टिपरा मोथा पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रद्योत किशोर माणिक्य देबबर्मा लगातार त्रिपुरा की राजनीति में भारतीय जनता पार्टी, कांग्रेस और कम्यूनिस्ट पार्टी जैसी पुरानी पार्टियों के लिए चुनौती पेश कर रहे हैं। आदिवासी और उनके हितों की बात करके शाही जारघराने के देबबर्मा आदियावियों को जबरदस्त समर्थन हासिल कर रहे हैं, जिसका फायदा उन्हें चुनावों में मिल रहा है। प्रद्योत अपनी और अपनी पार्टी की ताकत 2023 के विधानसभा चुनाव में दिखा चुके हैं। उन्होंने पिछले चुनाव में कांग्रेस और कम्यूनिस्ट पार्टी से भी बेहतर प्रदर्शन करते हुए 13 सीटें जीत ली थीं। यह टिपरा मोथा का पहला विधानसभा चुनाव था।

 

अब एक बार फिर प्रद्योत देबबर्मा अपनी ताकत दिखाने जा रहे हैं। इस बार उन्होंने सत्ताधारी पार्टी बीजेपी को चुनौती दी है। उन्होंने शनिवार को कहा कि उनकी पार्टी आने वाले त्रिपुरा ट्राइबल एरियाज ऑटोनॉमस डिस्ट्रिक्ट काउंसिल (TTAADC) चुनाव में सभी 28 सीटों पर चुनाव लड़ेगी और बीजेपी को हराएगी। उनकी इस घोषणा के बाद बीजेपी के खेमें में हलचल पैदा हो गई है। ऐसे में आइए जानते हैं कि प्रद्योत देबबर्मा अपनी सहयोगी पार्टी बीजेपी को ही चैलेंज क्यों देने लगे हैं...

टिपरा मोथा और बीजेपी का गठबंधन

दरअसल, टिपरा मोथा के नेता प्रद्योत देबबर्मा काफी समय से राज्य में आदिवासियों के लिए 'ग्रेटर टिपरालैंड' बनाने की मांग कर रहे हैं। इसी मांग को लेकर उन्होंने 2023 के विधानसभा चुनाव में शानदार जीत दर्ज की थी। विधानसभा चुनाव में त्रिपुरा की कोई भी पार्टी अकेले आदिवासी मुद्दों पर इतना मजबूत समर्थन नहीं जुटा पा रही थी। मगर, देबबर्मा ने दिखा दिया कि राज्य के आदिवासी उनपर भरोसा करते हैं। 

 

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टिपरा मोथा की मजबूती को देखते हुए बीजेपी ने पार्टी अध्यक्ष प्रद्योत देबबर्मा से संपर्क साधा और कई दौर की बातचीत के बाद उनसे गठबंधन कर लिया। इसके बाद टिपरा मोथा राज्य की बीजेपी के नेतृत्व वाली माणिक साहा सरकार में शामिल हो गए। पार्टी के कुछ नेता त्रिपुरा की सरकार में मंत्री भी हैं। वर्तमान में टिपरा मोथा और बीजेपी का गठबंधन है। यही वजह है कि दोनों पार्टियां एक साथ मिलकर 2024 का लोकसभा चुनाव लड़ी और जीत हासिल की।

बीजेपी के लिए समस्या कहां है?

प्रद्योत देबबर्मा ने 14 मार्च को त्रिपुरा ट्राइबल एरियाज ऑटोनॉमस डिस्ट्रिक्ट काउंसिल (TTAADC) के हेडक्वार्टर के पास खुमुलवंग में मोटर स्टैंड पर एक बड़ी रैली को संबोधित किया। उनकी रैली में हजारों लोग शामिल होने और उन्हें सुनने आए। इस सभा में उन्होंने अपनी सहयोगी को चुनौती देते हुए कहा कि टिपरा मोथा आगामी चुनाव बीजेपी के खिलाफ लड़ेगी और सभी 28 सीटों पर उसे हराएगी।

 

 

