असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा, भारतीय जनता पार्टी (BJP) के पोस्टबॉय बनते जा रहे हैं। चुनाव चाहे झारखंड में हो या बिहार में, हिमंत बिस्व सरमा अपनी पार्टी के स्टार प्रचारकों में शामिल रहते हैं। पूर्वोत्तर में बीजेपी के सबसे बड़े चेहरे हैं। असम में उनकी रैलियों में हजारों लोग जुड़ते हैं, हर दिन वह कहीं न कहीं जनसभा करते हैं, लोगों से मिलते हैं। राज्य में एनडीए की प्रचंड जीत की दावेदारी करने वाले मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा को अब असम में हारने का डर सता है। उन्होंने बोडोलैडं टैरिटोरियल काउंसिल (BTC) में हार का डर सता रहा है। 

हिमंत बिस्व सरमा का सियासी टोन बदला है। वह प्रंड बहुमत का दावा करने वाले नेताओं में से एक हैं, लेकिन अभी से मान ले रहे हैं कि कहां उनकी पार्टी 22 सीटें गंवाने वाली है। बीजेपी 22 विधानसभा सीटों पर अपने प्रत्याशी नहीं उतार रही है। हिमंत का कहना है कि जिन सीटों पर उनकी पार्टी को वोट नहीं मिलेगा, वहां क्यों पार्टी अपने प्रत्याशी उतारेगी। वह सत्ता बचाने के लिए नए गठबंधन की कवायद में हैं। 

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हिमंत बिस्वा सरमा, मुख्यमंत्री, असम:-
जहां हमारे समर्थक नहीं हैं, वहां उम्मीदवार उतारकर हमें क्या मिलेगा? अगर कोई फ्रेंडली पार्टी वहां चुनाव लड़ना चाहती है तो वे लड़ सकते हैं। अगर हम वहां चुनाव लड़ेंगे तो हमें कौन वोट देगा?


क्यों निराश हैं हिमंत बिस्व सरमा?

बोडोलैंड टेरिटोरियल काउंसिल (BTC) में बीते साल 2025 में चुनाव हुए थे। इस चुनाव के नतीजे बीजेपी के पक्ष में नहीं थे। BTC में मिली हार का डर उन्हें विधानसभा चुनावों के लिए भी सता रहा है। ऐसा इसलिए है कि जिस इलाके में बीजेपी की हार हुई थी, वहां से 15 सीटें आतीं हैं। बोडोलैंड टेरिटोरियल काउंसिल के अंतर्गत कुल 15 विधआनसभा सीटें आती हैं। असम में इसी साल विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। 22 सीटों पर बीजेपी पहले ही उम्मीदवार उतारने से मना कर चुकी है। असम में कुल विधानसभा सीटें 126  हैं। 27 सीटें के नतीजों को लेकर बीजेपी पहले ही डरी हुई है। डर ऐसा है कि पार्टी के कर्ता-धर्ता हिमंत बिस्व सरमा खुद कह रहे हैं कि बहुत निश्चिंत नहीं हैं कि वह यह चुनाव जीत रहे हैं।

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Himanta Biswa Sarma

हिमंत बिस्व सरमा:-
हम BTC चुनाव हार चुके हैं। अब मैं यह नहीं कह सकता हूं कि हम विधानसभा चुनावों में हम जीत रहे हैं या नहीं।


किसकी जीत से घबराए हैं हिमंत बिस्व सरमा?

बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंड (BPF) के चुनाव बीते साल सितंबर में हुए थे। यूनाइटेड पीपुल्स पार्टी लिबरल (UPPL) बीजेपी के साथ इस पर शासन कर रही थी। 40 सदस्यों के सदन वाले इस निकाय में बीजेपी सिर्फ 5 सीट जीत पाई थी। 

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हिमंत का डर कितना जायज है?

बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट अब भारतीय जनता पार्टी गठबंधन का हिस्सा है। एनडीए में मिलकर, बीटीसी निकाय पर बीजेपी शासन कर रही है। बीटीसी के अंतर्गत कुल 15 सीटें आती हैं, जिनमें बोडो वोट बेहद असम हैं। 10 विधानसभा सीटें ऐसी हैं, जिनमें जीत-हार बोडो समुदाय करता है। बीटीसी को भारतीय संविधान की छठवीं अनुसूची के तहत दर्जा मिला है। 

ऐसे तो फिसल जाएगा चुनाव?

