लखनऊ। उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले जातीय समीकरणों को मजबूत करने की सियासी जंग तेज हो गई है। यादव और कुर्मी समाज के बाद अब पाल, बघेल और धनगर समाज पर भी राजनीतिक दलों की नजरें टिक गई हैं। वजह साफ है इस समाज की मौजूदगी प्रदेश के कई जिलों में है और करीब 35 से 40 विधानसभा सीटों पर इसके मतदाता चुनावी नतीजों को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं। ऐसे में बीजेपी, सपा और बसपा तीनों इस समाज को अपने साथ जोड़ने की रणनीति पर काम कर रही हैं। पाल समाज की राजनीति को केवल आबादी के आंकड़ों से समझना पर्याप्त नहीं है। असली सवाल यह है कि इस समाज का समर्थन किस पार्टी को मिलता है, कौन-सा नेता इसकी राजनीतिक आवाज बनता है और किस क्षेत्र में इसके मतदाता चुनावी मुकाबले का रुख बदल सकते हैं। 2027 के चुनाव में यही समीकरण कई सीटों पर अहम भूमिका निभा सकता है।

उत्तर प्रदेश में पाल, बघेल, धनगर और गड़रिया समुदाय की आबादी को लेकर अलग-अलग अनुमान सामने आते हैं। एक अनुमान के मुताबिक, इन समुदायों की संयुक्त आबादी प्रदेश की कुल जनसंख्या का लगभग 3 से 4 प्रतिशत मानी जाती है। इस समाज की राजनीतिक अहमियत इसलिए बढ़ जाती है, क्योंकि कई विधानसभा क्षेत्रों में जीत और हार का अंतर कम रहता है। ऐसे में किसी समुदाय के कुछ हजार मतदाता भी चुनावी मुकाबले में निर्णायक साबित हो सकते हैं। पाल समाज का प्रभाव ब्रज, रुहेलखंड और बुंदेलखंड के साथ-साथ कानपुर देहात, इटावा, प्रयागराज, औरैया, जालौन, झांसी, ललितपुर, महोबा, मीरजापुर, अलीगढ़, हाथरस, आगरा, कन्नौज, फर्रुखाबाद, बदायूं, बरेली और मुरादाबाद जैसे जिलों में बताया जाता है।अवध के फतेहपुर, रायबरेली और प्रतापगढ़ जैसे जिलों में भी इस समाज की मौजूदगी है। 

BJP के पास मंत्री से लेकर सांसद तक चेहरे

बीजेपी ने पाल समाज के नेताओं को संगठन और सरकार में जगह देकर इस समुदाय के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश की है। अजीत सिंह पाल सिकंदरा विधानसभा सीट से विधायक चुने गए थे और योगी सरकार में स्वतंत्र प्रभार वाले राज्य मंत्री हैं। रावेंद्र पाल सिंह छर्रा से तथा प्रेमपाल धनगर टूंडला से विधायक हैं।केंद्र सरकार में एसपी सिंह बघेल भी इस समाज से आने वाले प्रमुख नेताओं में शामिल हैं। वह आगरा से लोकसभा सांसद चुने गए। वहीं, प्रकाश पाल को राज्यसभा भेजे जाने को भी समाज के बीच राजनीतिक प्रतिनिधित्व बढ़ाने के प्रयास के तौर पर देखा जा रहा है।बीजेपी की रणनीति केवल चुनावी टिकट तक सीमित नहीं है। संगठन में जिम्मेदारी, सरकार में प्रतिनिधित्व और स्थानीय स्तर पर नेताओं की सक्रियता के जरिए वह इस समाज को अपने साथ बनाए रखना चाहती है। 

 

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सपा ने श्यामलाल पाल को आगे कर बनाया समीकरण

सपा भी पाल समाज को अपने राजनीतिक आधार से जोड़ने की कोशिश कर रही है। पार्टी ने श्यामलाल पाल को प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी देकर इस समुदाय को संगठन में प्रमुख स्थान दिया। सपा की कोशिश है कि पिछड़े वर्गों के बीच अपना समर्थन बढ़ाया जाए और बीजेपी को जातीय समीकरणों के मोर्चे पर चुनौती दी जाए।2022 के विधानसभा चुनाव में सपा के टिकट पर समर पाल सिंह अमरोहा की नौगावां सादात सीट से जीते थे। पूजा पाल भी चायल विधानसभा सीट से सपा के टिकट पर विधायक बनी थीं। बाद में पूजा पाल बीजेपी खेमे में चली गईं। इससे यह स्पष्ट होता है कि पाल समाज के नेताओं की राजनीतिक स्थिति समय के साथ बदलती रही है और इस समुदाय का समर्थन किसी एक दल तक सीमित नहीं रहा।

