उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले महिला मतदाताओं को अपने पाले में लाने की सियासी जंग तेज हो रही है। कभी पुरुषों के मुकाबले कम मतदान करने वाली महिलाएं अब चुनावी नतीजों को प्रभावित करने वाली बड़ी ताकत बन चुकी हैं। 2007 में जहां यूपी में सिर्फ 41.92 फीसदी महिलाओं ने मतदान किया था, वहीं 2022 के विधानसभा चुनाव में यह आंकड़ा बढ़कर 62.24 फीसदी पहुंच गया। महिला मतदान में करीब 20 प्रतिशत अंक की यह बढ़ोतरी बताती है कि आधी आबादी की राजनीतिक भागीदारी कितनी अहम हो चुकी है। प्रदेश में 6 करोड़ 9 लाख से अधिक महिला मतदाता हैं। बीजेपी इसे अपने मजबूत आधार के रूप में देखती है, जबकि समाजवादी पार्टी और कांग्रेस इस वोटबैंक में सेंध लगाने की तैयारी में हैं। ऐसे में बड़ा सवाल है कि क्या विपक्ष मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के महिला वोटबैंक को चुनौती दे पाएगा?

 

उत्तर प्रदेश में पिछले विधानसभा चुनावों के मतदान आंकड़े महिला मतदाताओं की बढ़ती भागीदारी की कहानी बयां करते हैं। वर्ष 2007 में महिलाओं का मतदान प्रतिशत 41.92 था, जबकि पुरुषों का मतदान 49.35 फीसदी रहा था। इसके बाद 2012 में महिला मतदान बढ़कर 60.28 फीसदी पहुंच गया और पुरुषों का आंकड़ा 58.68 फीसदी रहा। यानी महिलाओं ने पहली बार पुरुषों से अधिक मतदान करके चुनावी तस्वीर में अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज कराई।

 

यह भी पढ़ें: सपा के 5 पासी सांसद, BJP कमजोर, कैसे सधेगी यूपी में राजनीति?

 

2017 के विधानसभा चुनाव में महिला मतदान करीब 63.3 फीसदी तक पहुंच गया, जबकि पुरुषों का मतदान लगभग 59.2 फीसदी रहा। 2022 में महिलाओं का मतदान 62.24 फीसदी दर्ज किया गया, जबकि पुरुषों का आंकड़ा 59.56 फीसदी रहा। यानी 2012 से लगातार महिला मतदाताओं की भागीदारी पुरुषों से अधिक बनी हुई है।ये आंकड़े बताते हैं कि महिलाएं अब केवल चुनावी प्रक्रिया में हिस्सा लेने वाला समूह नहीं, बल्कि राजनीतिक दलों की जीत-हार का समीकरण बदलने की क्षमता रखने वाला मतदाता वर्ग हैं। यही वजह है कि 2027 के चुनाव से पहले सभी प्रमुख दल महिला मतदाताओं को अपनी रणनीति के केंद्र में रख रहे हैं।

यूपी में 6.09 करोड़ महिला मतदाता

उत्तर प्रदेश की 2026 की अंतिम मतदाता सूची के मुताबिक, प्रदेश में कुल 13 करोड़ 39 लाख 44 हजार 792 मतदाता हैं। इनमें 6 करोड़ 9 लाख 9 हजार 525 महिला मतदाता हैं। कुल मतदाताओं में महिलाओं की हिस्सेदारी करीब 45.46 फीसदी है।इतनी बड़ी संख्या में महिला मतदाताओं की मौजूदगी चुनावी रणनीति को सीधे प्रभावित करती है।

 

हालांकि, मतदाता सूची में महिलाओं की संख्या और मतदान करने वाली महिलाओं का प्रतिशत अलग-अलग आंकड़े हैं। सभी महिला मतदाताओं का समर्थन किसी एक दल को मिलना भी तय नहीं है। उनकी प्राथमिकताएं क्षेत्र, सामाजिक स्थिति और स्थानीय समस्याओं के अनुसार बदल सकती हैं।फिर भी, महिला मतदाताओं की बढ़ती भागीदारी ने राजनीतिक दलों को अपनी पुरानी रणनीतियों पर दोबारा विचार करने के लिए मजबूर किया है। अब सवाल केवल जातीय समीकरण साधने का नहीं, बल्कि महिलाओं की सुरक्षा, आर्थिक स्थिति और सरकारी योजनाओं से जुड़े अनुभवों के आधार पर उनका भरोसा जीतने का भी है।

 

यह भी पढ़ें: भदोही: बृजेश सिंह के बेटे अमित सिंह लड़ेंगे विधानसभा चुनाव, चिंता किसे है?

