रॉइटर्स बिल्डिंग, बंगाल की राजनीति का पॉवर सेंटर। पावर में थी मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (CPM) और ज्योति बसु पिछले 16 सालों से मुख्यमंत्री की कुर्सी पर विराजमान थे। मुख्यमंत्री और उनके मंत्रियों का दफ्तर इसी राइटर्स बिल्डिंग में हुआ करता था और इसी बिल्डिंग के सामने आधी रात को बवाल मचा हुआ था क्योंकि एक युवा नेता और एक बलात्कार पीड़िता को मुख्यमंत्री कार्यालय से घसीटकर बाहर कर दिया गया था। न केवल घसीटा गया, बाूलों से पकड़कर खींचा गया। लाठी भी मारी गई। दोनों को चोट भी आई। नेता को हवालात और पीड़िता को अस्पताल भेजा गया और यह सब इसलिए हुआ क्योंकि दोनों मुख्यमंत्री से मिलना चाहते थे लेकिन मुख्यमंत्री का ऐसा कोई इरादा न था। 

 

पश्चिम बंगाल के नदिया जिले की रहने वाली पीड़िता मूकबधिर थी। बोल नहीं सकती थी, उसके साथ बलात्कार हुआ। गर्भवती हो गई। आरोप लगा, सीपीएम के एक नेता पर। पीड़िता अपने परिवार के साथ पुलिस के पास गई लेकिन केस दर्ज नहीं हुआ क्योंकि मामला सत्ताधारी पार्टी के नेता से जुड़ा हुआ था। मसला जनवरी 1993 का है। राज्य में सीपीएम की सरकार थी और केंद्र में कांग्रेस की। कांग्रेस के कुछ लोकल नेता पीड़िता को कांग्रेस की ही एक नेता के पास ले गए। जो उस समय केंद्रीय मंत्री और युवा कांग्रेस की तेज तर्रार अध्यक्ष थी। इस युवा नेता ने मुख्यमंत्री से मिलने का समय लिया लेकिन मुख्यमंत्री बिना मिले ही अपने चेम्बर से निकल गए।  

 

जैसे ही यह बात युवा नेता को पता चली, वह भड़क गई। गर्भवती पीड़िता के साथ वहीं चैम्बर के सामने ही फर्श पर बैठ गई और दफ्तर को घेर लिया। पुलिस ने उन्हें मनाने की कोशिश की लेकिन मुख्यमंत्री की उदासीनता से नाराज नौजवान महिला नेता बिल्कुल भी पीछे हटने के मूड में नहीं थी। इसके बाद जो कुछ भी हुआ वह बेहद शर्मनाक था। पुलिस ने बल प्रयोग किया। एक गर्भवती बलात्कार पीड़िता और एक महिला केंद्रीय मंत्री को बालों से घसीटकर राइटर्स बिल्डिंग से बाहर कर दिया गया। जैसे ही यह खबर कांग्रेस कार्यकर्ताओं को मिली राइटर्स बिल्डिंग के बाहर प्रदर्शन शुरू हो गया, जो देर रात तक चला। आधी रात मेयो रोड चौराहे पर खड़ी महिला नेता बाहर से शांत थी लेकिन अंदर ही अंदर सन्नाटा उबाल मार रहा था। उस महिला ने कहा, 'अगर मैं फिर कभी राइटर्स बिल्डिंग में कदम रखूंगी तो सिर ऊंचा करके रखूंगी।' 

 

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शायद नियति ने भी यही तय कर रखा था। 18 सालों के बाद, 20 मई 2011 को वह महिला नेता वापस राइटर्स बिल्डिंग गई। समर्थकों के विशाल सैलाब के साथ। जो करीब एक किलोमीटर तक साथ पैदल चलकर आए थे और साढ़े तीन दशक बाद हो रहे ऐतिहासिक बदलाव को अपनी आंखों से देख रहे थे। हजारों की भीड़ जय-जयकार कर रही थी। नीली ज़री की किनारी वाली चटक सफ़ेद रंग की साड़ी पहने महिला नेता उन्हीं सीढ़ियों से, उसी गलियारे से होकर राइटर्स बिल्डिंग गई जहां से उसे धक्का मारकर बाहर निकाला गया था। जिस चैम्बर में उसे घुसने नहीं दिया गया था, उसी चैम्बर में गई और मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठी क्योंकि उसने कम्युनिस्टों के गढ़ को ध्वस्त कर दिया था। परिवर्तन हुआ। बंगाल में CPM का 34 सालों का शासन खत्म हुआ और शुरु हुआ एक नया दौर। 

 

कल्पना करिए हिंदुस्तान में क्या यह संभव है कि एक लोअर मिडिल क्लास की महिला बिना किसी गॉडफादर या किसी राजनैतिक बैकग्राउंड के देश की राजनीति में सिरमौर बनकर उभरे? क्या दुबली पतली कम लंबाई की, एक सूती साड़ी और हवाई चप्पल में घूमने वाली महिला के बेबाक अंदाज से विपक्षी खौफ में आ सकते हैं? सोच सकते हैं कि यह महिला संसद में एक बुली सांसद को कॉलर पकड़कर सदन से बाहर पटक सकती है? हां, ऐसा हो सकता है और हुआ है। हिंदुस्तान ऐसी ही जगह है। यहां का जनतंत्र ऐसा ही है और जिस महिला नेता ने ये सब करके दिखाया उनका नाम है ममता बनर्जी। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष। 

