाडु किया। अन्नादुरई ज्यादा दिन तक मुख्यमंत्री नहीं रहे। पद संभालने के 2 साल बाद कैंसर से संक्रमित होने के बाद उनकी मौत हो गई। एमजी रामचंद्रन ने उन्हीं की विचारधारा पर आगे बढ़कर, साल 1972 में एक अलग दल का भी गठित किया था। ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुन्नेत्र कझगम (AIADMK) तमिलनाडु की मुख्य विपक्षी पार्टी है और भारतीय जनता पार्टी के साथ गठबंधन में हैं। 

डीएमके की विचारधारा क्या है?

DMK की स्थापना का एक बड़ा मकसद, पेरियार के सिद्धांत के आधार पर आत्म-सम्मान आंदोलन को आगे बढ़ाना था। यह दल, जातिवाद का विरोध करता है, ब्राह्मणवाद से इस पार्टी का अनबन दशकों पुराना है। डीएमके के चीफ एमके स्टालिन भी इसी विचारधारा पर काम करते हैं। यह पार्टी, समाज के दबे-कुचले वर्गों को समान अधिकार दिलाने की बात कहती है। डीएमके, स्थापना के बाद से ही हिंदी थोपे जाने के खिलाफ रही है। डीएमके का मानना है कि हिंदी भाषा नहीं, संस्कृति है, जिसके आने से क्षेत्रीय भाषाओं का अस्तित्व खत्म हो जाएगा। यह पार्टी, संस्कृत विरोधी भी रही है।

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अन्नादुरई हों या स्टालिन, संस्कृत के खिलाफ ये लोग सार्वजनिक तौर पर बोल चुके हैं। डीएमके की स्थापना में ही भाषा अहम मुद्दा था। अन्नादुरई और उनके साथी हिंदी को अनिवार्य भाषा बनाने के खिलाफ थे। उनकी पार्टी की मूल विचारधारा तमिल भाषा और संस्कृति की रक्षा पर आधारित थी। शुरुआत में एक अलग 'द्रविड़नाडु' की मांग करने वाली पार्टी, साल 1963 तक, यह मांग छोड़ चुकी थी। भारत के भीतर ही अपनी पार्टी के विस्तार की रणनीति तैयार करने लगी थी। 

अब क्या हो गई है डीएमकी की विचारधारा?

डीएमके, अब केंद्रीय सीमा के भीतर, राज्यों के लिए स्वायत्तता की मांग करती है। डीएमका का कहना है कि राज्यों को और ज्यादा प्रशासनिक और वित्तीय शक्तियां मिलनी चाहिए। यह पार्टी, तर्कवाद पर भरोसा करती है, धर्मनिरपेक्ष राजनीति की वकालत करती है। यह अंधविश्वासों और धार्मिक कर्मकांडों खिलाफ रहने वाली पार्टी है। पार्टी सभी धर्मों के प्रति सम्मान की बात तो करती है, लेकिन सार्वजनिक नीति और राजनीति में धर्म के हस्तक्षेप का विरोध करती है।डीएमके, सामाजिक सुधार की वकालत करती है, जनकल्याण और कल्याणकारी राज्य की मांग करती है। डीएमके ने मुफ्त भोजन योजना, मुफ्त शिक्षा, महिलाओं के लिए सरकारी बसों में मुफ्त यात्रा और स्वास्थ्य योजनाओं जैसी जनकल्याणकारी नीतियों के जरिए, तमिलनाडु में व्यापक जनाधार हासिल किया है।

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पार्टी के संविधान में विचारधारा के बारे में क्या लिखा है?

द्रविड़ मुन्नेत्र कझगम के संविधान में भारतीय संप्रभुता के तहत, द्रविड़ एकता पर बढ़ने पर जोर दिया गया है। पार्टी का संविधान, सीएन अन्नादुरई की विचारधारा पर ही आधारित है। यह पार्टी, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, केरल और कर्नाटक के चार भाषाई राज्यों में द्रविड़ सांस्कृतिक सहयोग मजबूत करने पर  जोर देती है। डीएमके के संविधान के मुताबिक समानता, धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र के मूल्यों को कायम रखते हुए भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता का निर्माण का संरक्षण, इस पार्टी के संकल्प में है। यह पार्टी, लोकतांत्रिक अधिकारों के रक्षा की वकालत करती है, भेदभाव रहित समाज पर जोर देती है। गरीबी, सामाजिक कल्याण और समान अधिकार पर अधारित है। पार्टी भारतीय संविधान के अंतर्गत स्वायत्तता की मांग करती है।