logo

ट्रेंडिंग:

'लुंगी, रसमलाई, क्षेत्रवाद...,' राज ठाकरे ने डुबोई उद्धव की सियासी लुटिया?

उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे, वर्षों का अनबन भुलाकर साथ उतरे थे। राज ठाकरे की कड़वी बयानबाजी उद्धव ठाकरे पर भारी पड़ी है।

Raj Thackeray

महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के प्रमुख राज ठाकरे। Photo Credit: PTI

शेयर करें

संबंधित खबरें

Reporter

शिवसेना में टूट से पहले बृहन्मुंबई महानगर पालिका (BMC) में बाल ठाकरे के परिवार का सिक्का चलता था। भारतीय जनता पार्टी ने अविभाजित शिवसेना के 3 दशक के वर्चस्व को खत्म कर दिया है। महाराष्ट्र की राजनीति में अब उद्धव ठाकरे के पास सिर्फ पिता बाल ठाकरे का सरनेम है, विरासत एकनाथ शिंदे के पास चली गई है। शुक्रवार को आए नतीजों में बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी और पुणे में भी विजयी रही। बीजेपी ने शरद पवार और अजित पवार के नेतृत्व वाले राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) गुटों के गठबंधन को करारी शिकस्त दी।

मुंबई के सभी 227 वार्डों के चुनाव परिणाम आधी रात के आसपास घोषित किए गए। बीजेपी ने 89 सीट जीतीं और सहयोगी शिवसेना ने 29 सीट अपने नाम कीं, जबकि शिवसेना (यूबीटी) को 65 और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (MNS) को छह सीटें मिलीं। यह साफ हो गया कि शेर बनकर चुनावी मैदान में उतरे ठाकरे बंधु, सियासत की पिच पर ढेर हो गए। उन्हें न जनता ने भाव दिया, न सीट। राज ठाकरे के विवादित नारे पूरे चुनाव में छाए रहे लेकिन जब वोट देने की बारी आई तो उन्हें जनता ने सबक सिखा दिया।

यह भी पढ़ें: NCP के दोनों धड़े फ्लॉप, महायुति में वापसी या अलग-थलग पड़ेंगे अजीत और शरद पवार?

संजय राउत, नेता, शिवसेना:-
अगर एकनाथ शिंदे शिवसेना के लिए जयचंद न होते, तो मुंबई में बीजेपी का महापौर नहीं होता। मराठी लोग शिंदे को हमेशा जयचंद के रूप में याद रखेंगे।

उद्धव ठाकरे उदार बन रहे थे, राज ठाकरे ने सब चौपट किया, कैसे समझिए- 

  • ले डूबी राज ठाकरे की कट्टर राजनीति: राजनीतिक विश्लेषक अब कह रहे हैं कि उद्धव ठाकरे को सबसे ज्यादा नुकसान, उनके भाई राज ठाकरे की कट्टर राजनीति से पहुंचा है। राज ठाकरे की राजनीति अब पुरानी हो चुकी है, वह विभाजनकारी राजनीति करते हैं। मराठा मानुष के नाम पर वह उत्तर भारतीयों को दोयम दर्जे का नागरिक समझते हैं, जिनकी वजह से उनकी पार्टी से एक बड़ी आबादी दूरी बनाती है। 

  • लुंगी-पुंगी नारा उलटा पड़ा: राज ठाकरे ने चुनाव प्रचार के आखिरी चरण में दक्षिण भारतीयों पर निशाना साधते हुए पुराना नारा दोहराया था, जिस पर हंगामा हुआ। उन्होंने 'उठाओ लुंगी, बजाओ पुंगी' का नारा दिया था। शिवसेना का यह दशकों पुराना नारा था, जिसे बाल ठाकरे देते थे। इसी राजनीति पर ठाकरे बंधुओं ने सोचा कि मुंबई के लोग वोट करेंगे लेकिन लोगों ने विभाजनकारी राजनीति से दूरी बना ली। राज ठाकरे ने बीजेपी नेता के अन्नामलाई को 'रसमलाई' कहकर तंज कसा था। 'उठाओ लुंगी, बजाओ पुंगी' का नारा 1960 के दशक का है, जब शिवसेना दक्षिण भारतीयों के पारंपरिक परिधान लुंगी  को लेकर क्षेत्रवादी आंदोलन कर रही थी। बदलती मुंबई के लिए यह रुख बेकार साबित हुआ।