ममता बनर्जी की शुरुआती कहानी

 

ममता बनर्जी के माता-पिता बिल्कुल साधारण लोग थे जो किसी तरह अपना जीवन यापन करते थे। वह बहुत छोटी उम्र में कोलकाता आ गई थीं। ममता अब भी उस दो कमरों वाले घर, नंबर 30-B में रहती हैं जहाँ वह पली-बढ़ी थीं। स्कूल का सर्टिफिकेट बताता है कि ममता 5 जनवरी 1955 को पैदा हुईं लेकिन यह उनका असली जन्मदिन नहीं है। स्कूल में एडमिशन कराते समय उनके पिता ने यह तारीख दर्ज करा दी थी। वह दुर्गाष्टमी के दिन पैदा हुई थीं। ममता जब 17 साल की थीं तभी उनके पिता की मृत्यु हो गई। 

 

 

ममता तब कॉलेज में थीं। घर में छोटे भाई-बहन थे। मां की तबीयत ठीक नहीं रहती थी। सब की देखभाल की जिम्मेदारी ममता पर ही थी। 1970 तक ममता सक्रिय राजनीति में आ चुकी थीं। उन्होंने कॉलेज में कांग्रेस के छात्र संगठन छात्र परिषद को मजबूत करना शुरु किया और पहले से स्थापित DSO छात्र संगठन को कड़ी टक्कर दी। कॉलेज में ही रहते कांग्रेस के नेताओं से संपर्क बढ़ा। 1972 से 77 तक कांग्रेस की सरकार थी। नौकरियों के ऑफर मिले लेकिन ममता ने ठुकरा दिए। ममता को यह शुरू से क्लियर था कि उन्हें करना क्या है। उन्हें राजनीति ही करनी थी और नौकरी जॉइन करतीं तो राजनीतिक सक्रियता कम होती। 

 

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1977 का चुनाव देश, बंगाल और ममता तीनों के लिए एक टर्निंग पॉइंट था। इमरजेंसी के बाद हुए चुनावों में कांग्रेस का सफाया हो गया। इंदिरा गांधी समेत कई बड़े-बड़े दिग्गज धाराशायी हो गए। देश में जनता पार्टी की सरकार बनी और बंगाल में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की। ममता कॉलेज की राजनीति के साथ-साथ कोलकाता की सड़कों पर भी उतर चुकी थीं। इंदिरा गांधी को गिरफ्तार किया गया तो ममता बनर्जी ने विरोध में प्रदर्शन किया। गिरफ्तारी दी। तब वह श्री शिक्षायतन कॉलेज से बी.एड. कर रही थीं। वह प्रदर्शनों में किताबें लेकर जाती थीं। प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई कोलकाता आए तो कांग्रेस नेताओं ने काला झंडा दिखाने का प्लान बनाया। पुलिस के सख्त पहरे के बावजूद ममता काला झंडा लहराते हुए काफिले के सामने पहुंच गईं। जैसे ही प्रधानमंत्री की गाड़ी आई नारे लगाते हुए उनकी गाड़ी के सामने खड़ी हो गईं और काला झंडा उनकी गाड़ी पर टिका दिया। वैसे यह पहली बार नहीं था। 1975 में वह सोशलिस्ट लीडर जयप्रकाश नारायण की कार के बोनट पर भी चढ़ चुकी थीं। 

नजर में आ गईं ममता बनर्जी

 

धीरे-धीरे ममता पुलिस प्रशासन की नजरों में आने लगीं और सत्ताधारी सीपीएम की भी। उनके मोहल्ले में कई बार बम फेंके गए। चाकू-छुरी और बंदूक दिखाकर धमकाया जाता। पुलिस में शिकायत पर कोई कार्रवाई नहीं होती लेकिन इन सब के बावजूद ममता पीछे नहीं हटीं। बल्कि यह लड़ाई और आगे बढ़ती गई। 'My Unforgettable Memories' में ममता बनर्जी लिखती हैं कि CPM की मिलिशिया से उनकी लड़ाई पूरी जिंदगी चलती रही। 365 में से 330 दिन कोलकाता की सड़कों पर जान की बाजी लगाना रूटीन काम था। रोज नारेबाजी, धरना-प्रदर्शन, रोज हिंसा। कॉलेज के छात्रसंघ चुनावों के दौरान छात्र परिषद और कम्युनिस्ट संगठनों के बीच लड़ाई झगड़ा सामान्य बात थी। यहां तक गोली-बम तक चल जाते थे। पुलिस की लाठियां मिलतीं सो अलग लेकिन बेबाक अंदाज वाली निडर ममता हमेशा आंदोलन में आगे रहतीं। चाहे इंदिरा गांधी के पक्ष में रैली निकालनी हो या बंगाल में लेफ्ट की उभरती राजनीति के विपक्ष में, ममता हमेशा आगे रहीं लेकिन सत्तर के दशक में ही लेफ्ट ने नक्सलबाड़ी के बाद कांग्रेस को बंगाल से चलता कर दिया और सत्ता हासिल कर ली। वह वक्त था कि बंगाल की राजनीति में हिंसा का जो प्रवेश हुआ वह कभी गया ही नहीं। हिंसा के बीच लेफ्ट ने सत्ता हासिल की थी और हिंसा के साथ ही उसे बनाए रखने का प्रयत्न भी किया।

 

