भारतीय जनता पार्टी इन दिनों 'अपनों' के निशाने पर है। जिस वर्ग को बीजेपी का कोर वोटर कहा जाता है, वही वर्ग, सबसे मुखर होकर बीजेपी की आलोचना कर रहा है। पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक राजनीति करने वाले राजनीतिक दल, बीजेपी को सवर्णों की पार्टी बताते रहे हैं। अब यही सवर्ण बीजेपी से नाराज हैं। भारतीय जनता पार्टी के भीतर भी एक बड़ा धड़ा ऐसा है, जिसे अब शीर्ष नेतृत्व के कुछ फैसले रास नहीं आ रहे हैं। बीजेपी एक-दो मुद्दों पर नहीं बल्कि कई मुद्दों पर एकसाथ घिरी है। विपक्षी ही नहीं, पार्टी के अपने नेता भी मुखर होकर विरोध कर रहे हैं। यूजीसी की नई नियमावली, शंकराचार्य अवमुक्तेश्वरानंद के शिष्यों के साथ झड़प, काशी में कॉरिडोर के नाम पर तोड़फोड़ और ब्राह्मण विधायकों की आलोचना पर बीजेपी ऐसे घिरी है कि अब पार्टी की हर तरफ किरकिरी हो रही है।

बीजेपी सिर्फ सवर्णों के निशाने पर ही नहीं है, उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में ओबीसी राजनीति करने वाली पार्टियां भी शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद और काशी के मुद्दे पर बीजेपी के खिलाफ मुखरित होकर अपनी नाराजगी जाहिर कर रही हैं। बीजेपी के प्रति उदार रवैया रखने वाले कुमार विश्वास हों या उत्तर प्रदेश के बीजेपी विधायक प्रतीक भूषण सिंह, सबने मुखर होकर यूजीसी मुद्दे पर सरकार के खिलाफ बोला है और एक बार फिर से अपने रुख में बदलाव करने के लिए कहा है। 

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प्रतीक भूषण सिंह, विधायक, गोंडा विधानसभा:-
इतिहास के दोहरे मापदंडों पर अब गहन विवेचना होनी चाहिए जहां बाहरी आक्रांताओं और उपनिवेशी ताकतों के भीषण अत्याचारों को ‘अतीत की बात’ कहकर भुला दिया जाता है, जबकि भारतीय समाज के एक वर्ग को निरंतर ‘ऐतिहासिक अपराधी’ के रूप में चिन्हित कर वर्तमान में प्रतिशोध का निशाना बनाया जा रहा है।

यह सिर्फ एक मुद्दा है। प्रतीक भीषण के पिता बृजभूषण शरण सिंह ने शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद के शिष्यों के साथ प्रयागराज में यूपी प्रशासन के टकराव पर भले ही मुखर होकर कुछ नहीं कहा है लेकिन उन्होंने इशारा जरूर किया है कि सरकार ठीक नहीं कर रही है। द्वारका पीठ के शंकराचार्य स्वामी सदानंदर सरस्वती भी संतों से न उलझने की नसीहत सरकार को दे चुके हैं। आखिर बीजेपी से हर किसी को शिकायत क्यों है, समझते हैं।

CM Yogi


मुद्दे जिनके लिए अपनों के निशाने पर है भारतीय जनता पार्टी 

UGC, सरकार के गले की फांस बन गई है

उच्च शिक्षण संस्थानों के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) नई नियमावली 'प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूट्स 2026' लेकर आई है, जिसका सबसे ज्यादा विरोध हो रहा है। इस नियमावली को देशभर में हंगामा मचा है। सवर्ण छात्रों और नेताओं का कहना है कि संस्थानों में जातिगत भेदभाव रोने के लिए लाए गए ये नियम, सवर्णों के गले की फांस बन जाएंगे। सवर्ण संगठन, इसके खिलाफ सड़कों पर उतरने की तैयारी कर रहे हैं। एक वर्ग का कहना है कि यूजीसी रेगुलेशन, 2026 के रूल 3 (C) जातिगत भेदभाव को सिर्फ OBC और SC-ST तक सीमित करते हैं।
चिंता क्या है? 
नए नियम, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, पिछड़ा वर्ग और दिव्यांगों के प्रति होने वाले भेदभाव को रोकने की नीयत से बनाए गए हैं, संस्थानों को यह जिम्मेदारी मिली है। पहले जातिगत भेदभाव की परिभाषा में SC-ST थे, अब इसे OBC को भी शामिल कर लिया गया है। सवर्णों का कहना है कि सवर्ण पीड़ित हो तो ये नियम क्या करेंगे, ऐसे नियम, भेदभावपूर्ण हैं।
लोग क्या कह रहे हैं?

