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बदहाली, बेबसी और हक की आस, बंगाल के चाय बागान मजदूर क्या चाहते हैं?

पश्चिम बंगाल के चाय बागानों में काम करने वाले मजदूरों का एक बड़ा हिस्सा, पीएफ के लिए तरस रहा है। यह सिर्फ एक समस्या है। उनकी परेशानियां क्या हैं, आइए समझते हैं।

Tea Garden

दार्जिलिंग का चाय बागान। Photo Credit: Tea Board

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चाय, हमारी लाइफस्टाइल का अहम हिस्सा है। कुछ लोग इसे तलब का नाम देते हैं, कुछ लोग इसे सुकून मानते हैं। चाय की एक चुस्की, आपको ताजगी का अहसास कराती है। जिन लोगों की वजह से आप तक चाय पहुंचती है, वे इन दिनों परेशान हैं। उनकी परेशानी की वजह, उनके हक से जुड़ा पैसा है। 

पश्चिम बंगाल के जलपाई गुड़ी में एंप्लाई प्रोविडेंट फंड ऑर्गेनाइजेन (EPFO) के क्षेत्रीय कार्यालय के सामने धरने पर बैठे हैं। तृणमूल चाय बागान श्रमिक यूनियन (TCBSU) इस आंदलोन की अगुवाई कर रहा है। दावा किया जा रहा है कि चाय कंपनियों ने PF जमा नहीं किया है, जिससे बकाया राशि लगभग 100 करोड़ रुपये तक पहुंच गई है।

तृणमूल कांग्रेस रितब्रत बनर्जी ने दावा किया है कि  कंपनियां मजदूरों की सैलरी से PF काटती हैं, लेकिन उसे जमा नहीं करतीं। केंद्र सरकार ने इसके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की। उन्होंने मांग की है कि हर चाय बागान के PF बकाया की गार्डन-वाइज सूची सार्वजनिक की जाए और इसे ऑनलाइन, PF कार्यालयों तथा बागानों में भी लगाया जाए। अगर ऐसा नहीं हुआ तो आंदोलन जारी रहेगा।

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PF के लिए तरस रहे चाय मजदूर

चाय कंपनियों में काम करने वाले मजदूर पीएफ के लिए तरस रहे हैं। रितब्रत बनर्जी का दावा है कि केंद्र सरकार के अधीन आने वाली कंपनी एंड्र्यू यूल की चार चाय बागानों में भी करीब 10 करोड़ रुपये का PF बकाया है। उन्होंने आरोप लगाया है कि चुनाव से पहले उन्होंने उत्तर बंगाल की चाय इंडस्ट्री को बचाने और बंद डंकन गार्डन्स को फिर से खोलने के वादे किए थे लेकिन ऐसा नहीं हो पाया।

चाय मजदूरों की मांग क्या है?

चाय बागान में काम करने वाले मजदूरों की दैनिक मजदूरी 200 से 250 रुपये है। मजदूरों का कहना है कि इतनी कम मजदूरी पर काम करना असंभव है। मजदूर लंबे समय से न्यूनतम मजदूरी अधिनियम लागू करने की मांग कर रहे हैं। उनकी मांग है कि दैनिक मजदूरी को बढ़ाकर कम से कम 350-590 रुपये किया जाए। चाय बागानों में काम करने वाले ज्यादातर मजदूर पीढ़ियों से बागानों के अंदर लेबर क्वार्टर में गुजारा कर रहे हैं। उनके पास उस जमीन का कानूनी मालिकाना हक नहीं है।

बागान मालिक जब चाहें, उन्हें भगा सकते हैं। वे अपने लिए पट्टे की जमीन भी मांगते रहे हैं। चाय बागानों के मजदूर भूमि अधिकार की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि उन्हें भूमि हीन होने की वजह से कई सरकारी योजनाओं का लाभ हीं मिल पाता। वे पीएम आवास योजना और चाय सुंदरी जैसी योजनाओं का लाभ नहीं ले पाते हैं।

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चाय बागान में काम करते मजदूर। Photo Credit: PTI

कई बागानों में अस्पताल और एम्बुलेंस की सुविधा नहीं है। मजदूरों को गंभीर स्थिति में 30-40 किलोमीटर दूर जाना पड़ता है। बच्चों के लिए स्कूल दूर हैं। ट्रांसपोर्ट के बेहतर साधन नहीं हैं। बागानों में साफ पानी और सुलभ शौचालय जैसी समस्याएं दशकों से रहीं हैं। चाय बागानों में काम करने वाली एक बड़ी आबादी महिला श्रमिकों की है। उन्हें सबसे ज्यादा इन मुश्किलों से गुजरना पड़ता है। 

कई बागान मालिकों ने मजदूरों के वेतन से भविष्य निधि (PF) का पैसा तो काटा था लेकिन उसे सरकारी कोष में जमा ही नहीं किया। रिटायर मजदूरों को सालों तक ग्रेच्युटी नहीं मिलती। इसे लेकर जलपाईगुड़ी में PF दफ्तर के बाहर टीएमसी की अगुवाई प्रदर्शन भी चल रहा है। वे बेहतर और पारदर्शी व्यवस्था चाहते हैं। 