  • सिर्फ मराठी मानुष की राजनीति नहीं चलेगी: मुंबई में अब मराठी जनभावना उग्र नहीं रही। साल 2011 की जनगणना के मुताबिक अब मराठी बोलने वालों का हिस्सा 36 फीसदी रह गया है। साल 1951 तक यह आंकड़ा 44 फीसदी था। देश का नागरिक देश के किसी भी हिस्से में जाकर राजनीति कर सकता है, रह सकता है, काम कर सकता है, कमा सकता है। राज ठाकरे इसके खिलाफ रहते हैं। उनकी इसी राजनीति से लोगों ने दूरी बनाई। उद्धव ठाकरे ने शिवसेना (यूबीटी) की छवि सुधारने की कोशिश की थी, विकास, बुनियादी ढांचे और समावेशी मुद्दों पर फोकस किया था लेकिन लोगों ने यकीन ही नहीं किया। वजह यह रही कि जिस राज ठाकरे के सहारे वह यह कर रहे थे, उन्हें जनता खारिज कर चुकी थी।

राज ठाकरे। Photo Credit: PTI
  • गैर मराठी इलाकों में बुरी हार: उद्धव ठाकरे को गैर-मराठी इलाकों में नुकसान हुआ। महाराष्ट्र नव निर्माण सेना की आक्रामक क्षेत्रवादी और नस्लीय राजनीति ने उत्तर-दक्षिण भारतीयों के मन में गुस्सा भरा। उन इलाकों में यह गठबंधन कमजोर हो गया, जहां यह समुदाय बहुसंख्यक है। एमएनएस के वोट ट्रांसफर और राज ठाकरे की उग्र छवि ने उद्धव की सियासत कमजोर की।

  • सिर्फ कट्टरता के सहारे राजनीति का दौर खत्म: राज ठाकरे के चुनावी कैंपेन से रोजगार, आवास और मराठी संस्कृति के शांतिपूर्ण संरक्षण जैसे मुद्दे गायब थे। वह उग्र राजनीति पर उतरे थे, हिंदी भाषा के विरोध में बयान दे रहे थे, उन्होंने नुकसान कर लिया। राज ठाकरे की रणनीति एमएनएस के लिए तो फेल रही ही, बल्कि उद्धव के लिए भी बुरी साबित हई, जिसकी वजह से ठाकरे परिवार का बीएमसी पर 30 साल पुराना दबदबा खत्म हो गया। 

एकनाथ शिंदे छीन ले गए ठाकरे की विरासत

एकनाथ शिंदे ने 39 विधायकों के साथ मिलकर पार्टी नेता उद्धव ठाकरे के खिलाफ विद्रोह किया और 2022 में उनकी सरकार को गिरा दी। तब से शिवसेना (यूबीटी) नेता लगातार शिंदे को गद्दार कहते रहे हैं। चुनावी नतीजों में उद्धव ठाकरे को शिवसेना का वैचारिक गद्दार जनता ने माना और बुरी मात दी। महाराष्ट्र में बीजेपी ने 1400 सीट जीतीं और उसकी सहयोगी शिवसेना ने 397 सीट हासिल कीं, जबकि शिवसेना (यूबीटी) को 153 और महाराष्ट्र नव निर्माण सेना को 13 सीट मिलीं। कांग्रेस ने 324 सीट जीती। बीजेपी के नेतृत्व वाले गठबंधन ने 227 सदस्यीय बीएमसी चुनाव में अब तक 114 सीट जीती हैं। बहुमत का आंकड़ा अब महायुति पार कर चुकी है। 

यह भी पढ़ें: विचारधारा से कटे, अब हो रही 'सियासी दुर्गति', उद्धव ठाकरे का ऐसा हाल क्यों?

महाराष्ट्र नगर निगम चुनावों के लिए साथ आया था ठाकरे परिवार। Photo Credit: PTI

क्यों बीएमसी के लिए एक हुए थे ठाकरे?

बीएमसी भारत का सबसे धनी नगर निगम है, जिसका 2025-26 के लिए बजट 74,427 करोड़ रुपये का है। महाराष्ट्र के 29 नगर निकायों में मतदान प्रतिशत 54.77 रहा। राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे, पिता की विरासत भुनाने निकले थे, जनता ने भाव ही नहीं दिया। 


और पढ़ें

design

हमारे बारे में

श्रेणियाँ

Copyright ©️ TIF MULTIMEDIA PRIVATE LIMITED | All Rights Reserved | Developed By TIF Technologies

CONTACT US | PRIVACY POLICY | TERMS OF USE | Sitemap