भारत आज दुनिया का सबसे बड़ा चावल उत्पादक और निर्यातक देश बन गया है। दुनिया के चावल बाजार में हर चौथा दाना भारत से आता है। यह उपलब्धि ऐसे समय में सामने आई है, जब दुनिया खाद्य सुरक्षा, जल संकट और जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियों से जूझ रही है। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की यह स्थिति उसे कृषि महाशक्ति के रूप में स्थापित करती है लेकिन इसी के साथ एक गंभीर सवाल भी खड़ा करती है कि इस उपलब्धि की असली कीमत क्या है?
पिछले दो दशकों में भारत में चावल उत्पादन केवल बढ़ा ही नहीं, बल्कि देश के कई राज्यों में भौगोलिक रूप से भी फैलता गया। भारत के ऐसे राज्य, जहां परंपरागत रूप से पानी की कमी रही है, आज धान की खेती के बड़े केंद्र बन चुके हैं। सरकारी समर्थन, मुफ्त या सस्ती बिजली, न्यूनतम समर्थन मूल्य और सुनिश्चित खरीद ने किसानों को यह संदेश दिया कि चावल सबसे सुरक्षित फसल है। नतीजा यह हुआ कि उत्पादन तो रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा लेकिन इसके साथ-साथ भूजल दोहन, पर्यावरणीय दबाव और आर्थिक असंतुलन भी बढ़ता चला गया।
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लगातार बढ़ता जा रहा उत्पादन
अगर आंकड़ों की बात करें तो वर्ष 2020-21 में भारत का चावल उत्पादन लगभग 1,244 लाख मीट्रिक टन रहा। यह साल इसलिए महत्वपूर्ण था क्योंकि कोविड-19 जैसी चुनौतियों के बावजूद कृषि क्षेत्र ने स्थिर प्रदर्शन किया और खाद्यान्न उत्पादन अर्थव्यवस्था के लिए सहारा बना। इसके बाद 2021-22 में चावल उत्पादन बढ़कर करीब 1295 लाख मीट्रिक टन हो गया। इस अवधि में अच्छी मानसून स्थिति और सरकारी समर्थन नीतियों के कारण धान उत्पादन में मज़बूत बढ़त देखने को मिली।
2022-23 में भी यह रुझान जारी रहा और चावल उत्पादन बढ़कर लगभग 1,358 लाख मीट्रिक टन तक पहुंच गया। 2023-24 में उत्पादन में चावल का उत्पादन और बढ़कर लगभग 1,378 लाख मीट्रिक टन हो गया। यह अब तक के उच्च स्तरों में से एक रहा, जिसमें खरीफ सीजन की अच्छी पैदावार की अहम भूमिका रही।
अब 2024-25 की बात करें तो चावल का उत्पादन हल्का सा घटकर 1,364 लाख मीट्रिक टन रहा जो कि काफी सराहनीय है और यह देश की खाद्य सुरक्षा और निर्यात क्षमता, दोनों के लिए अहम संकेत माना जा रहा है।
इस लेख में हम चर्चा करेंगे कि आखिर चावल उत्पादन की सफलता की कहानी के पीछे छिपी लागत कितनी है? चावल उत्पादन में पानी की खपत से लेकर पर्यावरणीय नुकसान, किसानों की आय से लेकर वैश्विक तुलना तक यह समझना जरूरी है कि भारत किस कीमत पर इस मुकाम तक पहुंचा है और क्या यह मॉडल लंबे समय तक टिकाऊ रह सकता है।
चावल उत्पादन क्यों बढ़ा?
भारत में चावल उत्पादन के तेजी से बढ़ने के पीछे सबसे बड़ा कारण हैं सरकारी नीतियां। बेहतर न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) ने धान को किसानों के लिए अपेक्षाकृत जोखिम-मुक्त फसल बना दिया है यानी कि चावल की पैदावार अब किसान के लिए घाटे का सौदा नहीं रह गया। किसान जानते हैं कि चाहे बाजार की स्थिति कैसी भी हो, सरकार तय कीमत पर उनकी फसल खरीदेगी। यह भरोसा किसी भी फसल के विस्तार में निर्णायक भूमिका निभाती है।
वर्ष 2020-21 में सरकार ने चावल के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य तय करते हुए सामान्य (कॉमन) धान का MSP 1,868 रुपये प्रति क्विंटल और ग्रेड-A धान का MSP 1,888 रुपये प्रति क्विंटल रखा था। इसके बाद 2021-22 में किसानों को बढ़ती लागत से राहत देने के लिए MSP में बढ़ोतरी की गई और यह सामान्य धान के लिए 1,940 रुपये तथा ग्रेड-A के लिए 1,960 रुपये प्रति क्विंटल कर दिया गया।
