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विचारधारा से कटे, अब हो रही 'सियासी दुर्गति', उद्धव ठाकरे का ऐसा हाल क्यों?

महाराष्ट्र में 20 से ज्यादा नगर निगमों में भारतीय जनता पार्टी को कामयाबी मिली है। उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे, बाल ठाकरे की यह विरासत भी गंवा बैठे हैं।

Uddhav Thackeray

उद्धव ठाकरे। Photo Credit: PTI

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महाराष्ट्र के 29 नगर निगमों में बीजेपी ने 23 से ज्यादा नगर निगमों में जीत दर्ज की है। बीजेपी के उम्मीदवारों को बंपर बहुमत मिली है। उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे एक बार फिर 'कागज के शेर' साबित हुए हैं। महाराष्ट्र  में 5 जुलाई 2025 को उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे ने सियासी दुश्मनी भुलाकर दोस्ती की थी। महाराष्ट्र नव निर्माण सेना और शिवसेना (यूबीटी) ने महाराष्ट्र नगर निगम चुनावों में साथ उतरने का फैसला किया था। दोनों की जब-जब संयुक्त रैली हुई, 'शेर' दिखाया गया, कहीं 'छावा' बताया गया। पोस्टर में शेर बने ठाकरे बंधु, नगर निगम चुनावों में ढेर हुए हैं। |

शिवसेना का बृहन्मुंबई नगर पालिका (BMC) पर दबदबा रहा है। ऐसा कहा जाता था कि महाराष्ट्र में सत्ता किसी की हो, ठाकरे परिवार का दबदबा बीएमसी में रहेगा। बीजेपी ने उसी दबदबे को खत्म कर दिया है। बीएमसी में कुल 227 वार्ड हैं। बहुमत के लिए आकंड़ा 114 है। बीजेपी के नेतृत्व वाले गठबंधन ने इस आंकड़े को पार कर लिया है। उद्धव ठाकरे और क्षेत्रवादी राजनीति करने वाले उनके भाई राज ठाकरे दोनों भाइयों का सियासी मेल, फेल ही रहा।

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साल 2017 में क्या आकंड़े थे?

साल 2017 के चुनाव में बीजेपी और शिवसेना के बीच दोस्ती थी। शिवसेना ने 84 सीटें जीत ली थी, बीजेपी ने 82 सीटों पर जीत हासिल की थी। साल 2019 के विधानसभा चुनावों में जब चुनावी नतीजे आए तो एनडीए को बहुमत मिली। शिवसेना ने बीजेपी का साथ छोड़कर महा विकास अघाड़ी (MVA) सरकार बना ली। कांग्रेस, एनसीपी और शिवसेना की यह सरकार 2022 तक चली। साल 2017 के बाद से यहां से चुनाव ही नहीं हुए। अब इन चुनावों में यह साबित हो रहा है कि उद्धव ठाकरे तभी तक सत्ता में रहने के काबिल थे, जब तक बीजेपी के सहारे थे।

कहां कैसा हाल रहा?

बीजेपी ने नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी (NCP) के अध्यक्ष अजीत पवार और एनसीपी (एसपी) की अध्यक्षता वाले गठबंधन को भी हराया। उद्धव ठाकरे की शिवसेना (UBT) और राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (MNS) के गठबंधन की भी हार हुई। ठाकरे परिवार का एक जमाने में बीएमसी में जलवा था, वहीं बुरी हार हुई है। पवार परिवार के गढ़ कहे जाने वाले पुणे और पिंपरी चिंचवड महानगरपालिकाओं में भी बीजेपी के नेतृत्व वाले गठबंधन की जीत हुई है। बीजेपी शिवसेना की जोड़ी ने मुंबई में 110 सीटें हासिल की हैं, वहीं उद्धव ठाकरे की पार्टी ने 65 सीटें जीत ली हैं।  कांग्रेस को 19 सीटें मिलीं, एनसीपी (एसपी) को एक, एनसीपी को 2 और अन्य को 7 सीटें मिलें। बहुमत का आंकड़ा 114 है।  


क्यों हुई है उद्धव ठाकरे की दुर्गति?

