इस महीने राज्यसभा की कुल 37 सीटों पर चुनाव होने हैं। 10 राज्यों की इन 37 सीटों के लिए दोगुने से भी ज्यादा उम्मीदवार अपने-अपने दलों में जोर आजमाइश कर रहे हैं। हरियाणा की दो सीटें खाली हो रही हैं और अभी तक ये दोनों भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के कब्जे में हैं। इस बार कांग्रेस भी एक सीट की उम्मीद लगा रही है और पूरी तैयारी में है कि वह ऐसा उम्मीदवार उतारे जो जीत हासिल कर सके। दूसरी तरफ, बीजेपी में कुलदीप बिश्नोई जैसे नेता भी अपनी दावेदारी ठोंक रहे हैं ताकि वह भी सत्ता में भागीदार बन सकें। 

 

एक सीट पर ही बीजेपी आराम से जीत हासिल कर सकती है और इस एक सीटे के लिए हरियाणा से लेकर पंजाब और हरियाणा तक के नेता जोर लगा रहे हैं। दूसरी सीट के लिए गोपाल कांडा जैसे नेता भी दावेदारी ठोंक रहे हैं। वहीं, कुलदीप बिश्नोई के लिए यह मौका आखिरी बताया जा रहा है क्योंकि इसके बाद 2028 से पहले हरियाणा में कोई चुनाव नहीं है। अगर इस बार भी उनका नंबर नहीं आया तो उनका धैर्य जवाब दे सकता है। 

कुलदीप बिश्नोई के अहम क्यों है यह सीट?

 

साल 2022 में कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में गए कुलदीप बिश्नोई को 2024 के विधानसभा चुनाव में करारा झटका लगा। जिस सीट पर साल 1968 से उनका परिवार जीतता आ रहा था, वहां कांग्रेस ने कुलदीप के बेटे भव्य बिश्नोई को चुनाव हरा दिया। इसका नतीजा यह हुआ कि अब बिश्नोई परिवार का कोई भी सदस्य ना तो विधायक है और ना ही सांसद। कुलदीप बिश्नोई की बेचैनी यही है। इसी के लिए वह बीते कई दिनों से बीजेपी के वरिष्ठ नेताओं से मिलकर अपनी दावेदारी पेश कर रहे हैं। 

 

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पिछले महीने कुलदीप बिश्नोई ने अपने जन्मदिन के मौके पर इसके संकेत देते हुए कहा था कि उनके अच्छे दिन आने वाले हैं। हाल ही में वह पूर्व सीएम और मौजूदा कैबिनेट मंत्री मनोहर लाल खट्टर, मौजूदा सीएम नायब सिंह सैनी और कई अन्य वरिष्ठ नेताओं से मुलाकात कर चुके हैं। कुलदीप बिश्नोई की चिंता यह है कि इस राज्यसभा चुनाव के बाद लोकसभा और विधानसभा के चुनाव 2029 में हैं और अगले राज्यसभा चुनाव अगस्त 2028 में हैं। ऐसे में अगर इस बार वह चूके तो लंबे समय तक बिना किसी पद के ही रहना पड़ सकता है।

 

दरअसल, साल 2022 में बीजेपी में शामिल होने के बाद कुलदीप बिश्नोई ने विधायकी छोड़ दी थी। तब उन्होंने अपने बेटे भव्य बिश्नोई को आदमपुर से उपचुनाव लड़वाया था। भव्य बिश्नोई ने अपने परिवार की इस सीट पर दबदबा बरकरार रखा था और कांग्रेस के जय प्रकाश को हराकर चुनाव जीत गए। 2024 में कुलदीप बिश्नोई हिसार लोकसभा सीट अपने परिवार के लिए चाहते थे। हालांकि, तब उनकी बात नहीं बनी। हालांकि, बाद में वह विधानसभा चुनाव में अपने बेटे समेत कई अन्य उम्मीदवारों को टिकट दिलवाने में कामयाब रहे।

 

साल 2024 में जब हरियाणा में राज्यसभा के चुनाव हुए तब भी कुलदीप बिश्नोई ने जोर लगाया था लेकिन एक बार किरण चौधरी और दूसरी बार रेखा शर्मा बाजी मार गईं। ऐसे में कुलदीप बिश्नोई ना तो लोकसभा जा सके और ना ही राज्यसभा के सदस्य बन सके। अब इस बार उनके लिए यह करो या मरो वाली स्थिति बन गई है।

 

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BJP का क्या है प्लान?

 

रिपोर्ट्स के मुताबिक, पहले 10 नामों को लेकर बीजेपी में चर्चा हुई और आखिर में 3 नाम भेजे गए हैं। चर्चा है कि अगर हरियाणा के किसी नेता को लेकर सहमति नहीं बनती है तो बीजेपी पंजाब से किसी नेता को राज्यसभा भेज सकती है। इस रेस में केंद्रीय मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू का भी नाम हो सकता है क्योंकि उनका कार्यकाल जून 2026 में खत्म हो रहा है। पंजाब बीजेपी के मुखिया सुनील जाखड़ का नाम भी चर्चा में है क्योंकि पंजाब में बीजेपी का संसदीय प्रतिनिधित्व बेहद कम है।

 

विधायकों की संख्या के हिसाब से देखा जाए तो बीजेपी का एक सीट जीतना तय है और दूसरी के लिए भी वह जोर आजमाइश कर सकती है। इस एक सीट के लिए कुलदीप बिश्नोई के अलावा कैप्टन अभिमन्यु, गोपाल कांडा, सतीश पूनिया, बंतो कटारिया और मौजूदा सांसद किरण चौधरी भी दावेदार हैं।

क्या है हरियाणा का समीकरण?

 

हरियाणा में विधानसभा की कुल 90 सीटें हैं और एक सीट पर जीत के लिए 31 विधायकों का वोट चाहिए। कांग्रेस के पास कुल 37 और बीजेपी के पास 47 विधायक हैं। 3 निर्दलीय विधायक भी बीजेपी के पास हैं। इस संख्या के हिसाब से देखें तो दोनों दल एक-एक सीट आराम से जीत सकते हैं। हालांकि, अगर बीजेपी अपनी दूसरी सीट बचाना चाहती है तो उसे 12 अतिरिक्त वोट चाहिए। दूसरा विकल्प यह है कि कांग्रेस के कम के कम आधा दर्जन विधायक क्रॉस वोटिंग कर दें। हालांकि, हरियाणा में यह काम आसान नहीं लग रहा है। ऐसे में बीजेपी अगर किसी ऐसे शख्स को टिकट दे दे जो कांग्रेस के दल में सेंध लगा सके तब उसका मामला बन सकता है।

 

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दूसरी सीट के लिए बीजेपी किसी निर्दलीय उम्मीदवार को उतारकर पुराना फॉर्मूला दोहरा सकते हैं। बता दें कि 2016 और 2022 में भी ऐसी ही स्थिति थी और बीजेपी ने पहले सुभाष चंद्रा और फिर कार्तिकेय शर्मा को समर्थन दे दिया था और दोनों विजयी रहे थे। अगर ऐसे स्थिति फिर बनती है तो गोपाल कांडा जैसे नेता मजबूत दावेदार हो सकते हैं क्योंकि वे सभी दलों में अच्छी पकड़ रखते हैं और कांग्रेस जैसे दलों में गुटबाजी का फायदा उठा सकते हैं।