2022-23 में सरकार ने MSP को और बढ़ाया। इस वर्ष सामान्य धान का न्यूनतम समर्थन मूल्य 2,040 रुपये और ग्रेड-A धान का 2,060 रुपये प्रति क्विंटल निर्धारित किया गया, जिससे साफ हुआ कि सरकार उत्पादन लागत और महंगाई को ध्यान में रख रही है। इसके अगले साल 2023-24 में MSP में अपेक्षाकृत बड़ी बढ़ोतरी देखने को मिली और सामान्य धान का MSP 2,183 रुपये, जबकि ग्रेड-A धान का MSP 2,203 रुपये प्रति क्विंटल कर दिया गया।
वहीं 2024-25 के लिए सरकार ने चावल उत्पादक किसानों को और मजबूत समर्थन देते हुए MSP को अब तक के उच्च स्तर पर पहुंचा दिया। इस वर्ष सामान्य धान के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य 2,300 रुपये प्रति क्विंटल और ग्रेड-A धान के लिए 2,320 रुपये प्रति क्विंटल तय किया गया। कुल मिलाकर, पिछले पाँच वर्षों में चावल के MSP में लगातार बढ़ोतरी यह दिखाती है कि सरकार किस तरह से धान की पैदावार को प्रोत्साहन दे रही है।
दूसरा अहम कारण है सरकारी खरीद व्यवस्था। FCI और राज्य एजेंसियों द्वारा बड़े पैमाने पर धान की खरीद ने उत्पादन को लगातार प्रोत्साहित किया। गेहूं-धान की जोड़ी सार्वजनिक वितरण प्रणाली की रीढ़ बन चुकी है, जिससे नीति-निर्माताओं के लिए भी इस मॉडल से हटना आसान नहीं रहा।
तीसरा कारण है सस्ती या मुफ्त बिजली और सिंचाई। पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में ट्यूबवेल आधारित सिंचाई ने धान को उन इलाकों में भी पैदा करना संभव बना दिया जिन इलाकों में आमतौर पर पानी की कमी रहती है। जब बिजली और पानी की वास्तविक लागत किसान को नहीं चुकानी पड़ती, तो जाहिर सी बात है कि उन फसलों का उत्पादन किसानों के लिए सस्ता पड़ता है।
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इसके अलावा, अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय चावल की मजबूत मांग ने भी सरकार को निर्यात बढ़ाने के लिए प्रेरित किया। इस तरह घरेलू नीति और वैश्विक मांग दोनों ने मिलकर चावल को भारत की सबसे प्रमुख फसल बना दिया।
एक किलो चावल की असली कीमत
चावल उत्पादन की सबसे बड़ी कीमत पानी के रूप में चुकाई जा रही है। एक्सपर्ट्स के अनुसार, एक किलो चावल उगाने में औसतन 3,000 से 5,000 लीटर पानी लगता है। यह मात्रा गेहूं, मक्का या दालों की तुलना में कहीं अधिक है।
समस्या तब और गंभीर हो जाती है, जब यह पानी ऐसे क्षेत्रों से निकाला जाता है जहां उसकी उपलब्धता पहले से सीमित है। पंजाब और हरियाणा में भूजल स्तर हर साल औसतन 30 से 50 सेंटीमीटर तक गिर रहा है। कई जिले 'डार्क ज़ोन' घोषित किए जा चुके हैं, जहां भूजल यानी जमीन के नीचे के पानी का स्तर खतरनाक सीमा से नीचे जा चुका है।
'डार्क ज़ोन' उस क्षेत्र को कहा जाता है जहां जितना भूजल निकाला जा रहा है, उससे कहीं कम पानी दोबारा ज़मीन में भर (रीचार्ज) पा रहा है। आसान शब्दों में कहें तो वहां भूमिगत पानी खतरनाक स्तर तक घट चुका होता है।
सरकार और केंद्रीय भूजल बोर्ड (CGWB) किसी इलाके को डार्क ज़ोन तब घोषित करते हैं, जब उस क्षेत्र में भूजल दोहन 100% से अधिक हो जाता है। यानी साल भर में जितना पानी प्राकृतिक रूप से ज़मीन में जाता है, उससे ज़्यादा पानी ट्यूबवेल, बोरिंग और पंपों के ज़रिए निकाल लिया जाता है।
विरोधाभास यह है कि पूर्वी भारत जहां बारिश अधिक होती है और जल संसाधन बेहतर हैं वहां चावल की उत्पादकता अपेक्षाकृत कम है, जबकि शुष्क और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में धान का रकबा लगातार बढ़ता गया। यह दर्शाता है कि समस्या प्राकृतिक संसाधनों की कमी नहीं, बल्कि नीतिगत प्राथमिकताओं की है। पानी की यह अदृश्य लागत अभी खेतों तक सीमित दिखती है, लेकिन भविष्य में यही संकट पेयजल, शहरी आपूर्ति और ग्रामीण आजीविका सभी को प्रभावित कर सकता है।
हवा और मिट्टी पर कितना असर?