शिवसेना एक जमाने में हिंदुत्व की राजनीति करती थी। इन दिनों बाल ठाकरे के वारिस, सेक्युलर बने हैं। कांग्रेस के साथ मिलकर साल 2019 में सरकार बनाई और अपनी पार्टी साल 2022 में गंवा बैठे। उद्धव ठाकरे की मौजूदा सियासी हालत के पीछे उनका विचारधारा से पीछे हटना है।  बालासाहेब ठाकरे की 'कट्टर हिंदुत्व' वाली विरासत से दूरी और सत्ता के लिए वैचारिक समझौता ही उनकी 'दुर्गति' का आधार बन है, जिससे उनके समर्थक उनसे नाराज हैं।

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विचारधारा से ही कट गए ठाकरे 

शिवसेना का अस्तित्व  'मराठी मानुष' और 'हिंदुत्व' पर टिका था। साल 2019 में धुर विरोधी कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के साथ उन्होंने महा विकास अघाड़ी गठबंधन बनाया। उनकी मूल पहचान ऐसे संकट में आई कि राज्य में उनकी धुर विरोधी और शिवसेना के मूल विचार धारा वाली पार्टी, शिवसेना की कमान ही एकनाथ शिंदे को मिल गई। कांग्रेस कार्यकर्ता एक तरफ सावरकर को जीभर कोसते, शिवसेना यूबीटी के नेता, उस बयान से दूरी बनाते। जनता को हर बार लगा कि उद्धव ठाकरे, विचारधारा की राह ही भटक गए थे। 

न नेता साथ आए, न ही कार्यकर्ता

शिवसैनिक दशकों से कांग्रेस का विरोध करते आए हैं। अब उनके लिए कांग्रेस की हां में हां मिलाना मुश्किल था। जनता ने इसे स्वीकार ही नहीं किया। असर यह हुआ कि शिवसैनिक, एकनाथ शिंदे का साथ हुए। बीएमसी में भी यही हुआ। उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे आए लेकिन जनता ने उन पर भरोसा ही नहीं किया। बीएमसी में जिन सीटों को शिवसेना का गढ़ कहा जाता था, वहीं वे सीट गंवा बैठे। एकनाथ शिंदे को लोगों ने बाल ठाकरे की विचारधारा का वारिस माना। बीएमसी चुनाव में भी यही हुआ। विधानसभा में भी यही हुआ था। 

ब्रांड 'ठाकरे' के दिन लद गए

बीजेपी को 'कमलाबाई' कहने वाले बाल ठाकरे के वारिस उद्धव ठाकरे सबसे कमजोर साबित हुए हैं। क्षेत्रवाद और हिंदुत्व की राजनीति करने वाले उद्धव ठाकरे, बाल ठाकरे की विचारधारा पर चलने वाले उनके भतीजे राज ठाकरे का साथ काम नहीं आया। राज ठाकरे की छवि उत्तर भारत विरोधी बन गई है। उद्धव ठाकरे नए-नए उदारवादी बने हैं। दोनों की जोड़ी पर भी जनता भरोसा नहीं कर पाई। शिवसेना का मतलब 'आक्रामक हिंदुत्व' था। जब उद्धव ठाकरे ने अपनी छवि उदारवादी और धर्मनिरपेक्ष नेता के तौर पर बनाई तो बीजेपी को हिंदुत्व पर बढ़त बनाने का मौका मिला। शिवसेना ने अपना पारंपरिक जनाधार खो दिया, राज ठाकरे का कभी कोई जनाधार था ही नहीं। 


Ajit Pawar

अस्तित्व बचा रहे हैं उद्धव ठाकरे 

विधानसभा में पूरे महाविकास अघाड़ी गठबंधन के साथ 50 पार नहीं कर पाने वाले उद्धव ठाकरे को हर मोर्चे पर झटका लग रहा है। उद्धव ठाकरे, एकनाथ शिंदे को गद्दार बताते रहे, खुद को और अपने भाई राज ठाकरे को शेर बताते रहे लेकिन शेर का अस्तित्व ही संकट में आ गया। जनता ने उनसे जरा भी सहानुभूति नहीं जताई। अब मनसे और शिवसेना (यूबीटी) का संयुक्त गठबंधन भी 65 सीट पार नहीं कर पाया। 

भाई की जुगलबंदी ने क्या काम बिगाड़ा?

उद्धव ठाकरे की उदारवादी छवि को राज ठाकरे के साथ गठबंधन ने गहरा धक्का पहुंचाया। राज के कट्टर मराठी और उत्तर-भारतीय विरोधी बयानों ने मुस्लिम और गैर-मराठी वोटरों को दूर किया।  मुंबई में बीजेपी को बड़ा फायदा हुआ। MVA में वैचारिक दरार इस हद तक आई कि कांग्रेस-NCP (SP) असहज हुए और भाई प्रेम दोनों पार्टियों को रास नहीं आया। ठाकरे विरासत को लेकर भ्रम और श्रेय की लड़ाई से शिवसेना (UBT) का संगठन बेहद कमजोर पड़ा। बीजेपी ने दोनों भाइयों की जुगलबंदी को 'स्वार्थी गठजोड़' बता दिया। बीजेपी और शिवसेना को विचारधारा के दौर पर जमीन पर बढ़त मिल गई। 

 


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