अलग बात है कि बीटीसी का इतिहास रहा है कि जिस दल की राज्य में सत्ता होती है, उसी के साथ यहां की विजयी पार्टियां गठबंधन करती हैं। 22 अल्पसंख्यक बाहुल सीटों पर बीजेपी पहले से उम्मीदवार नहीं उतारती है। बोडो बाहुल 15 सीटों पर भी बीजेपी गठबंधन भरोसे है। कुल 126 विधानसभा सीटों में अगर 29 सीटें पर बीजेपी चूकी तो यह पार्टी को नुकसान पहुंचा सकता है। बहुमत के लिए 64 सीट चाहिए। अभी बीजेपी के पास 60 सीटें हैं, कांग्रेस के पास 29 सीटें हैं। गौरव गोगोई कांग्रेस की अगुवाई कर रहे हैं, हिमंत बिस्व सरमा को स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार पर घेर रहे हैं। ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (AIUDF) एक जमाने में उनकी सहयोगी रही है, अब विरोध में है। 

कांग्रेस की किस रणनीति से डरे हैं हिमंत?

कांग्रेस 126 सीटों में से 100 से ज्यादा सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारने की तैयारी में है। गठबंधन के दूसरे साथियों को कांग्रेस 26 से कम सीटों पर सिमटाएगी। जिन सीटों कांग्रेस खुद कमजोर है, वहां गठबंधन को आगे करेगी। जिन सीटों पर बीजेपी पिछड़ी है या कमजोर है, उन्हें कांग्रेस अवसर की तरह देख रही है।  कांग्रेस, अब रायजोर दल, असम जातीय परिषद, CPI और CPM से गठबंधन करेगी। हिमंत बिस्व सरमा को डर है कि कहीं कांग्रेस, इन 29 सीटों पर भारी न पड़ जाए। 

कितना मजबूत है बोडो समुदाय?

असम में बोडो मजबूत स्थिति में है। महाराष्ट्र में बोडो समुदाय की आबादी करीब 5.29 प्रतिशत है। असम में मुस्लिम आबादी करीब 1.07 करोड़ है। राज्य की कुल आबादी का 34 फीसदी हिस्सा मुसलमान है। मुस्लिम समुदाय कांग्रेस के कोर वोटर माने जाते रहे हैं। 27 जिलों में मुस्लिम वोटर जीत-हार तय करते हैं। 22 से ज्यादा सीटों पर मुस्लिम वोटर प्रभावी हैं। AIUDF की भी स्थिति मजबूत है। ओवैसी भी यहां दावेदारी पेश कर रहे हैं। 

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हिमंत की सबसे बड़ी वोट अपील क्या है?

हिमंत बिस्व सरमा असम और पूर्वोत्तर में घुसपैठ को चुनावी मुद्दा बना रहे हैं। उनकी चुनावी रणनीति में घुसपैठियों को बाहर निकालने की रणनीति है। वह झारखंड से लेकर बिहार तक, यही नारे लगा चुके हैं। उनका कहना है कि बांग्लादेश से होने वाली घुसपैठ, बड़ी समस्या है, इसलिए अगर पूर्वोत्तर में बीजेपी नहीं आई तो स्थितियां भयावह होंगी। 

हिमंत बिस्वा सरमा, मुख्यमंत्री, असम:-
त्रिपुरा, असम और बंगाल में घुसपैठियों को पकड़ा जा रहा है। यह एक बड़ी समस्या है। बंगाल राष्ट्रीय आह्वान पर जवाब नहीं दे रहा है। इसलिए असम चुनावों के साथ-साथ मैं बंगाल चुनावों को भी आशा से देख रहा हूं। अगर नॉर्थ-ईस्ट को बचाना है, तो हमें भारत-बांग्लादेश बॉर्डर पर बहुत कुछ करना होगा। इसलिए, त्रिपुरा, असम और बंगाल में हमारी सरकार होना ज़रूरी है।

बीजेपी और असम गण परिषद (AGP) मजबूत सहयोगी हैं। दोनों दलों के बीच समझौता है। यह समझौता साल 2016 से ही जारी है। बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंड भी एनडीए के साथ है। बीजेपी घुसपैठिए के अलावा डबल इंजन की सरकार, राज्य में विकास और बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं का हवाला दे रही है। बीजेपी इन्फ्रास्ट्रक्चर सुधारने का वादा कर रही है। हिमंत सरकार की अतिक्रमण विरोधी कार्रवाई भी सुर्खियों में रही है। असम में बीजेपी की सबसे बड़ी ताकत दो चेहरे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का क्रेज अभी पूर्वोत्तर से कम नहीं हुआ है, हिमंत की लोकप्रियता दूसरे नेताओं की तुलना में ज्यादा है। ऐसे में बीजेपी हिमंत-मोदी की जोड़ी के सहारे ही राज्य जीतने की बाट जोह रही है।