अमरज्योति मिश्रा, अध्यापक:-
'सबसे बढ़िया उपाय यह है सवर्णों के लिए अलग विश्वविद्यालय बना दीजिए, जिसमें सिर्फ सवर्ण छात्र छात्रा रहें और मात्र सवर्ण प्रोफेसर। वहीं अपने एससी, एसटी और ओबीसी छात्रों का अलग विश्वविद्यालय बनाइए, जिसमें प्रोफेसर भी वही रहें। कोई भेदभाव नहीं रहे, सभी मौज से रहें।' 

 

 

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लोगों का कहना है कि नए नियम और उसकी प्रक्रियाएं, सवर्ण छात्रों और स्टाफ को परेशान करने वाली हैं। समितियों के चक्कर में छात्रों का उत्पीड़न हो सकता है। उन्हें झूठे मामलों में फंसाया जा सकता है। अगर गलत और फर्जी शिकायतें आती हैं तो भी उसे उत्पीड़ित नहीं माना जाएगा। यूजीसी मुद्दे को लेकर देशभर में प्रदर्शन हो रहा है। यूजीसी के खिलाफ दिल्ली में सवर्ण संगठन हंगामा कर रहे है। 
 

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अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती, हिंदुत्व पर भी घिर गई है बीजेपी

प्रयागराज में माघ मेला लगा है। ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती मौनी अमावस्या का स्नान करने के लिए पालकी पर सवार होकर जा रहे थे। प्रशासन ने उन्हें संगम नोज की ओर बढ़ने नहीं दिया। उनके शिष्यों के साथ प्रशासनिक अधिकारियों और पुलिसकर्मियों ने धक्का-मु्क्की की। 18 जनवरी को हुई इस झड़प के बाद से अब तक, अवमुक्तेश्वरानंद वहीं बैठे हैं। उन्होंने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की तुलना औरंगजेब से की है और कहा है कि वह हिंदुत्व विरोधी हैं। अवमुक्तेश्वरानंद, योगी सरकार और बीजेपी सरकार के मुखर आलोचक रहे हैं। वह शंकराचार्य हैं, इसलिए अब हिंदू धर्म में आस्था रखने वाला एक बड़ा वर्ग, उनके शिष्यों के साथ हुई मारपीट को लेकर आक्रोशित है। बरेली सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री ने शंकराचार्य के समर्थन और यूजीसी नियमावली के खिलाफ इस्तीफा दे दिया।
बीजेपी के लिए चिंता क्या?
बीजेपी हिंदुत्ववादी पार्टी है। हिंदुत्व की बात करती है। हिंदू धर्म में शंकराचार्य को सर्वोच्च धर्मगुरु का स्थान हासिल है। शंकराचार्य में एक बड़ा वर्ग आस्था रखता है। बीजेपी के अपने ही लोग आरोप लगा रहे हैं कि बीजेपी को शंकराचार्य का अपमान नहीं करना चाहिए, वह धर्मगुरु हैं, उनके शिष्यों से मारपीट करना, योगी सरकार की विफलता है।राज्य के डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य ने कहा है कि जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई की जाएगी। शंकाराचार्य पूजनीय हैं। द्वारका पीठ के शंकराचार्य स्वामी सदानंदर सरस्वती ने भी सरकार की आलोचना की है। बीजेपी के कई स्थानीय नेताओं ने इसके खिलाफ आक्रोश जाहिर किया है लेकिन बीजेपी समर्थक संत अविमुक्तेश्वरानंद को बुरी तरह से घेर रहे हैं। वहीं बीजेपी के ही कई स्थानीय नेता, शंकराचार्य के मुद्दे पर पार्टी से इस्तीफा दे चुके हैं। योगी आदित्यनाथ, इशारों ही इशारों में अविमुक्तेश्वरानंद को कालनेमी बता चुके हैं। बीजेपी के अपने कहे जाने वाले संत रामभद्राचार्य अविमुक्तेश्वरानंद को आतंकी बता चुके हैं। 


 

काशी अध्याय, जिसकी वजह से BJP को 'औरंगजेब' बता गए लोग

काशी में मणिकर्णिका घाट के सौंदर्यीकरण को लेकर कुछ मंदिर और पुरानी संरचनाएं तोड़ी गईं हैं। अहिल्याबाई होल्कर की भी एक प्रतिमा के तोड़ने जाने का दावा किया गया है। काशी में रहने वाले हिंदुओं का एक बड़ा वर्ग कह रहा है कि बीजेपी विकास के नाम पर काशी को ही खत्म कर रही है। जो मंदिर, छोटे धर्मस्थल कभी आस्था का केंद्र रहे, उन्हें एक सिरे से हटा दिया गया। काशी में इसे लेकर विरोध हुआ, पुलिस और प्रशासन ने खुद को बचाने के लिए कहा कि ये वीडियो AI है। 10 जनवरी 2026 को कथित तौर पर बिना किसी नोटिस या चेतावनी के वाराणसी की म्युनिसिपल अथॉरिटी ने तोड़ना शुरू कर दिया। स्थानीय लोगों की दुकानें गईं, मंदिर टूटे। 

अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती, शंकराचार्य, ज्योतिर्मठ
यही योगी जिसे आप संत कहते है हम उसे औरंगजेब कहते है, यह हिंदू कहने लायक नहीं है। यह मंदिर तोड़ने का समर्थन करने वाला आदमी है, 150 से ज्यादा मंदिर तोड़ दिए गए।

बीजेपी के लिए चिंता क्या?

