पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री के तौर पर शुभेंदु अधिकारी ने शनिवार को शपथ ली। शपथ ग्रहण समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शामिल हुए थे। भारतीय जनता पार्टी शासित राज्यों के मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री समेत पश्चिम बंगाल के कई बड़े चेहरे मंच पर नजर आए। इन चेहरों में एक नाम मिथुन चक्रवर्ती का भी था। उन्हीं के ठीक बगल में स्मृति ईरानी खड़ी नजर आईं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मिथुन चक्रवर्ती से मुलाकात की और सोशल मीडिया पर एक खूब रील वायरल हुई। 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मिथुन चक्रवर्ती से मिलते हैं, कंधे पर हाथ रखे हैं, हाथ पकड़ते हैं, संवाद करते हैं। मिथुन के बगल में स्मृति ईरानी खड़ी होती हैं। मंच पर उनके साथ कोई संवाद नहीं होता है। वह प्रधानमंत्री मोदी को अपलक देख रही होती हैं। तस्वीर, कैमरे में उतरती है। रील बनती है तो सोशल मीडिया पर छा जाती है। जिस एक बात पर हंगामा मचा है, वह भी बेहद दिलचस्प है।

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स्मृति ईरानी क्यों ट्रोल होने लगीं?

स्मृति ईरानी को लेकर सोशल मीडिया पर प्रतिक्रियाओं की भरमार है। लोगों का कहना है कि भारतीय जनता पार्टी ने उनका इस्तेमाल किया। अब वजह अपना चुनाव नहीं जीत पाईं तो पार्टी उन्हें बाहर कर चुकी है। अखिलेश यादव और कांग्रेस के कई दिग्गज नेताओं ने स्मृति ईरानी पर तंज कसा है। 

सोशल मीडिया पर जिस दावे के साथ क्लिप वायरल हो रही है, उसमें भी कहा जा रहा है कि प्रधानमंत्री ने स्मृति ईरानी को नजर अंदाज किया, वह लगातार उन्हें नमस्कार कर रहीं थीं लेकिन प्रधानमंत्री ने उनका हाल तक नहीं पूछा। अब न उन्हें मंत्रिमंडल में जगह दी गई है, नहीं उन्हें कोई बड़ा पद दिया गया है।

स्मृति ईरानी पर क्या बोल रहे हैं विपक्ष के नेता?

अखिलेश यादव, राष्ट्रीय अध्यक्ष, समाजवादी पार्टी:-
अच्छी तो ये बात नहीं, नमस्ते का जवाब नहीं।

 

 


स्मृति ईरानी ने इन बातों पर कहा क्या है?

क्यों इतना परेशान हैं,
क्या कोई इम्तिहान है?

 

कांग्रेस प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत ने लिखा, 'मुझे भी वीडियो देख कर लगा था, स्मृति जी ने दो बार नमस्कार किया, प्रधानमंत्री जी ने जवाब नहीं दिया। देख नहीं पाये होंगे, भीड़भाड़ में हो जाता है कभी कभी। पर इन लोकमत वालों ने यह वीडियो निकाल दिया?'

 

 

लोगों को स्मृति ईरानी से हमदर्दी क्यों हो गई?

सोशल मीडिया पर लोग लिख रहे हैं कि भारतीय जनता पार्टी ने स्मृति ईरानी को राहुल गांधी के खिलाफ 2014 और 2019 में उतारा। उन्होंने राहुल गांधी को उनके गढ़ अमेठी में हराया था। वह राष्ट्रीय स्तर की सबसे चर्चित नेता में शामिल हो गईं थीं। वह बीजेपी महिला मोर्चा की अध्यक्ष भी रही हैं। आए दिन वह मीडिया की सुर्खियों में रहती थीं। 

भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष नेताओं में स्मृति ईरानी शामिल थीं। दोनों बार वह केंद्रीय मंत्री बनीं। साल 2024 में, राहुल गांधी और समाजवादी पार्टी साथ आए। राहुल गांधी ने अचानक अपनी सीट बदली और मां सोनिया गांधी की सीट रायबरेली से चुनाव लड़े। उन्होंने अपनी जगह, अपने प्रतिनिधि रहे, किशोरी लाल शर्मा को उतार दिया। स्मृति ईरानी ने राहुल गांधी को हरा दिया लेकिन किशोरी के सामने हार गईं। 