1978 से 1983 तक छात्र परिषद ने खूब रैलियां, प्रदर्शन, आंदोलन किए लेकिन कांग्रेस की आपसी गुटबाजी की वजह से धीरे-धीरे ये कम होती गईं। 1980 में इंदिरा गांधी सत्ता में वापस आईं। 1983 में कोलकाता में कांग्रेस का कन्वेंशन हुआ। ममता बनर्जी को VVIP डेलीगेट्स की देखभाल की जिम्मेदारी मिली। यहीं पहली बार ममता बनर्जी, राजीव गांधी से मिलीं। 

 

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अगले ही साल प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या हो गई। राजीव तब बंगाल के मिदनापुर में थे। वह दिल्ली लौट गए और फिर प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। चुनावों का एलान हुआ। नींद, आराम और फैशन को त्यागकर ममता ने पार्टी के लिए जो काम किया वह जल्द ही बंगाल कांग्रेस के नेताओं की नजर में खटकने लगीं। 1984 में इंदिरा गांधी बंगाल में नए उम्मीदवारों को खोज रही थीं, विशेषकर महिला उम्मीदवार क्योंकि बंगाल कांग्रेस में आपसी लड़ाई बहुत ज्यादा थी। एक वरिष्ठ नेता ममता को जानते थे, उन्होंने उनका नाम प्रपोज कर दिया।  ममता को लोकसभा सीट तो मिल गई लेकिन लेफ्ट के सीनियर और वेटरन लीडर सोमनाथ चटर्जी के खिलाफ। यह सीट थी जादवपुर। जादवपुर को कम्युनिस्टों का गढ़ कहा जाता था। सोमनाथ चटर्जी दो बार से सांसद थे। कांग्रेस के बड़े-बड़े नेता वहां से चुनाव लड़ने से कतराते थे। खुद ममता को जीत की उम्मीद नहीं थी लेकिन वह पीछे हटने को भी तैयार नहीं थीं। लेफ्ट ने ममता के खिलाफ दुष्प्रचार कर दिया कि ममता के पास अमेरिका की यूनिवर्सिटी से एक फर्जी डिग्री है। ममता पढ़ी लिखी महिला थीं लेकिन इस आक्रमण से बौखला गईं। उन्होंने भी जवाबी हमला किया और सोमनाथ चटर्जी पर तरह-तरह के आरोप लगा दिये। तब तक माहौल बदल चुका था क्योंकि चुनाव की घोषणा से पहले ही इंदिरा गांधी की हत्या हो चुकी थी। सिम्पथी वोट मिले और ममता बनर्जी ने 29 साल की उम्र में एक बड़े नेता को हराकर पहली बार संसद में प्रवेश किया।

ममता को 'दीदी' किसने कहा?

 

1984 के बाद ममता रुकी नहीं। बंगाल उनका प्रेम था, लेफ्ट को सत्ता से बेदखल करना उनका लक्ष्य था। वह जिलों में जाकर लोगों से मिलती रहीं। कोई भी हत्या, रेप या विरोध होता, ममता वहां मौजूद होतीं। उनकी इसी मौजूदगी के दौरान प्रख्यात लेखिका महाश्वेता देवी से उनका परिचय हुआ। महाश्वेता देवी ने ही ममता को दीदी का तमगा दिया जो उनके साथ हमेशा के लिए रह गया। बंगाली में दीदी माने हर प्रॉब्लम का एक सल्यूशन। उनकी लोकप्रियता बढ़ती गई लेकिन इससे उनकी ही पार्टी के भीतर उनका विरोध भी होने लगा। कांग्रेस पार्टी की बंगाल इकाई में गुटबाजी अपने चरम पर थी और किसी युवा नेता पर सीधा प्रधानमंत्री राजीव गांधी का हाथ होना बाकी नेताओं के लिए चुनौती थी। 

 

ममता की शिक्षा को लेकर तमाम तरह के दुष्प्रचार किए गए और इसमें उनकी पार्टी के लोग भी शामिल थे लेकिन राजीव गांधी ढाल की तरह ममता के साथ खड़े थे। एक दिन संसद भवन में राजीव गांधी ने ममता को बुलाया। ममता घबरा गईं। समझ नहीं आ रहा था कि क्या हो गया लेकिन अंदर पहुंची तो राजीव के व्यवहार से चौंक गईं। राजीव ने उनसे कहा, 'मैं तुम्हारे साथ हूं। तुम चिंता मत करो और मैं तुम्हें यूथ कांग्रेस का महासचिव नियुक्त कर रहा हूं।' ममता स्तब्ध थीं। विरोधियों की सारी साजिशें धरी की धरी रह गईं।

 

संसद में भी युवा ममता अपने तीखे तेवरों के लिए पहचानी गईं। नवंबर 1988 में हरियाणा के मुख्यमंत्री देवीलाल की बहू सुप्रिया की संदिग्ध परिस्थितियों में गोली लगने से मौत हो गई। देवीलाल परिवार ने इसे हादसा बताया जबकि कांग्रेस ने हत्या का आरोप लगाया। ममता बनर्जी ने सदन की कार्यवाही के दौरान जीरो आवर में इस मुद्दे को उठाया और सीबीआई जांच की मांग की। विपक्ष के नेता, उनका समर्थन करने की बजाय बार-बार टोक रहे थे। ममता बनर्जी हाथ में चांदी का कड़ा पहनती थीं। उन्होंने उसे उतारा और मधु दंडवते के सामने रख दिया और कहा,  'अगर आप लोगों में हिम्मत नहीं है तो यह कड़ा पहनकर घर बैठ जाइए।' 