जलपाईगुड़ी और कूच बिहार इलाके में दर्जनों चाय बागान बंद पड़े हैं। वहां के मजदूरों के पास आय का कोई साधन नहीं है। कुछ इलाकों में भुखमरी और कुपोषण की स्थिति है, कुछ जगहों से लोग पलायन कर चुके हैं। बंद बागानों को दोबारा खोलने की मांग भी मजदूर उठाते रहते हैं।

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महिला मजदूर बागानों में सुलभ शौचालय की मांग करती रही हैं। Photo Credit: PTI

मजदूर चाहते हैं कि उनकी रिटायरमेंट की उम्र 58 साल से बढ़ाकर 60 साल से ज्यादा की जाए। मजदूरों की शिकायत रहती है कि उन्हें बेहतर राशन नहीं मिलता। जंगली लकड़ियों के जलाने पर प्रतिबंध है। चाय मजदूरों से इन सुधारों का वादा एक अरसे से किया जा रहा है। अभी तक उन्हें हर बार इंतजार ही करना पड़ा है। 

चाय उत्पादन में कहां खड़ा है पश्चिम बंगाल?

देश में चाय का उत्पादन करने वाले 4 प्रमुख राज्य हैं। असम, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और केरल। पूर्वोत्तर के कुछ और राज्यों में भी चाय के बागान हैं। पश्चिम बंगाल के 3 जिलों में चाय की खेती खूब होती है, दार्जीलिंग, जलपाईगुड़ी और कूचबिहार। इन जिलों में चाय बागानों की कुल संख्या करीब 300 से ज्यादा है। दार्जीलिंग, जलपाईगुड़ी और कूच बिहार उत्तर बंगाल के प्रमुख चाय उत्पादक जिले हैं, वहीं तराई क्षेत्रों में भी चाय का उत्पादन खूब होता है।

अलीपुरदुआर, कालिम्पोंग और उत्तरी दिनाजपुर को भी शामिल किया जाता है, लेकिन मुख्य उत्पादन इन्हीं तीन शहरों में होता है। चाय उत्पादन में पश्चिम बंगाल दूसरे स्थान पर है। टी बोर्ड के आकंड़े बताते हैं कि असम जहां हर साल 104.85 लाख किलोग्राम चाय उत्पादित करता है, वहीं पश्चिम बंगाल 56.03 लाख किलोग्राम उत्पादन करता है। 

चाय बागान। Photo Credit: PTI

चुनाव में ही क्यों याद आते हैं चाय बागानों के मजदूर?

चाय उत्पादन में पश्चिम बंगाल के 3 जिले सबसे मजबूत हैं। दार्जिलिंग में 5 विधानसभा सीटें हैं। जलपाईगुड़ी में करीब 8 विधानसभा सीटें हैं। कूचबिहार में 9 विधानसभा सीटें हैं। अलीपुरद्वार की करीब 5 विधानसभाओं में चाय की खेती होती है। कुल मिलाकर 26 से ज्यादा विधानसभाओं में चाय बागान फैले हैं। विधानसभा चुनावों में चाय बागानों का मुद्दा जोर से उठता है फिर शांत पड़ जाता है।

कहां कैसी चाय बनती है खेल समझिए

दार्जिलिंग में प्रिमियम क्वालिटी की चाय बनती है। तराई और डुआर्स कहे जाने वाले इलाके में थोड़ी सस्ती क्वालिटी की से क्रश, टियर, कर्ल वाली CTC चाय बनती है। दार्जिलिंग, अलीपुरद्वार और जलपाईगुड़ी जिलों के बागानों में काम करने वाले ज्यादातर मजदूर गोरखा, मुंडा, ओरांव और मतुआ जैसे आदिवासी समुदाय से आते हैं। किसी जमाने में यहां के लोग वाम दलों के वफादार वोटर थे, अब बीजेपी की तरफ इनका रुझान बढ़ा है। अब टीएमसी और बीजेपी दोनों इन्हीं मजदूरों को लुभाने पर जोर देती हैं।

चाय बागान। Photo Credit: PTI

मजदूरों के लिए क्या करने की कवायद होती है?

ममता बनर्जी दावा करती हैं उन्होंने चाय बागानों के मजदूरों के लिए कई कल्याणकारी योजनाएं शुरू की हैं। टीएमसी सरकार ने चाय सुंदरी योजना के तहत 3 लाख स्थाई मजदूरों को घर बनाने के लिए करीब 500 करोड़ रुपये का फंड आवंटित किया था। ममता बनर्जी ने तर्क दिया था कि बंद बागानों को सहकारी समिति से चलाए जाएंगे। ममता मजदूरों के लिए 2 रुपये किलो चावल, मुफ्त बिजली, स्वास्थ्य सुविधा, बच्चों के लिए मिड-डे मील जैसी योजनाएं लेकर आईं हैं। 

2011 से मुख्यमंत्री हैं ममता बनर्जी, चाय मजदूरों आज भी बुनियादी चीजों के लिए तरस रहे हैं। Photo Credit: PTI

बीजेपी भी इसी तरह की कवायद करती रही है। बीजेपी ने वादा किया था कि मजदूरों की दैनिक मजदूरी में 150-350 रुपये तक बढ़ोतरी की जाएगी। बंद बागानों को केंद्र सरकार चलवाएगी। चाय बागान में रहने वालों को जमीन का पट्टा दिया जाएगा। 11 गोरखा उप-जनजातियों को अनुसूचित जनजाति का दर्जा मिलेगा। इस बेल्ट के लोग आज भी सरकारों के वादे पूरे होने के इंतजार में हैं। 

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