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हाल भी कोई मामूली नहीं थी। किशोर लाल शर्मा से वह 1,67,196 वोटों से हारीं। इस चुनाव में मिली हार के बाद कई महीने तक, स्मृति ईरानी नेपथ्य में गईं। 10 जून को जब मंत्रिमंडल का गठन हुआ तो उसमें स्मृति ईरानी को जगह नहीं मिली। अब कहा जा रहा है कि स्मृति ईरानी राजनीति के नेपथ्य में हैं, उनके पास न पद है, न मंत्रिमंडल है, न ही शीर्ष नेतृत्व का वह भरोसा है, जो उन्हें सियासत में प्रांसगिक रख सकता है। 

स्मृति ईरानी की राजनीति में सक्रियता घटी तो वह सीरियल में भी लौटीं। उन्होंने 25 साल बाद टीवी सीरियल में कमबैक किया। वह एकता कपूर के शो 'क्योंकि सास भी कभी बहू थी 2' में तुलसी वीरानी के किरदार में नजर आईं। लोगों ने कहा कि अब राजनीति की दुकान बंद है, स्मृति ईरानी की सियासी वापसी मुश्किल है। 

स्मृति ईरानी हाशिए पर हैं? सच्चाई जान लीजिए 

स्मृति ईरानी, बीजेपी की पदाधिकारियों की सूची में भी नहीं हैं, न ही मंत्रिमंडल में। महिला मोर्चा की अध्यक्ष रही हैं लेकिन अभी इस प्रकोष्ठ में भी उनके पास कोई पद नहीं है। अलग बात वह राष्ट्रीय कार्यकारिणी की सदस्य हैं। संगठन के कार्यक्रमों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेती हैं। पार्टी, उन्हें स्टार प्रचारकों की लिस्ट में शामिल किया जाता है। वह डोर-टू-डोर कैंपेनिंग से लेकर बड़ी जनसभाएं करती हैं। वह प्रभावी वक्ता हैं, जिन्हें हजारों लोग सुनने आते हैं।

2024 में वह भले ही अमेठी से चुनाव हार गईं थी, ठीक बाद के विधानसभा चुनावों से आज तक, उन्हें बीजेपी ने स्टार प्रचारक बनाया, संगठन के दिग्गज नेताओं की सूची में रखा। वह पार्टी की तरफ से प्रेस कॉन्फ्रेंस करती हैं, चुनाव प्रचार करती हैं, पार्टी जो भूमिका सौंपती है, उसे निभाती हैं।

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हर चुनाव में स्टार प्रचारक होती हैं स्मृति ईरानी 

2024 के लोकसभा चुनाव के ठीक बाद, हरियाणा, जम्मू-कश्मीर, महाराष्ट्र और झारखंड में विधानसभा चुनाव हुए। इन चुनावों में भी स्मृति ईरानी ने जनसभाएं कीं। महाराष्ट्र और हरियाणा में पार्टी को सफलता भी मिली। संगठन में अपनी सेवाएं देती रहीं। दिल्ली और बिहार में विधानसभा चुनाव हुए। दिल्ली में उन्होंने धमाकेदार कैंपेनिंग की, आम आदमी पार्टी सरकार की विदाई हुई। लोग उन्हें सीएम उम्मीदवार तक मान बैठे थे। 

बिहार के विधानसभा चुनावों में साल 2025 में उन्होंने चुनाव प्रचार किया। पार्टी को आपेक्षित सफलता मिली। उन्होंने रोड शो किए, रैलियां कीं। 2026 में पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल, असम और पुडुचेरी में विधानसभा चुनाव हुए हैं। पश्चिम बंगाल में बीजेपी की सरकार बनी, केरल और तमिलनाडु में बीजेपी का विस्तार हुआ। दक्षिण के दोनों राज्यों में स्मृति ईरानी ने खूब जनसभाएं कीं। वह पश्चिम बंगाल के लिए भी स्टार प्रचार रहीं और असम के लिए भी। बड़े मंचों पर गईं, शीर्ष नेतृत्व के साथ नजर आईं। 

