तमिलनाडु की सियासत में भारतीय जनता पार्टी, हमेशा से संघर्ष तो करती रही लेकिन व्यापक पहचान के लिए तरसती रही। साल 2014 से अब तक, केंद्र में लगातार तीसरी बार भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनी लेकिन तमिलनाडु हर बार बीजेपी के लिए एक सपने की तरह। बीजेपी, इस राज्य में गठबंधन के धर्म से बाहर नहीं निकल पाई। राज्य की 234 विधानसभा सीटों में से भारतीय जनता पार्टी को साल 2021 के चुनाव में सिर्फ 4 सीटों पर कामयाबी मिली। कर्नाटक में कई बार सत्ता में रही बीजेपी का तमिलनाडु अभियान हमेशा मुश्किल रहा। 

बीजेपी के लिए यह बढ़त थी लेकिन यह बढ़त उम्मीदों से बहुत कम थी। तमिलनाडु की पूरी राजनीति सिर्फ दो राजनीतिक दलों के बीच घूमती रही। द्रविड़ मुनेत्र कझगम (DMK) और ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कझगम (AIADMK)। दिलचस्प बात यह है कि दोनों दलों की विचारधारा एक है। दोनों दल एक ही नेता से प्रभावित हैं, दोनों का सियासी एजेंडा तक एक है। 

द्रविड़ मुनेत्र कझगम और AIADMK ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कझगम दोनों दल, मूल रूप से द्रविड़ आंदलोन से निकले हैं। दोनों दलों के प्रतीक पुरुष पेरियार हैं, उनके विचारों से ये दल प्रभावित है। पेरियार, द्रविड़ आंदोलन के प्रमुख नेता थे। उन्होंने जातिवाद, ब्राह्मणवाद, धार्मिक रूढ़िवादिता का विरोध किया और स्वाभिमान आंदोलन चलाया। उन्होंने द्रविड़ार गजकम की स्थापना की थी।

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आइए जानते हैं उन वजहों के बारे में, जिसके चलते DMK और AIADM तमिल राजनीति में छा गए, लेकिन बीजेपी नहीं। 

DMK और AIADM क्यों तमिल राजनीति में छाए हैं?

साल 1949 में अपने गुरु पेरियार से नाराज होकर सीएन अन्नादुरई ने नई पार्टी की नींव रखी। पार्टी का नाम डीएमके रखा। पेरियार चुनाव लड़ने के पक्षधर नहीं थे। इसी मुद्दे अन्नादुरई उनसे अलग हो गए। डीएमके की विचारधारा तो पेरियार की रही लेकिन सामाजिक न्याय, तर्कवाद, हिंदी विरोध, द्रविड़ पहचान को पार्टी ने आगे बढ़ाया। 

ऐसी ही राजनीति AIADMK की रही। इसके संस्थापक एमसी रामचंद्रन (MGR) थे। साल 1972 में इस पार्टी की स्थापना हुई। यह पार्टी, सीएन अन्नादुरई की विचारधारा से प्रभावित है। यह पार्टी पेरियार, अन्ना और एमजीआर की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाती है। अलग बात है कि अब ये पार्टियां, परिवारवादी के आरोपों में बुरी तरह घिरी हैं।

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तमिलनाडु में रोड शो करते प्रधानमंत्री मोदी। Photo Credit: PTI

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन, डीएमके के नेता हैं। उनके बेटे उदयनिधि स्टालिन के हाथों में पार्टी की कमान है। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम के स्टालिन के पिता एम करुणानिधि थे। एक ही परिवार की तीन पीढ़ियां राजनीति में हाथ-पांव आजमा रहीं हैं। 

संघ और बीजेपी के लिए तमिलनाडु की राह मुश्किल क्यों है?

तमिलनाडु की राजनीति में आर्य बनाम द्रविड़ की रही है। उन राजनीतिक पार्टियों ने यहां पांव जमा लिया, जिन्होंने हिंदुत्व और हिंदी संस्कृति का विरोध किया। तमिलनाडु की राजनीति और संस्कृति दोनों में बीजेपी ताल-मेल नहीं बिठा पाती है। तमिल राजनीति की शुरुत ही द्रविड़ आंदोलन से हुई है। इस विचारधारा के प्रवर्तक कहे जाने वाले पेरियार, तर्कवादी. ब्राह्मण-विरोधी, जाति-विरोधी और तमिल पहचान पर जोर देने वाले नेता रहे हैं। 

ऐसा नहीं है कि तमिलनाडु के लोग नास्तिक हैं। तमिलनाडु के लोग धार्मिक हैं। मंदिर, भक्ति, देवी-देवताओं में विश्वास रखते हैं। देश के अन्य राज्यों की तरह यहां सिर्फ हिंदू के तौर पर वे खुद को नहीं देखते हैं। तमिलनाडु में शैव-वैष्णव जैसे संप्रदायों के बीच पुरानी प्रतिद्वंद्विता रही है। तमिलनाडु में ब्राह्मणवादी परंपराओं का विरोध होता रहा है।

बीजेपी हिंदुत्व की राजनीति करती है। हिंदू धर्म को राजनीतिक ताकत बनाकर वोट मांगती है। बीजेपी सरकार, तीन भाषा नीति पर जोर देती है, जिसे लेकर सीएम स्टालिन ने राजनीति छेड़ दी थी। तमिलनाडु में यह तरीका काम नहीं करता क्योंकि यहां की धार्मिकता स्थानीय तमिल परंपराओं से जुड़ी हुई है, न कि संगठित हिंदुत्व राष्ट्रवाद से। 

 

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तमिलनाडु में रोड शो करते प्रधानमंत्री मोदी। Photo Credit: PTI

क्या हिंदुत्व के लिए तमिलनाडु में जगह नहीं है?