 

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जवाब में तेलुगू देशम के एक सांसद ने अपने जूते उतारकर ममता की टेबल पर रख दिए। सदन में भारी हंगामा हुआ। ममता घर आईं और खाना खाकर सो गईं। रात करीब तीन बजे उनका फोन बजा। उठाने पर दूसरी तरफ से आवाज आई, 'बधाई हो। आज तुमने सदन में औरतों का मान रखा… जिन्होंने तुम्हारी सीट पर जूते रखे, उनका मुंहतोड़ जवाब दो।'

 

यह प्रधानमंत्री राजीव गांधी की आवाज थी। पहली बार सांसद बनी युवा नेता के लिए यह बड़ी बात थी। 1987-88 में राजीव गांधी, ममता को यूथ कांग्रेस का अध्यक्ष बनाना चाहते थे लेकिन उनकी अपनी ही पार्टी के नेताओं ने इसका विरोध किया। आखिर में तय ये हुआ कि ममता को महिला कांग्रेस में समायोजित किया जाए। बंगाल दौरे पर आए राजीव दिल्ली लौट रहे थे। फ्लाइट में उनके साथ ममता और कई अन्य कांग्रेसी नेता भी थे। 

राजीव ने ममता की तारीफ की और कहा- ममता तुम अच्छा काम कर रही हो मैं तुम्हें कुछ बड़ी जिम्मेदारी देना चाहता हूं।  

ममता ने साफ कहा, 'आपका यह कहना ही बड़ी बात है। मुझे कुछ नहीं चाहिए। मैं महिला कांग्रेस में नहीं जाऊंगी।' 

राजीव समझ गए। उन्होंने कहा, 'ठीक है, जो तुम नहीं चाहती वह तुमसे नहीं कराऊंगा।'

 

बंगाल कांग्रेस की इनफाइटिंग इतनी ज्यादा थी कि ममता बनर्जी को दरकिनार करने की कोशिश की जाती रही। ममता बनर्जी के समर्थक यह मानते हैं कि 1989 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने लेफ्ट के साथ मिलकर उनको हरवा दिया। चुनाव हारने के बाद ममता ने दिल्ली छोड़ दी। पूरा ध्यान बंगाल पर लगाया। 1990 में बसों का किराया बढ़ाने के खिलाफ आंदोलन हो रहा था। पुलिस की फायरिंग में 3 लोग मारे गए। ममता नजरबंद थीं। 12 अगस्त 1990 को राजीव गांधी के निजी सचिव का फोन आया। उन्हें दिल्ली बुलाया गया। दिल्ली में राजीव ने ममता से कहा, 'इंतजार बहुत लंबा हो गया। अब तुम्हें पश्चिम बंगाल यूथ कांग्रेस की कमान संभाल लेनी चाहिए।' 

साथ ही राजीव ने ममता को लेकर चिंता भी जाहिर की। कहा, 'तुम्हारी जान को खतरा है। तुम्हें मारने की प्लानिंग हो रही है।ट ममता ने राजीव को धन्यवाद दिया और वापस कोलकाता लौट आईं। 

 

16 अगस्त 1990 को कोलकाता में कांग्रेस का बड़ा प्रदर्शन था। ममता बनर्जी की मां डर रही थीं। उन्होंने ममता को प्रदर्शन में जाने से रोका लेकिन ममता नहीं मानीं। मां का अंदेशा सही साबित हुआ। हाजरा मोड़ के पास चार-पांच टैक्सियों में भरकर आए गुंडे रैली पर टूट पड़े। लालू आलम नाम के एक हमलावर ने ममता के सिर पर रॉड से हमला किया। ममता, खून से तर-बतर हो गईं। जब तक वह संभल पातीं, दूसरा वार भी सिर पर ही हुआ। तीसरे वार से पहले ही वह बेहोश होकर सड़क पर गिर गईं। अस्पताल में ममता जिंदगी और मौत से जूझती रहीं। उनके बचने की संभावना भी कम हो गई थी। ममता भगवान में यकीन करती हैं। उन्होंने माना कि भगवान ने चाहा तो वह बच गईं लेकिन यह चोट आज भी उन्हें परेशान करती है। 

ममता पर हमला और यूथ कांग्रेस की मुखिया

 

कांग्रेस के नेताओं को हैरानी तब हुई जब ममता को देखने हजारों लोग आने लगे। उनको पता नहीं था कि दीदी लोगों में अपनी पैठ बनाती जा रही है। इस बार राजीव गांधी नहीं माने और उन्होंने ममता को यूथ कांग्रेस का प्रेसिडेंट बना ही दिया। इस हमले के बाद ममता की राजनीति का एक नया अध्याय शुरू हुआ। उन्होंने दो मोर्चों पर लड़ाई शुरू की। पार्टी के बाहर CPM से और पार्टी के अंदर बंगाल कांग्रेस के नेताओं से और यह लड़ाई शुरू हुए ज्यादा दिन हुए भी नहीं थे कि ममता को अब तक का सबसे बड़ा झटका लगा। राजीव गांधी की हत्या हो गई। 

 

6 मई 1991, चुनाव प्रचार जोरों पर था। राजीव गांधी कोलकाता आए। रात करीब साढ़े 9 बजे साउथ कोलकाता से चुनाव लड़ रहीं ममता बनर्जी के लिए प्रचार करने गए। खचाखच भरे मैदान में लोग उन्हें कंधों पर उठाकर मंच तक ले गए। भाषण के बाद जाने लगे तो ममता से पूछा, 'तुम कैसी हो? कोई तकलीफ तो नहीं?'  

