पश्चिम बंगाल में बंगाली अस्मिता प्रबल है। यहां के लोग राज्य की संस्कृति, सभ्यता, साहित्य, भाषा, बौद्धिक क्षमता और बंगाली पहचान को काफी गंभीरता से लेते हैं। इसलिए बंगाल की राजनीति में इसकी पहचान से जुड़े ये शब्द साफ झलकते हैं। राज्य में इनमें से किसी भी शब्द का दुरुपयोग होने पर इसका असर राजनीति पर पड़ता है। बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी राज्य में होने वाले विधानसभा चुनावों से पहले सक्रिय हैं। उन्होंने चुनाव की घोषणा होने से पहले ही 'बांग्ला' (Bangla) का जिक्र छेड़ दिया है और पासा बीजेपी और केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार के पास फेंक दिया है।
दरअसल, पिछले दिनों केंद्रीय मंत्रिमंडल ने केरल राज्य का नाम बदलकर 'केरलम' करने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी। इसके बाद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने केंद्र पर राजनीतिक भेदभाव करने का गंभीर आरोप लगा दिया। उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल का नाम बदलकर 'बांग्ला' करने की मांग कर दी। कहा कि बांग्ला का प्रस्ताव सालों से धूल फांक रहा है, लेकिन केंद्र सरकार इसे मंजूरी नहीं दे रही।
ममता बनर्जी ने हमला करते हुए कहा, 'क्योंकि वह लोग बंगाल विरोधी हैं, इसलिए हमारे प्रस्तावों को कभी स्वीकार नहीं करते। केरल में माकपा (CPIM) और बीजेपी के बीच मिलीभगत है, इसलिए वहां का रास्ता साफ कर दिया गया।' उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार केवल इसलिए बंगाल की मांग को दबा रही है क्योंकि राज्य सरकार उनके सामने झुकने को तैयार नहीं है। ऐसे में आइए जानते हैं कि ममता बनर्जी का 'बांग्ला' प्रस्ताव क्या है...
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ममता बनर्जी का बांग्ला प्रस्ताव
तृणमूल कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष ममता बनर्जी का तर्क है कि 'पश्चिम बंगाल' नाम राज्य की संस्कृति, सभ्यता, बौद्धिक क्षमता और बंगाली अस्मिता को पूरी तरह से नहीं दर्शाता। जबकि 'बांग्ला' नाम बंगाली भाषा और परंपरा से सीधे जुड़ा हुआ है। ऐसे में ममता बनर्जी का बांग्ला प्रस्ताव पश्चिम बंगाल राज्य के आधिकारिक नाम को बदलकर सीधे बांग्ला करने की मांग से जुड़ा हुआ है।

दरअसल, बांग्ला प्रस्ताव को तृणमूल कांग्रेस सरकार लंबे समय से उठा रही है। वह इस मुद्दे को मुख्य तौर पर बंगाल की भाषाई, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पहचान को बेहतर ढंग से प्रतिबिंबित करने के लिए। ममता बनर्जी का तर्क है कि पश्चिम बंगाल नाम राज्य की संस्कृति, सभ्यता, बौद्धिक क्षमता और बंगाली अस्मिता को पूरी तरह से नहीं दर्शाता, जबकि बांग्ला नाम बंगाली भाषा और परंपरा से सीधे जुड़ा हुआ है।
'बांग्ला प्रस्ताव' के मुख्य बिंदु और इतिहास
सबसे पहले साल 2018 में पश्चिम बंगाल विधानसभा ने सर्वसम्मति से इस बांग्ला प्रस्ताव को पारित किया था। प्रस्ताव को पारित करवाने के बाद इसे केंद्र की मोदी सरकार को भेजा गया था। यह प्रस्ताव तत्कालीन ममता बनर्जी सरकार ने भेजा था। ममता सरकार ने इसके बाद भी कई बार विधानसभा से इसको लेकर संकल्प पारित किए गए, जिसमें नाम को अंग्रेजी, हिंदी और बंगाली में एक समान 'बांग्ला' रखने की बात कही गई थी।
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हालांकि, केंद्र सरकार ने अब तक इस प्रस्ताव पर कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया है। यही वजह है कि बांग्ला प्रस्ताव आज भी लंबित पड़ा हुआ है। केंद्र सरकार के इसी रवैये को लेकर ममता बनर्जी बीजेपी और मोदी सरकार पर हमला कर रही हैं। उन्होंने आरोप लगाया है कि केंद्र 'बंगाली विरोधी' रवैया अपनाए हुए है। साथ ही ममता ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह को बांग्ला विरोधी कहा है।
ममता बनर्जी के केंद्र से तीखे सवाल
हाल ही में केंद्र सरकार ने केरल राज्य का नाम बदलकर 'केरलम' (Keralam) करने के प्रस्ताव को मंजूरी दी। इस फैसले के बाद ममता बनर्जी ने फिर से केंद्र पर हमला बोला और सवाल उठाया कि केरल की मांग तुरंत मान ली गई, लेकिन बांग्ला प्रस्ताव को सालों से क्यों लंबित रखा जा रहा है? उन्होंने कहा कि 'West Bengal' नाम की वजह से राज्य अल्फाबेटिकल लिस्ट में हमेशा आखिरी में आता है और यह भेदभाव है।
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने घोषणा करते हुए कहा है कि एक दिन जब केंद्र की सत्ता बदलेगी और वे बंगाल का नाम बांग्ला जरूर करवाएंगी। ऐसे में यह मुद्दा राज्य में राजनीतिक रूप से भी काफी गरमाया हुआ है।