एमजी रामचंद्रन और जयललिता की राजनीति देखें तो ऐसा बिलकुल भी नहीं लगता। एमजीआर और जयललिता, दोनों AIADMK के बड़े नेता थे। MGR देवी मूकांबिका के बहुत भक्त थे। पूरे राज्य में देवी की पूजा होती है। जयललिता ने अयोध्या राम मंदिर के लिए ईंटें तक भेजीं और हिंदू भावनाओं का सम्मान किया। दिलचस्प बात यह है कि दोनों ने द्रविड़ राजनीति से दूरी नहीं बनाई, बल्कि उसके दायरे में ही इसे किया। बीजेपी वाले हिंदुत्व से लोग दूर रहे क्योंकि उसकी जगह, AIADMK ने भर ली। DMK हिंदुत्व के विरोध की राजनीति करती रही, AIADMK का उदार हिंदुत्व, बीजेपी पर भारी पड़ा। AIDMK विधानसभा चुनाव 2026 में बीजेपी की सहयोगी पार्टी है। 

बीजेपी, तमिलनाडु की जाति-विरोधी भावना में भी उलझ जाती है। तमिल संस्कृति में गैर ब्राह्मणों से पूजा कराने की मांग होती है। ब्राह्मणवाद को लेकर आक्रोश है। बीजेपी की राजनीति इससे अलग है। बीजेपी पर सवर्णों की पार्टी होने के आरोप भी लगते हैं। तमिलनाडु बीजेपी पर आरोप लगाता रहा है कि यह पार्टी, तमिलनाडु के साथ सौतेला व्यवहार करती है। केंद्र की कई विकास योजनाएं भी राज्य में लागू नहीं हो पाईं, नई शिक्षा नीति को लेकर भी तमिलनाडु में आक्रोश है। इन वजहों की वजह से बीजेपी के लिए राज्य में हमेशा मुश्किलें बढ़ीं रहीं। 


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तमिलनाडु में प्रधानमंत्री मोदी। Photo Credit: PTI

और कहां फंस जाता है पेच?

साल 2011 की गणना के अनुमान बताते हैं कि तमिलनाडु में दलित आबादी करीब 20 फीसदी है। ओबीसी, अति पिछड़ा वर्ग और डिनोटिफाइड कम्युनिटी की कुल आबादी करीब 50 फीसदी है। मुस्लिम आबादी करीब 5.86 फीसदी है। ईसाई भी राज्य में एक अहम समुदाय है। खुद मुख्यमंत्री स्टालिन इसी समुदाय से आते है। तमिलनाडु में सवर्ण, द्रविड़ आंदोलनों के निशाने पर रहे हैं। बीजेपी पर सर्वणों की पार्टी होने के आरोप भी लगते रहे हैं। 

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क्या है वह विचारधारा जो बीजेपी की तमिलनाडु में राह रोकती है?

बीजेपी हिंदुत्व और राष्ट्रवाद की राजनीति करती है। संघ के मूल सिद्धांत में हिंदुत्व और राष्ट्रवाद है। तमिलनाडु, द्रविड़ राजनीति की जन्मस्थली है। द्रविड़ विचारधारा, 20वीं सदी में ईवी रामासामी उर्फ पेरियार के नेतृत्व में शुरू हुई। यह विचारधारा ब्राह्मणवादी वर्चस्व, जाति व्यवस्था, अंधविश्वास और हिंदी थोपने का विरोध करती है। पार्टी के मूल सिद्धांतों में सामाजिक समानता, तमिल भाषा-संस्कृति का गौरव, नास्तिकता और तर्कवाद, महिलाओं के अधिकार और राज्य की स्वायत्तता अहम है। 

शुरुआत में द्रविड़ आंदोलन, अलग 'द्रविड़ नाडु' की मांग करता था, लेकिन बाद में DMK और AIADMK जैसी पार्टियों ने इसे भारतीय संविधान के अनुरूप स्वायत्तता पर केंद्रित कर दिया। साल 1967 से तमिलनाडु में DMK-AIADMK का वर्चस्व है। इनका जोर सामाजिक न्याय, कल्याणकारी योजनाओं और क्षेत्रीय पहचान पर है। बीजेपी और संघ पर इन विचारधाराओं को न मानने के आरोप लगते रहे हैं। बीजेपी की विचारधारा, RSS की सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और हिंदुत्व से प्रभावित है, जिसे तमिलनाडु में कभी स्वीकृति ही नहीं मिल पाई।