 

सिर पर हाथ रखा और अगली सभा के लिए रवाना हो गए। ठीक 15 दिन बाद वह खबर आई जिसने हर किसी को झकझोर कर रख दिया। ममता बनर्जी सदमे में थीं। उन्होंने कहा, 'अपने पिता के बाद आज मैं दूसरी बार अनाथ हो गई।' ममता बनर्जी जैसी एक मध्यमवर्गीय लड़की के लिए, जिसका राजनीति में कोई गॉडफादर न हो, राजीव गांधी का संरक्षण होना बड़ी बात थी। वह ममता के लिए बरगद की तरह थे। उन्होंने राजीव के लिए अपने मन में हमेशा कृतज्ञता रखी। शायद यही वजह है कि आज तक सोनिया गांधी पर उन्होंने कभी हमला नहीं बोला। 

 

1991 के चुनाव से पहले कांग्रेस के कुछ नेताओं ने उनके सामने एक प्रस्ताव रखा। कहा, 'अगर वह मानिकतला से अपना उम्मीदवार हटा लें तो साउथ कोलकाता में CPM उन्हें डिस्टर्ब नहीं करेगी और अगर ऐसा नहीं किया तो दक्षिण कोलकाता में वह उन्हें जीतने नहीं देंगे।' लेफ्ट-कांग्रेस की ऐसी जुगलबंदी देख ममता भड़क गईं। उन्होंने सिरे से इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया। ममता, बंगाल में कांग्रेस की दुर्गति का जिम्मेदार अपनी ही पार्टी के नेताओं को मानती थीं। पार्टी की स्थिति इस दौरान तरबूज के जैसे थी। बाहर से हरा अंदर से लाल। पार्टी में उस समय दो धड़े थे। एक उदारवादी, जो सुविधाजनक विपक्ष की भूमिका में था और सरकार के साथ समन्वय बनाकर जो जैसा चल रहा है चलने दो वाले मोड में था। दो-चार सीटें जीत लें, राज्य में पार्टी का संगठन बना रहे, बस। उदारवादी धड़े का नेता प्रणब मुखर्जी को माना जाता था। इंदिरा गांधी के करीबी रहे कांग्रेस के सीनियर लीडर मुखर्जी, प्रधानमंत्री की कुर्सी के दावेदार थे लेकिन उस पर बैठे राजीव गांधी और यह कहा जाता है कि दोनों के बीच रिश्ते अच्छे नहीं थे। यही वजह थी कि बंगाल में राजीव गांधी लगातार ममता को प्रमोट कर रहे थे। 
 
दूसरा गुट कट्टर लेफ्ट विरोधी नेताओं का था। जो आक्रामक राजनीति का पक्षधर था। कम्यूनिस्टों का शासन उखाड़ फेंकने के लिए कुछ भी करने को तैयार था। जो किसी भी तरह का समझौता नहीं चाहता था। ममता बनर्जी इसी गुट का नेतृत्व कर रही थीं।

छोड़ दिया मंत्री पद


ममता बनर्जी 1991 में खुद चुनाव लड़ने की बजाय दूसरे उम्मीदवारों के लिए प्रचार करना चाहती थीं। राजीव गांधी ने उन्हें चुनाव लड़ने के लिए तैयार किया था। वह चुनाव जीत गईं थीं। पीएम नरसिम्हा राव की कैबिनेट में मानव संसाधन विकास, युवा मामले, खेल, महिला एवं बाल विकास की राज्य मंत्री भी बनीं। जिसकी उन्हें बिल्कुल भी उम्मीद नहीं थी पर जो ठहर जाए, वह ममता बनर्जी कैसे हो सकता है। लुटियंस दिल्ली उनको कभी रास नहीं आई। मां, माटी और मानुस- बंगाल ही उनके लिए सब कुछ था। जहां पार्टी में आपसी गुटबाजी इतनी ज्यादा थी कि कम्यूनिस्ट सरकार को चुनौती देने वाला कोई न था। ममता बनर्जी ने इस तरबूज कॉम्बिनेशन को चुनौती देने का फैसला किया। उन्होंने बंगाल कांग्रेस के अध्यक्ष पद के लिए दावेदारी की लेकिन हार गईं। 

 

ममता अपना समय बंगाल में ही ज्यादा बिताती थीं। अपने पुराने घर से ही ऑफिस चलाती थीं और फिर वह दिन आया जब कांग्रेस ने उनका गुस्सा देखा। ममता प्रलयंकारी टाडा कानून के खिलाफ अपनी ही सरकार के खिलाफ पोस्टर लेकर चली गईं। पोस्टर पर लिखा था- टाटा टू टाडा। कांग्रेस में काफी अंदरूनी बवाल हुआ लेकिन ममता बनर्जी नहीं मानीं। अपने मंत्रालयों को लेकर भी भिड़ गईं। साफ-साफ बोल दिया कि ऐसे तो देश में स्पोर्ट्स का विकास नहीं हो सकता। फिर एक दिन भरे मंच से मंत्री पद से इस्तीफा देने का एलान भी कर दिया। 

 

