BJP का 'नवीन युग' शुरू, केरल, बंगाल और तमिलनाडु जैसे पहाड़ कैसे तोड़ पाएंगे?
BJP के नए और कम उम्र के अध्यक्ष नितिन नबीन के सामने पहले ही साल में कई बड़ी चुनौतियां हैं। 3 ऐसे राज्यों में विधानसभा के चुनाव हैं जहां बीजेपी की सरकार कभी भी नहीं रही है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ बीजेपी अध्यक्ष नितिन नबीन, Photo Credit: PTI
भारतीय जनता पार्टी (BJP) में बदलाव का दौर आज से औपचारिक रूप से शुरू हो गया है। अब नितिन नबीन के रूप में पार्टी को नया राष्ट्रीय अध्यक्ष मिल गया है और कई राज्यों के संगठनों में भी बदलाव हो चुका है। पार्टी और नितिन नबीन के सामने पहली बड़ी चुनौती 2026 में होने वाले विधानसभा चुनाव और राज्यसभा चुनाव हैं। संगठन की दृष्टि से कम अनुभवी नितिन नबीन के पास निश्चित तौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह और रक्षामंत्री राजनाथ सिंह जैसे नेताओं का समर्थन है जिनके सहारे वह राष्ट्रीय अध्यक्ष की कुर्सी संभालने जा रहे हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पहले ही दिन नितिन नबीन को पार्टी के मामलों में अपना बॉस बताकर उनका हौसला बढ़ाया है और यह संदेश देने की कोशिश की है कि नितिन अपनी मर्जी से काम कर सकेंगे। सिर्फ 45 साल के नितिन नबीन इससे पहले बिहार सरकार में मंत्री थे। 16 दिसंबर को उन्होंन मंत्री पद छोड़ दिया और पूरी तरह से संगठन के प्रति समर्पित हो गए। फिलहाल, वह विधायक बने रहेंगे लेकिन आगे चलकर उन्हें राज्यसभा भेजा जा सकता है ताकि वह दिल्ली में रहकर या अलग-अलग राज्यों में जाकर आराम से काम कर सकें।
अध्यक्ष बनकर क्या बोले नितिन नबीन?
बीजेपी का 12वां राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद नबीन ने पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं से पश्चिम बंगाल समेत पांच राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों में बीजेपी की सफलता सुनिश्चित करने के लिए हर संभव प्रयास करने, 'सनातन परंपराओं और आस्था' की रक्षा करने और देश को जनसांख्यिकीय परिवर्तनों से बचाने का भी आह्वान किया। उन्होंने कहा, '15 अगस्त, 2025 को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश के युवाओं से सार्वजनिक जीवन में प्रवेश करने का आह्वान किया था। मैं देश के युवाओं से कहना चाहता हूं कि राजनीति से दूर रहना समाधान नहीं, बल्कि सक्रिय योगदान देना ही समाधान है। मैं युवाओं को यह भी बताना चाहूंगा कि राजनीति में कोई शॉर्टकट नहीं है। राजनीति सौ मीटर की दौड़ नहीं बल्कि मैराथन है, जहां गति नहीं बल्कि सहनशक्ति की परीक्षा होती है। आगे आइए और अपनी जड़ों को मजबूत रखते हुए इस राजनीतिक मैदान पर काम कीजिए।'
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BJP के नए अध्यक्ष नितिन नबीन ने कहा, 'पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी में आगामी चुनावों से पहले राज्यों में 'जनसांख्यिकीय परिवर्तनों' पर चर्चा हो रही है। हमने देखा है कि जनसांख्यिकीय परिवर्तनों के कारण वहां चीजें किस प्रकार बदल गई हैं, जो हमारे सामने एक चुनौती है लेकिन मुझे विश्वास है कि बीजेपी कार्यकर्ता अपनी पूरी ताकत और संघर्ष और कड़ी मेहनत से इन पांच राज्यों में मजबूत नेतृत्व प्रदान करेंगे।'
2026 के विधानसभा चुनाव