BSP ने विश्वनाथ पाल पर लगाया दांव

बसपा के लिए भी पाल समाज अहम राजनीतिक आधार रहा है। पार्टी ने विश्वनाथ पाल को प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी देकर इस समुदाय को दोबारा मजबूत तरीके से जोड़ने की कोशिश की है। बसपा की रणनीति अति पिछड़े वर्गों के बीच अपना जनाधार बढ़ाने और पुराने सामाजिक समीकरणों को फिर से सक्रिय करने की है।पाल समाज के नेताओं का बसपा से पुराना जुड़ाव रहा है।

 

प्रयागराज के पूर्व विधायक राजू पाल को मायावती ने राजनीति में आगे बढ़ाया था। उनकी हत्या के बाद पूजा पाल राजनीति में प्रमुख चेहरा बनीं। समय के साथ नेताओं के दल बदलने और नए राजनीतिक समीकरण बनने से इस समुदाय का समर्थन अलग-अलग पार्टियों में बंटता रहा है।ऐसे में बसपा के सामने चुनौती पुराने समर्थकों को वापस जोड़ने के साथ नए मतदाताओं तक पहुंच बनाने की भी है। विश्वनाथ पाल की संगठनात्मक भूमिका इसी रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा मानी जा रही है।

 

किसी एक के साथ नहीं रहा पाल समाज

पाल समाज के राजनीतिक रुख को समझने के लिए उसके बदलते चुनावी इतिहास पर नजर डालना जरूरी है। शुरुआती दौर में इस समुदाय का एक हिस्सा कांग्रेस के साथ रहा। बाद में बसपा के उभार के साथ इसके मतदाताओं का एक वर्ग बसपा की ओर गया। आगे चलकर बीजेपी ने भी इस समाज में अपना आधार बढ़ाया, जबकि सपा को भी अलग-अलग चुनावों में समर्थन मिलता रहा।यानी पाल समाज को किसी एक पार्टी का स्थायी वोटबैंक मानना सही नहीं होगा। अलग-अलग सीटों पर उम्मीदवार की छवि, स्थानीय नेतृत्व, विकास के मुद्दे, रोजगार, सामाजिक प्रतिनिधित्व और पार्टी की चुनावी रणनीति मतदाताओं के फैसले को प्रभावित कर सकते हैं। यही कारण है कि बीजेपी, सपा और बसपा तीनों समाज के नेताओं को संगठन में जगह देने और राजनीतिक प्रतिनिधित्व बढ़ाने पर जोर दे रही हैं। चुनाव के नजदीक आते ही यह प्रतिस्पर्धा और तेज होने की संभावना है।

 

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2027 में किसका बनेगा मजबूत सामाजिक समीकरण?

उत्तर प्रदेश की राजनीति में बड़े जातीय समूहों के साथ छोटे और अति पिछड़े समुदायों की भूमिका भी कई सीटों पर अहम हो सकती है। पाल, बघेल और धनगर समाज के मतदाताओं को साधने की कोशिश इसी व्यापक राजनीतिक रणनीति का हिस्सा है। बीजेपी जहां अपने संगठन और सत्ता में भागीदारी के आधार पर समर्थन बनाए रखना चाहती है, वहीं सपा पिछड़े वर्गों के व्यापक गठजोड़ को मजबूत करने में जुटी है। बसपा भी अपने पुराने सामाजिक आधार को फिर से सक्रिय करने की कोशिश कर रही है।

 

हालांकि, 2027 में पाल समाज किस पार्टी के साथ जाएगा, इसका फैसला अभी तय नहीं है। समुदाय के भीतर क्षेत्रीय अंतर और स्थानीय मुद्दे चुनावी रुख को प्रभावित करेंगे। केवल जातीय समीकरण के भरोसे जीत सुनिश्चित नहीं की जा सकती, लेकिन करीबी मुकाबले वाली सीटों पर यह समीकरण महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।