यह ऐतिहासिक ब्रिगेड मैदान का कंपाउंड था। जहां जनसभा करना, ममता बनर्जी का सपना था लेकिन कांग्रेस, लंबे समय से सत्ता से बाहर थी और पार्टी के पास इंदिरा-राजीव जैसा कोई चेहरा भी नहीं था। जिसके चेहरे पर भीड़ खिंची आ जाए। इसलिए यह सपना, सपना ही लगता था लेकिन ममता ने इसे कर दिखाया। 'ब्रिगेड चलो' का नारा दिया और 25 नवंबर 1992 को रैली का एलान कर दिया। मैदान खचाखच भरा हुआ था। भीड़ उत्साहित थी और इसी रैली में खुले मंच से ममता ने मंत्री पद से इस्तीफा देने की घोषणा कर दी। उनका कहना था कि वह अपनी माटी से दूर होने के अपराधबोध में थीं। उन्हें केंद्र की जिम्मेदारियों से मुक्त होना था। बंगाल में होना था। 

 

ममता बनर्जी के इस फैसले ने लोगों को चौंकाया और अंततः 1993 में उन्हें पदमुक्त कर दिया गया लेकिन कांग्रेस पर ममता के हमले जारी रहे। यह गतिरोध चलता रहा। जिसका ट्रिगर पॉइंट आया 1996 के चुनाव में। 

 

कांग्रेस के उम्मीदवारों की लिस्ट में कुछ नामों पर ममता बनर्जी ने आपत्ति जताई। खुद चुनाव न लड़ने की धमकी दी लेकिन कांग्रेस नेतृत्व पर इसका कोई असर नहीं हुआ। ममता चुनाव लड़ीं और जीती भीं लेकिन दिल में विरोध की आग सुलग रही थी। अब धीरे-धीरे ममता को किनारे किया जाने लगा था। संसद में बोलने वालों की लिस्ट में उनका नाम नहीं होता। 1997 में फिर से संगठन के चुनाव हुए। ममता बनर्जी ने फिर से प्रदेश अध्यक्ष के लिए दावेदारी की। एक बार फिर से उन्हें हार का सामना करना पड़ा। यहीं से बगावत के बीज पड़े। 


बगावत, तृणमूल की स्थापना और पहली जीत

पंडित जवाहरलाल नेहरू की पुण्यतिथि थी। नजरुल मंच में बैठक हुई। यह मंच बंगाल के विद्रोही कवि नजरुल के नाम पर था। सारे भाषणों का सार यही था कि सच्चे कार्यकर्ताओं को ठगा जा रहा है। चुनाव महज़ तमाशा बनकर रह गया है। तृणमूल (जमीनी) कार्यकर्ता एक तरफ CPM के गुंडों और पुलिस से लड़ रहा था और दूसरी तरफ अपनी ही पार्टी के नेताओं से। दिल्ली में बैठे लोग विरोध की इन आवाजों को लगातार अनसुना कर रहे थे लेकिन यह बंगाल की भूमि थी। बगावत का खुला फैसला हुआ। 
 
21 जुलाई 1993 को राइटर्स बिल्डिंग के सामने हुई फायरिंग में मारे गए कार्यकर्ताओं की याद में जिला सम्मेलनों का आयोजन शुरू किया गया। जवाब में दूसरे धड़े ने कोलकाता के नेताजी इनडोर स्टेडियम में कांग्रेस के राष्ट्रीय अधिवेशन का एलान किया। जिसमें पार्टी के सारे बड़े नेताओं का आना तय हुआ। सोनिया गांधी और सीताराम केसरी का भी। ममता ने बगावत का एलान किया। कहा, नेता ‘इनडोर’ रहेंगे और कार्यकर्ता ‘आउटडोर’। 
 
9 अगस्त 1997 का दिन बंगाल की राजनीति के लिए ऐतिहासिक था। ममता बनर्जी ने अपनी ही पार्टी के नेताओं को खुली चुनौती दे डाली थी। राष्ट्रीय अधिवेशन के पैरलल रैली कर बगावत करने को तैयार कार्यकर्ताओं की फौज खड़ी कर दी थी। स्टेडियम के अंदर कांग्रेस पार्टी के नेताओं का अधिवेशन चल रहा था और बाहर कार्यकर्ताओं का हुजूम था। जो ममता बनर्जी के तृणमूल कार्यकर्ता सम्मेलन का हिस्सा थे। कार्यकर्ताओं की भीड़ को संबोधित करते हुए ममता ने एलान किया कि कांग्रेस पार्टी के भीतर अब वह तृणमूल मंच बनाकर संघर्ष करेंगी। 
 
सोनिया गांधी ने ममता बनर्जी को मनाने की कोशिश की कि वह पार्टी न छोड़ें और ममता ने सोनिया को मनाने की कोशिश की कि वह पार्टी की कमान संभाले। राजीव गांधी के परिवार से ममता का भावनात्मक लगाव था। यही वजह थी कि वह उनकी मौत के बाद कम से 100 बार वहां गईं। 12 दिसंबर 1997 को दिल्ली में सोनिया गांधी और ममता बनर्जी की मुलाकात हुई। ममता ने मौजूदा नेतृत्व से नाराजगी जताई और सोनिया गांधी से पार्टी की जिम्मेदारी संभालने को कहा लेकिन सोनिया गांधी ने यह कहकर मना कर दिया कि वह विदेशी हैं और लोग उन्हें स्वीकार नहीं करेंगे। 

 