2026 में असम, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, केरल और पुडुचेरी में विधानसभा के चुनाव हैं। केरल, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल ऐसे राज्य हैं जहां बीजेपी की सरकार कभी नहीं बनी है। असम में बीजेपी की सरकार है और उसके सामने सरकार बचाए रखने की चुनौती है। पुडुचेरी केंद्र शासित प्रदेश है और वहां सरकार चला रही अखिल भारतीय एनआर कांग्रेस बीजेपी के साथ ही है। बीजेपी का अध्यक्ष बनने के साथ ही नितिन नबीन के सामने केरल, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल के रूप में तीन बड़ी चुनौतियां हैं।
पश्चिम बंगाल में पिछली बार मुख्य विपक्षी दल बनने में कामयाबी रही बीजेपी का संगठन चुनाव के बाद बिखरने लगा था। 2025 खत्म होते-होते अमित शाह ने पश्चिम बंगाल बीजेपी के कील टांके दुरुस्त करने की कोशिश की थी लेकिन अब यह जिम्मेदारी नितिन नबीन को निभानी होगी। उनके पक्ष में एक अच्छी बात यह है कि वह खुद बांग्ला भाषा अच्छे से समझते और बोलते हैं, ऐसे में स्थानीय नेताओं से संवाद के जरिए वह काफी चीजें हल कर सकते हैं।
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अलगी चुनौती केरल है। 2024 के लोकसभा चुनाव और फिर हाल ही में हुए निकाय चुनाव में बीजेपी को बढ़त ही मिली है। अब नितिन नबीन के सामने चुनौती यह है कि वह इस बढ़त को इतना मजबूत करें कि बीजेपी कम से कम मुख्य विपक्षी की भूमिका में तो आ ही जाए। अगर 2021 के पश्चिम बंगाल चुनाव की तरह ही बीजेपी केरल में भी मजबूत प्रदर्शन करती है तो दक्षिण में उसका भविष्य उज्ज्वल हो सकता है।
तमिलनाडु भी एक ऐसा राज्य है जहां कभी भी बीजेपी की सरकार नहीं रही है। हां, वह AIADMK की सहयोगी जरूर रही है लेकिन जयललिता के निधन के बाद इस पार्टी को भी तगड़ा नुकसान हुआ है। नितिन नबीन की जिम्मेदारी तमिलनाडु के गठबंधन सहयोगियों से समन्वय करने और अपने लिए मजबूत स्थिति बनाने की होगी। अगर तमिलनाडु में बीजेपी सत्ता परिवर्तन करा पाती है और AIADMK की सहयोगी के रूप में विधानसभा में खुद को मजबूत करती है तो आने वाले समय में लोकसभा और राज्यसभा में भी उसकी स्थिति मजबूत हो सकती है।
असम में 10 साल से बीजेपी की ही सरकार है। हालांकि, बीजेपी ने 2021 में सर्वानंद सोनोवाल की जगह हिमंत बिस्व सरमा को सीएम बनाया था। हिमंत काफी लोकप्रिय बताए जाते हैं लेकिन सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की ऐसी बारीक लाइन पर वह चल रहे हैं जो कभी भी आत्मघाती भी साबित हो सकती है। ऐसे में नितिन नबीन के सामने यह भी चुनौती है कि वह पूर्वोत्तर के इस राज्य में सरकार न गंवाएं।
राज्यसभा चुनाव
2026 में कुल 75 सीटों पर राज्यसभा के चुनाव होने हैं। जिन राज्यों में राज्यसभा के चुनाव हैं, उनमें नितिन नबीन का गृह राज्य बिहार भी है। पश्चिम बंगाल में पांच सीटों पर राज्यसभा चुनाव हैं। इसी तरह यूपी, केरल, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, असम, तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश आदि भी हैं।
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इनमें कई राज्य ऐसे भी हैं जहां बीजेपी के साथ उसके गठबंधन सहयोगी भी हैं। ऐसे में अपनी सीटें मजबूत रखने के साथ-साथ नितिन नबीन के सामने चुनौती यह भी होगी कि वह अपने गठबंधन सहयोगियों को भी अच्छे से साधें ताकि 2029 या अन्य आगामी चुनावों में भी NDA का कुनबा मजबूत रहे।
हर किसी को खुश कैसे रखेंगे?