महिला वोटबैंक से मजबूत हुई बीजेपी की पकड़

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में बीजेपी महिला सुरक्षा, कानून-व्यवस्था और सरकारी कल्याणकारी योजनाओं को अपनी प्रमुख उपलब्धियों के रूप में पेश करती रही है। राशन, उज्ज्वला योजना, आवास और अन्य योजनाओं का लाभ सीधे परिवारों तक पहुंचाने की रणनीति को भी पार्टी अपनी राजनीतिक ताकत मानती है।2022 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी को महिला मतदाताओं का समर्थन पुरुषों के मुकाबले अधिक मिला था। लोकनीति-सीएसडीएस के चुनावोत्तर सर्वेक्षण के मुताबिक, 48 फीसदी महिलाओं ने बीजेपी का समर्थन किया था, जबकि पुरुष मतदाताओं में यह आंकड़ा 44 फीसदी था। इस अंतर ने चुनाव में महिला वोटबैंक की अहमियत को रेखांकित किया।बीजेपी की रणनीति में महिला सुरक्षा और अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई प्रमुख मुद्दे रहे हैं। पार्टी इन कदमों को महिलाओं के बीच सुरक्षा का भरोसा बढ़ाने से जोड़ती है। हालांकि, आगामी चुनाव में महंगाई, रोजगार, स्वास्थ्य सुविधाएं और स्थानीय समस्याएं भी मतदाताओं के फैसले को प्रभावित कर सकती हैं।

डिंपल यादव के सहारे सपा की नजर महिला वोट पर

बीजेपी के मजबूत महिला वोटबैंक को चुनौती देने के लिए समाजवादी पार्टी अपनी राजनीतिक पहुंच बढ़ाना चाहती है। सांसद डिंपल यादव पार्टी की प्रमुख महिला नेताओं में शामिल हैं। उनके साथ इकरा हसन और प्रिया सरोज जैसी महिला नेताओं की मौजूदगी भी सपा को महिलाओं के बीच संवाद बढ़ाने का अवसर देती है।सपा की कोशिश महिला सुरक्षा, सम्मान, रोजगार और आर्थिक सशक्तीकरण जैसे मुद्दों को उठाकर अपनी स्वीकार्यता बढ़ाने की है। महिलाओं को आर्थिक मदद देने जैसे प्रस्ताव भी चुनावी बहस में अहम भूमिका निभा सकते हैं। लेकिन पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपनी विश्वसनीयता मजबूत करने की है।बीजेपी लगातार सपा के पिछले शासनकाल की कानून-व्यवस्था को लेकर सवाल उठाती रही है। ऐसे में सपा को स्पष्ट करना होगा कि उसकी सरकार बनने पर महिलाओं की सुरक्षा और आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए क्या ठोस कदम उठाए जाएंगे। 

आराधना मिश्रा के जरिए कांग्रेस का दांव

कांग्रेस ने आराधना मिश्रा ‘मोना’ को प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी देकर महिला नेतृत्व को आगे बढ़ाने का संदेश दिया है। पार्टी की कोशिश महिला अधिकारों, सुरक्षा और सशक्तीकरण के मुद्दों के जरिए अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने की है।हालांकि, कांग्रेस के सामने संगठन को मजबूत करने की चुनौती भी है। महिला नेतृत्व को आगे करने के साथ पार्टी को बूथ स्तर पर सक्रियता बढ़ानी होगी और महिलाओं की स्थानीय समस्याओं पर लगातार काम करना होगा। नेतृत्व में बदलाव से राजनीतिक संदेश जरूर जाता है, लेकिन उसका चुनावी फायदा तभी मिल सकता है, जब वह मतदाताओं के भरोसे में भी बदले।

 

यह भी पढ़ें: आजम खान की बढ़ीं मुश्किलें, जौहर यूनिवर्सिटी पर नई FIR, 416 करोड़ का हिसाब नहीं

2027 में किसके साथ जाएगी आधी आबादी?

उत्तर प्रदेश में महिला मतदान का बढ़ता प्रतिशत बताता है कि आधी आबादी को नजरअंदाज करके चुनावी सफलता हासिल करना आसान नहीं होगा। बीजेपी अपने मजबूत महिला समर्थन को बचाने की कोशिश करेगी, जबकि सपा और कांग्रेस इस आधार में सेंध लगाने के लिए रणनीति बनाएंगी।महिला मतदाताओं के फैसले में सुरक्षा के साथ महंगाई, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और सरकारी योजनाओं का लाभ भी महत्वपूर्ण हो सकता है। अलग-अलग क्षेत्रों में महिलाओं की प्राथमिकताएं अलग होने के कारण किसी एक मुद्दे या राजनीतिक चेहरे के आधार पर पूरे महिला वोटबैंक का रुख तय मानना जल्दबाजी होगी।2027 के चुनाव में 6.09 करोड़ से अधिक महिला मतदाताओं का रुख सत्ता का समीकरण बदलने की क्षमता रखता है। बीजेपी के सामने अपने समर्थन को कायम रखने की चुनौती है, तो सपा और कांग्रेस के लिए महिला मतदाताओं के बीच भरोसा पैदा करना सबसे बड़ा इम्तिहान होगा।