सोनिया ने ममता से पार्टी के लिए एकजुट रहने के लिए कहा। बंगाल के प्रभारी महासचिव ऑस्कर फर्नांडिस को बुलाया। एक नोट तैयार करने के लिए कहा जिससे कोई अपमानित न हो लेकिन यह नोट कभी छपा नहीं। 17 दिसंबर 1997 किसी नई पार्टी के रजिस्ट्रेशन के लिए आखिरी तारीख थी। पार्टी का संविधान तैयार था। ममता ने पार्टी के रजिस्ट्रेशन के लिए आवेदन कर दिया लेकिन यह बेहद गुपचुप तरीके से किया गया। घर के बाहर मीडिया था। लगातार नेताओं के फोन आ रहे थे। इसलिए ममता ने पूरी सावधानी बरती। किसी को भनक तक नहीं लगने दी।
 
19 दिसंबर को फिर से सोनिया गांधी के साथ बैठक हुई। तय हुआ कि रात में ही ड्राफ्ट जारी कर दिया जाएगा। अगले दिन ममता कोलकाता लौट आईं लेकिन दिल्ली से जो एलान होने वाला था नहीं हुआ। 22 दिसंबर को खबर आई कि ममता बनर्जी को पार्टी से निष्कासित कर दिया गया है। ममता ने प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई और एलान किया कि वह तृणमूल कांग्रेस से चुनाव लड़ेंगी। 1 जनवरी 1998 को चुनाव आयोग ने तृणमूल कांग्रेस को एक राजनीतिक दल के तौर पर मान्यता दी। अपने पहले चुनाव में ममता बनर्जी 7 सांसदों के साथ लोकसभा पहुंची। 

ममता का उदय, लेफ्ट का खात्मा

 

ममता बनर्जी का उद्देश्य डेफिनिट था- लेफ्ट को बंगाल की राजनीति से विदा करना है। इसके लिए उन्हें किसी आइडियोलॉजिकल समस्या से डर नहीं था। अब पार्टी पूरी तरह से राज्य की राजनीति में विपक्ष की भूमिका में थी। 1999 में केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार बनने के बाद ममता मंत्रिमंडल में रेलमंत्री के रूप में शामिल हुईं। इस सरकार में न तो लेफ्ट शामिल था और ना ही कांग्रेस। इसलिए ममता को NDA के साथ आने में ज्यादा दिक्कत नहीं हुई। पहली बार बंगाल को अपने रेलमंत्री का एहसास हुआ। उन्होंने बंगाल के लिए ट्रेनें भी चलाईं। उनका उद्देश्य था कि बंगाल में टूरिज्म बढ़े। एक रेलमंत्री के रूप में बंगाली गौरव का प्रतीक बनीं पर पेट्रोल की कीमतों को लेकर वह और उनके मंत्री अजित पांजा रिजाइन की धमकी देते रहे। बात-बात पर रिजाइन वाली बात बहुत से पॉलिटिकल पंडितों को समझ नहीं आई। ममता को पॉलिटिकली इमैच्योर माना जाता रहा लेकिन NDA के साथ उनका रिश्ता काफी उतार-चढ़ाव वाला रहा। मार्च 2001 से अगस्त 2003 के बीच उन्होंने तीन बार सरकार से इस्तीफा दिया। 

 

2001 में डिफेंस घोटाले के आरोप के बाद उन्होंने एनडीए सरकार को अलविदा कहा। कांग्रेस के साथ मिलकर बंगाल में विधानसभा के चुनाव लड़ा और हार का सामना किया। लेफ्ट के सामने उनकी चली नहीं। 2003 में वापस एनडीए सरकार में शामिल हुईं। बिना पोर्टफोलियो के मिनिस्टर बनी रहीं। चुनाव की घोषणा के पंद्रह दिन पहले उनको माइनिंग मिनिस्टर बना दिया गया और उन्हीं दो सप्ताह में ममता ने घोषणाओं की झड़ी लगा दी। बंगाल में माइनिंग होती है और ये घोषणाएं बहुत दूर तक गईं पर भविष्य और बुरा होने वाला था। 2004 में बीजेपी के साथ मिलकर लोकसभा चुनाव लड़ा और पार्टी से सिर्फ एक सांसद संसद पहुंचा- खुद ममता बनर्जी। इसके बाद 2005 में नगरपालिका चुनावों में भी तृणमूल कांग्रेस की हार हुई। 2006 में विधानसभा चुनावों में बुरी हार हुई। तृणमूल के हिस्से केवल 30 विधानसभा सीटें आईं और 294 में से 235 सीटें जीत कम्युनिस्टों ने लगातार सातवीं बार अभूतपूर्व जीत दर्ज की। उस वक्त न तो कम्युनिस्टों ने और ना ही ममता बनर्जी ने सोचा होगा कि तीन दशक से अजेय लेफ्ट की यह आखिरी जीत होगी। 

सिंगूर आंदोलन और TMC की जीत

 

यह डेमोक्रेसी है और नेताओं के लिए जनता भगवान है। बंगाल की लेफ्ट सरकार पर लंबे समय से आरोप लग रहे थे कि उन्होंने बंगाल का औद्योगिक विकास रोक दिया है। ज्योति बसु के जाने के बाद नए सीएम बुद्धदेव भट्टाचार्य ने इसे बदलने की कोशिश की। इंडोनेशिया के सलीम ग्रुप को इन्वेस्टमेंट के लिए बुलाया। टाटा को नैनो कार प्रोजेक्ट के लिए बुलाया पर जनता से जमीन लेने की कोशिश की डंडे के दम पर। मुआवजा बराबर नहीं मिल रहा था, इसको लेकर जनता सड़क पर आ गई। लेफ्ट की सरकार ने दमन का सहारा लिया। ममता बनर्जी ने इसे मौके के रूप में देखा। किसानों के साथ सिंगूर से टीएमसी के विधायक रवींद्रनाथ भट्टाचार्य ने भी धरना प्रदर्शन देना शुरु कर दिया। धीरे-धीरे किसानों का आंदोलन राज्यव्यापी होता गया। इसमें बड़ी संख्या में सामाजिक कार्यकर्ता और कलाकार शामिल होने लगे। 