बीजेपी का संगठन जितना बड़ा है, उतनी ही महत्वाकांक्षाएं भी हैं। तमाम नेता टिकट के इंतजार में हैं, जो जीते हैं उन्हें पदों की लालसा है और जो पद पर हैं उनकी लालसा पदों पर बने रहने की है। चर्चा है कि उत्तर प्रदेश और केंद्र सरकार के मंत्रिमंडल में बड़े स्तर पर बदलाव हो सकता है। ऐसे में अब नितिन नबीन पर बड़ी जिम्मेदारी होगी कि वे रूठों को मनाकर रखें और सरकार से संगठन में जाने वाले नेताओं को ऐसे काम दें ताकि उनकी उपयोगिता साबित हो सके।
उन पर बड़ा दारोमदार होगा कि जिन लोगों की विदाई मंत्रिमंडल से हो, उन्हें संगठन में उचित पद देकर अपनी टीम मजबूत करें और उनके सहारे देशभर में बीजेपी को मजबूत करने की दिशा में काम करें। इस काम में उन्हें अमित शाह जैसे चतुर नेताओं की भी मदद लेनी होगी क्योंकि अमित शाह लंबे समय से यह काम करते हैं। उन्होंने न सिर्फ अपनी पार्टी के नेताओं को एकजुट रखा है बल्कि गठबंधन सहयोगियों की शिकायतों को भी समय-समय पर दूर करते रहे हैं।
संगठन, समन्वय और RSS
बीजेपी को सबसे मजबूत संगठन वाली पार्टी माना जाता है। लोग ज्यादा हैं तो अपेक्षाएं भी ज्यादा हैं और मत भी ज्यादा हैं। 2014 के बाद से शुरू हुए मोदी युग में यह देखा गया है कि पहले अमित शाह और फिर जे पी नड्डा ने संगठन और सरकार के बीच समन्वय बेहतर रखा है। सरकार की योजनाओं को बीजेपी का संगठन मजबूती से जनता के बीच लेकर जाता है और फीडबैक के आधार पर सरकार रिऐक्ट भी करती दिखी है।
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ऐसे में नितिन नबीन को भी अपने पुरखों के किए काम को ही आगे बढ़ाना होगा और फीडबैक चैनल बनाने के साथ-साथ उन्हें हमेशा खुला भी रखना होगा। संगठन में थोड़ी बहुत नाराजगी का खामियाजा बीजेपी ने 2024 के लोकसभा चुनाव में भुगता था जब उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में उसे भारी नुकसान झेलना पड़ा था। ऐसे में नितिन नबीन को यह ध्यान रखना होगा कि वह संगठन की जरूरतों के हिसाब से सरकार में शामिल लोगों तक बातें पहुंचाएं और सरकार के हिसाब से संगठन को भी दौड़ाते रहें।
बीजेपी के लिए एक बड़ा और अहम फैक्टर RSS भी है। RSS की नाराजगी का असर बीजेपी ने 2024 के लोकसभा चुनाव में देख लिया है। उसके खुश रहने का असर महाराष्ट्र और दिल्ली के विधानसभा चुनाव में भी देख लिया है। ऐसे में नितिन नबीन को वही रुख अख्तियार करना होगा जो पिछले एक-डेढ़ साल में पीएम मोदी ने पकड़ा है। वैचारिक मुद्दों पर RSS की राय अगर नितिन नबीन के लिए भी अहम होती है तो सांगठनिक रूप से उनके लिए फायदा ही होगा।
साथ ही, वैचारिक स्तर पर भी उन्हें यह ध्यान रखना होगा कि बीजेपी और आरएसएस के साथ-साथ अन्य संगठन भी एक जैसे विचार लेकर चलें और ऐसे मुद्दों को हवा न दी जाए जो चुनावी नुकसान करा दें।
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