देबबर्मा ने कहा कि टिपरा मोथा के लड़ाकू कार्यकर्ता हर चुनाव क्षेत्र में बीजेपी का मुकाबला करने के लिए तैयार हैं। उन्होंने कहा, 'मुख्यमंत्री माणिक साहा ने कहा है कि वे जिला परिषद की 28 सीटों पर चुनाव लड़ेंगे। लेकिन उनके लिए एक समस्या होगी, टिपरा मोथा के कार्यकर्ता सभी 28 सीटों पर चुनाव लड़ेंगे और आपको हराएंगे।'

 

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प्रद्योत देबबर्मा ने त्रिपुरा में मौजूदा राजनीतिक बहस की आलोचना की। उन्होंने बीजेपी का नाम लिए बगैर दावा किया कि पार्टियां 'टिपरासा समुदाय' को प्रभावित करने वाले मुद्दों, जैसे गरीबी, शिक्षा, सड़क, पानी और जमीन के अधिकार के बजाय धार्मिक बंटवारे पर ध्यान लगा रहे हैं।

'बीजेपी के लालच में ना आना'

उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि बीजेपी ने टिपरा मोथा के साथ गठबंधन तोड़ने का दावा किया। उन्होंने कहा कि जब उन्होंने बीजेपी के सामने 'तिप्रासा समझौते' के लिए जोर देने लगे तो उनकी आवाज दबाने की कोशिश की जा रही है। देबबर्मा ने चुनावों के दौरान वोटरों को सियासी लालच के खिलाफ भी आगाह किया और आरोप लगाया कि सत्ताधारी बीजेपी लोगों को पैसे और वादों से लुभाने की कोशिश कर सकती है।

 

उन्होंने कहा कि मेरा संघर्ष हमेशा गरीबों की भलाई के लिए रहा है। उन्होंने पिछले छह सालों से राजनीतिक दबाव और आलोचना झेली है, लेकिन वह तिप्रासा के लोगों के अधिकारों और भविष्य के लिए लड़ने के लिए प्रतिबद्ध हैं। उन्होंने कहा, 'खुमुलवंग से मैं यह कहता हूं कि हम बीजेपी को हराने के लिए तैयार हैं। चुनौती स्वीकार है।'

 

ग्रेटर टिपरालैंड क्या है?

टिपरा मोथा और इसके नेता प्रद्योत देबबर्मा की राजनीति फिलहाल ग्रेटर टिपरालैंड पर टिकी हुई है। इसी से राज्य के आदिवासियों के हित जुड़े हुए हैं। उनकी मुख्य मांग ग्रेटर टिपरालैंड है। इसका मकसद त्रिपुरा के आदिवासी लोगों के लिए अधिक राजनीतिक-प्रशासनिक अधिकार और सुरक्षा सुनिश्चित करना है। राज्य के आदिवासी यहां के मूल निवासी माने जाते हैं।

ग्रेटर टिपरालैंड से क्या मिलेगा?

  • त्रिपुरा ट्राइबल एरिया ऑटोनॉमस डिस्ट्रिक्ट काउंसिल को ज्यादा शक्तियां देना।
  • त्रिपुरा के बाहर रहने वाले टिपरासी आदिवासियों को भी इस ढांचे से जोड़ना।
  • आदिवासी भाषा, संस्कृति और जमीन के अधिकार की संवैधानिक सुरक्षा देना शामिल है।

इसकी मांग क्यों उठी?

दरअसल, त्रिपुरा के इतिहास में समय के साथ में बड़ा जनसंख्या बदलाव हुआ। आजादी के बाद पूर्वी पाकिस्तान (1947) और 1971 के बाद बाग्लादेश से बड़ी संख्या में बंगाली शरणार्थी त्रिपुरा में रहने के लिए आए। इससे त्रिपुरा में पहले से रह रही आदिवासी आबादी अल्पसंख्यक हो गई। आदिवासी संगठनों का कहना है कि उनकी जमीन, संस्कृति और राजनीतिक प्रतिनिधित्व राज्य में कम हो गया। यही वजह है कि आदिवासियों के साथ में टिपरा मोथा भी अलग स्वायत्त क्षेत्र की मांग करते हैं।