काशी हिंदुओं की आस्था का केंद्र है। काशी के स्थानीय लोग इस तोड़फोड़ से खुश नहीं हैं। लोगों का कहना है कि स्थानीय संस्कृति खतरे में डाली जा रही है। काशी की पहचान संकरी गलियां, पुराने मंदिर, वहां की भाषा रही है। अब वहां इन्हें तोड़कर 5 स्टार होटल बनाए जा रहे हैं। धर्मगुरु भी बीजेपी के खिलाफ आ गए हैं। काशी में मंदिरों को तोड़ने जाने के सबसे ज्यादा खिलाफ शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती रहे हैं। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और योगी आदित्यनाथ की तुलना औरंगजेब से करते हुए कहा था कि इतनी मूर्तियां उनके शासन में नहीं तोड़ी गईं, जितनी बीजेपी सरकार में तोड़ी गईं हैं।

काशी। Photo Credit: PTI

ब्राह्मणों के लिए फरमान देकर फंसी है बीजेपी

23 दिसंबर 2025 की बात है। बीजेपी विधायक पीएन पाठक के आवास पर एक कार्यक्रम के दौरान 52 विधायकों का जमावड़ा हुआ। कहा गया कि यूपी के ब्राह्मण विधायक, योगी आदित्यनाथ से नाराज हैं, इसलिए पीएन पाठक के घर बैठक कर रहे रहे हैं। बीजेपी की खूब किरकिरी हुई। ब्राह्मण समाज के नेताओं के लिए यूपी बीजेपी अध्यक्ष ने एक फरमान तक जारी किया कि भविष्य में ऐसी बैठकें न होने पाएं।

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पकंज चौधरी, अध्यक्ष, यूपी बीजेपी:-
भारतीय जनता पार्टी, सर्व समाज की पार्टी है। किसी को भी हमारा संविधान इसकी इजाजत नहीं देता है कि भारतीय जनता पार्टी के जन प्रतिनिधि जाति आधार पर बैठक करें। हमने एक सूचना दी है, चेतावनी भी है, बात भी की है, निर्देश और चेतावनी दी है कि इस तरह की कोई बैठक भविष्य में न हो

ब्राह्मण समाज के नेताओं ने मुखर होकर, इस फरमान का विरोध किया था। राजपूत नेताओं ने भी इसके लिए बोला था। बीजेपी नेता बृजभूषण शरण सिंह ने कहा था कि अगर दूसरी जातियां बैठक कर सकती हैं, तो ब्राह्मण क्यों नहीं बैठक कर सकते हैं। कई दूसरे नेताओं ने भी कहा था कि अगर राजपूत, कुर्मी, यादव, पिछड़ों की जातीय बैठकें हो सकती हैं फिर ब्राह्मण समाज की इस बैठक से दिक्कत क्या है। ब्राह्मणों को ही क्यों निशाने पर लिया जा रहा है।

चिंता क्या है?

यूपी में ब्राह्मण मजबूत स्थिति में हैं। 258 विधायकों में 42 ब्राह्मण विधायक हैं, जिनका असर दूसरी सीटों पर भी है। कुल मतदाताओं का लगभग 12 फीसदी हिस्सा ब्राह्मण है। समाजवादी पार्टी ने, पंकज चौधरी के बयान की निंदा की थी और ब्राह्मणों को अपनी तरफ आने का न्योता दिया था। बहुजन समाज पार्टी के नेताओं ने भी इस बयान की आलोचना की थी। यूजीसी विवाद के बाद अब एक बार फिर सरकार घिर गई है। 

4 चक्रव्यूह, कैसे पार पाएगी बीजेपी?

बीजेपी के सामने 4 चक्रव्यूह है। काशी, शंकराचार्य, ब्राह्मण और यूजीसी। इन सभी मुद्दों पर खूब सरकार की किरकिरी हो रही है। बीजेपी के अपने ही उनसे नाराज हैं। बीजेपी के स्थानीय स्तर के कई नेता इन प्रकरणों में अब तक इस्तीफा दे चुके हैं। सरकार के खिलाफ लोग मुखर होकर लिख रहे हैं कि इन फैसलों की वजह से बीजेपी अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार रही है। एक तरफ बीजेपी जन आक्रोश का सामना कर रही है, दूसरी तरफ विपक्ष इसे अवसर की तरह देख रहा है।