चावल उत्पादन का पर्यावरणीय प्रभाव कई तरह से प्रभावित करता है। सबसे प्रत्यक्ष असर दिखता है पराली जलाने के रूप में। धान कटाई के बाद कम समय में खेत खाली करने की मजबूरी किसानों को पराली जलाने के लिए मजबूर करती है। इसका सीधा असर हवा और मिट्टी पर पड़ता है। इसका उदाहरण उत्तर भारत में बढ़ता वायु प्रदूषण है, जिसका असर दिल्ली-NCR से लेकर पूरे गंगा मैदान तक महसूस किया जाता है।
इसके अलावा, धान की खेती जलवायु परिवर्तन में भी योगदान देती है। पानी से भरे खेतों में जैविक प्रक्रिया के दौरान मीथेन गैस निकलती है, जो एक शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैस है। भारत में खेती से निकलने वाली मीथेन का बड़ा हिस्सा धान की खेती से जुड़ा हुआ है।
सिर्फ हवा ही नहीं बल्कि मिट्टी की सेहत भी इस मॉडल से प्रभावित होती है। लगातार धान उगाने से मिट्टी की संरचना कमजोर होती है, सूक्ष्म पोषक तत्व घटते हैं और किसान को अधिक रासायनिक खाद का सहारा लेना पड़ता है। इससे उत्पादन तो कुछ समय तक बना रहता है, लेकिन भूमि की दीर्घकालिक उर्वरता खतरे में पड़ जाती है।
इस तरह चावल उत्पादन केवल खाद्य सुरक्षा का नहीं, बल्कि पर्यावरणीय स्थिरता का सवाल बन जाता है।
किसान और अर्थव्यवस्था दोनों पर बोझ
पहली नज़र में लगता है कि चावल किसानों को MSP और सरकारी खरीद से स्थिर आय मिल रही है। लेकिन वास्तविक तस्वीर ज्यादा जटिल है। धान की खेती में बीज, खाद, कीटनाशक, पानी और मजदूरी की लागत लगातार बढ़ रही है। कई इलाकों में उत्पादन लागत MSP के काफी करीब पहुंच चुकी है।
इसके अलावा, चावल उत्पादन जिस व्यवस्था पर टिका है, वह मुफ्त बिजली, सस्ती खाद, सिंचाई और भंडारण जैसी भारी छिपी हुई सब्सिडी पर निर्भर है। इन सबका बोझ अंततः सरकारी खजाने और टैक्स देने वालों पर पड़ता है।
किसान के स्तर पर भी जोखिम बना रहता है। निर्यात पर अचानक रोक, मौसम की अनिश्चितता या नीतिगत बदलाव किसानों को एक झटके में घाटे में डाल सकते हैं। यही कारण है कि उत्पादन बढ़ने के बावजूद किसानों की वास्तविक आय में अपेक्षित सुधार नहीं दिखता। अर्थशास्त्रियों के अनुसार, यह मॉडल किसानों को थोड़े समय लिए सुरक्षा तो देता है, लेकिन लंबे समय के लिए आर्थिक रूप से समृद्ध नहीं बनाता।
दुनिया में क्या स्थिति?
अगर भारत की तुलना चीन, वियतनाम या थाईलैंड से की जाए तो एक अहम अंतर सामने आता है और वह है संसाधनों के सही उपयोग की। चीन और वियतनाम ने ऐसी तकनीकें अपनाई हैं, जिनसे कम पानी में ज्यादा उत्पादन संभव हुआ है।
भारत कुल उत्पादन में भले ही आगे हो, लेकिन प्रति हेक्टेयर उत्पादकता और पर्यावरणीय संतुलन के मामले में वह पीछे रह जाता है। यही वजह है कि भविष्य में प्रतिस्पर्धा केवल चावल के मात्रा की नहीं, बल्कि उत्पादन की दक्षता और उसे स्थिर बनाए रखने की होगी।
क्या बदलाव संभव है?
भारत के लिए चुनौती यह नहीं है कि चावल उत्पादन घटाया जाए, बल्कि यह है कि उसे संतुलित और टिकाऊ बनाया जाए। फसल विविधीकरण इसका पहला कदम हो सकता है। मोटे अनाज, दालें और तिलहन कम पानी में बेहतर पोषण और आय दे सकते हैं।
तकनीकी सुधार जैसे डायरेक्ट सीडेड राइस और SRI पानी और लागत दोनों कम कर सकते हैं। एसआरआई यानी कि सिस्टम ऑफ राइस इंटेसिफिकेशन (सघन धान प्रणाली) सिंचाई धान की खेती की एक उन्नत और टिकाऊ तरीका है, जो कम पानी, कम बीज और कम लागत में अधिक पैदावार देता है। इसमें खेतों में पानी भरकर नहीं रखा जाता, बल्कि मिट्टी को सिर्फ नम रखा जाता है और क्रमिक रूप से सुखाया व भिगोया जाता है। जिससे कम पानी में भी धान उगाया जा सकता है।
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साथ ही, MSP और खरीद नीति का विस्तार केवल धान-गेहूं तक सीमित न रखकर अन्य फसलों तक करना होगा। तो कुल मिलाकर देखा जाए तो भारत चावल उत्पादन में नंबर-1 है, लेकिन यह उपलब्धि पानी, पर्यावरण और आर्थिक संसाधनों की भारी कीमत पर हासिल हुई है। अब सवाल यह नहीं है कि भारत कितना चावल उगाता है, बल्कि यह है कि क्या यह मॉडल आने वाले दशकों तक टिकाऊ रह पाएगा?