मंत्रिमंडल में नहीं हैं, रसूख कम नहीं हुआ

दो साल से वह बस मंत्रिमंडल में नहीं हैं, उनकी भूमिका कमजोर नहीं हुई है। स्मृति ईरानी की भूमिका एक प्रखर स्टार प्रचारक और पार्टी की आक्रामक आवाज के रूप में बनी रही है। बीजेपी उनकी संगठनात्मक क्षमता और महिला मतदाताओं के बीच उनकी लोकप्रियता को जानती है। पश्चिम बंगाल के चुनाव में उन्होंने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के खिलाफ मोर्चा संभाला और महिला सुरक्षा और केंद्र की 'नारी शक्ति' योजनाओं को लेकर खूब घेरा। 

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जनसभाओं में स्मृति के लिए खूब बजती हैं तालियां 

संगठनात्मक स्तर पर, स्मृति ईरानी ने पार्टी के लिए वैचारिक रक्षक की भूमिका निभाई। उन्होंने टीवी बहसों, प्रेस कॉन्फ्रेंस और रैलियों के माध्यम से कांग्रेस और विपक्ष पर हमला जारी रखा है। वह महिला विंग को संभाल रही हैं। पद पर न होते हुए भी, इन चुनावों के दौरान स्मृति ईरानी, बीजेपी की सबसे ज्यादा मांग वाली महिला नेताओं में शामिल रहीं। 

इंतजार करने वाले नेताओं को इनाम देती है बीजेपी?

बीजेपी में एक कहावत खूब चर्चा में रहती है, 'संगठन, सरकार से बड़ा है।' एक समय में जब केशव प्रसाद मौर्य और योगी आदित्यनाथ के बीच खींचतान की खबरें सुर्खियों में रहीं थीं, तब भी यह नारा खूब उछला। बीजेपी, 'संगठन सर्वोपरि' की राह पर चलने का दावा करती है। बीजेपी कैडर आधारित पार्टी है। किसी को पद से हटाना या दोबारा न चुनना, उसकी भूमिका बदलने की तरह रहा है। नरेंद्र मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में जेपी नड्डा, 2014 से 2019 के बीच स्वास्थ्य मंत्री रहे। 

2019 में उन्हें मंत्रिमंडल में शामिल नहीं किया गया। संगठन में उन्हें कार्यकारी अध्यक्ष का पद दिया गया। बाद में राष्ट्रीय अध्यक्ष बने। भूपेंद्र यादव को कैबिनेट में साल 2024 में शामिल किया गया। सरकार से जब बाहर थे तो उन्हें बिहार और गुजरात जैसे राज्यों का चुनाव प्रभारी बनाया गया। राष्ट्रीय महासचिव भी रहे। सुनील बंसल का भी ऐसा ही हाल रहा। उत्तर प्रदेश में संगठन मंत्री के रूप में काम किया, अब वह राष्ट्रीय महासचिव हैं और कई राज्यों का प्रभार संभाल रहे हैं।

शिवराज सिंह चौहान मुख्यमंत्री थे। चुनाव हुए तो उनकी जगह, मोहन यादव मुख्यमंत्री बने। 2024 में उन्हें केंद्र में बुलाया गया, अब कृषि और ग्रामीण विकास मंत्रालय की हाथ उनके हाथ में है। मनोहर लाल खट्टर की हरियाणा सरकार से विदाई हुई तो केंद्र में ऊर्जा मंत्रालय मिला। सर्वानंद सोनोवाल को असम के मुख्यमंत्री पद से हटाया गया तो कैबिनेट में बुलाया गया। वह मोदी सरकार के चर्चित चेहरों में से एक हैं।

बिप्लब कुमार देब की त्रिपुरा के सीएम पद से छुट्टी हुई तो गुजरात का प्रभारी बनाया गया। स्मृति ईरानी अभी 50 साल की हैं। उनके पास राजनीति के लिए अभी बहुत समय है। जिस हिसाब से उनकी पार्टी में सक्रियता है, पार्टी, उन्हें कोई अहम पद दे सकती है। 2026 में कैबिनेट विस्तार होने वाला है, कई चेहरों को मौका मिल सकता है, स्मृति ईरानी भी उनमें से एक हो सकती हैं।