 

नंदीग्राम, सिंगूर में धरना-प्रदर्शन अपने चरम पर पहुंच गया। गोलियां चल गईं, हिंसा हुई। एक नाबालिग तापसी मलिक का रेप और हत्या हो गई। ममता बनर्जी ने इस आंदोलन को युद्ध बना दिया। ममता बनर्जी आमरण अनशन पर बैठ गईं। जो 26 दिनों तक चला। ममता बनर्जी को व्यापक जनसमर्थन मिला। 18 दिसंबर को सिंगूर कृषि भूमि रक्षा समिति की एक युवा कार्यकर्ता तापसी मलिक का जला हुआ शव मिला। बलात्कार के बाद उसकी हत्या कर दी गई थी। पुलिस ने मामले को दबाने की कोशिश की लेकिन इस घटना ने सिंगूर आंदोलन को देशव्यापी बना दिया। मीडिया में सिंगूर की कहानियां छाई हुई थीं। संसद में हंगामा हो रहा था। 28 दिसंबर को ममता बनर्जी ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और राष्ट्रपति अब्दुल कलाम के अनुरोध पर आमरण अनशन खत्म किया। 

 

लेफ्ट के पांव तले जमीन खिसक गई। उन्होंने मुआवजा बढ़ाने की भी कोशिश की लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। इसी आंदोलन में ममता का वोट बैंक ओबीसी और मुसलमानों में बढ़ा क्योंकि यही लोग किसान थे और इन्हीं की जमीनें जा रही थीं। आंदोलन सफल रहा और लेफ्ट की सरकार एक भी इंडस्ट्री नहीं ला सकी। टाटा अपना कारोबार समेटकर गुजरात के सानंद में चले गए। यहीं से नरेंद्र मोदी की भी पहचान बनी- तुरंत डिसीजन लेने वाले नेता के रूप में। सिंगूर मामले के बाद ही दोनों नेता उभरे।

 

इसके बाद नगरपालिका के चुनावों, पंचायत चुनावों में ममता बनर्जी को सफलता मिली। उन्होंने सेमीफाइनल जीत लिया था। 2011 में विधानसभा चुनाव यानी फाइनल होना था। इसके ठीक पहले ममता बनर्जी ने जंगल महल जैसी जगहों पर लोगों से मिलना जुलना शुरू कर दिया। इन जगहों पर गरीबी बहुत ज्यादा थी। साथ ही हिंसा भी। लेफ्ट अपने तीन दशकों में इन चीजों को सुधार नहीं पाया था।

 

फ्रस्ट्रेटेड होकर लेफ्ट के नेताओं ने ममता बनर्जी पर भद्दे कमेंट करने शुरु कर दिए। एक नेता अनिल बसु ने कहा- 'ममता को हमेशा सीने पर ही चोट क्यों लगती है?' इस तरह के बयानों ने जनता में उनके प्रति गुस्सा ही भरा। ममता बनर्जी ने लेफ्ट के पॉलिटिकल स्पेस को कैप्चर कर लिया। हिंदी, उर्दू, बंगाली, अंग्रेजी तमाम मिक्स भाषाओं का इस्तेमाल कर ममता अपनी बात बोलती हैं। तब तक सोशल मीडिया भी आ गया था और ममता बनर्जी ने हॉटमेल के फाउंडर सबीर भाटिया को हायर किया। बंगाल का भद्रलोक भी उनके समर्थन में आ गया जो कि उनकी स्ट्रीट फाइटिंग को पसंद नहीं करता था पर वह ऐसी स्ट्रीट फाइटर थीं जो रविंद्रो संगीत से लेकर रामकृष्ण मिशन तक सब कुछ अपने जीवन में शामिल करती थीं।

नतीजतन 2011 में उनको बहुत बड़ी जीत मिली। लेफ्ट जो दो सौ से ऊपर सीटें लाता था, दो अंकों में सिमट गया। उसकी जगह तृणमूल कांग्रेस आ गई। 294 में से 184 सीटों पर तृणमूल कांग्रेस के विधायक चुने गए।  20 मई 2011 को ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। यह अभूतपूर्व दृश्य था। एक ऐसी महिला जो किसी राजनीतिक खानदान से नहीं आती थी। जिसने सड़कों पर संघर्ष किया था। वह मुख्यमंत्री पद की शपथ ले रही थी। वह भी विपक्ष के ऐसे किले को ढहाकर जिसे अभेद्य माना जाता था। 

 

ऐसा नहीं है कि भारतीय राजनीति में लोवर मिडिल क्लास से निकलकर महिलाएं नहीं आईं। ममता की कहानी अलग है। वह किसी नेता की रिश्तेदार नहीं थीं। जैसा कि भारतीय राजनीति में आने वाली ज्यादातर महिला नेताओं का इतिहास रहा है। वह स्वतंत्र और सेल्फ मेड हैं। जयललिता और मायावती का भी उदाहरण है। जिन्होंने खुद अपने दम पर जनसमर्थन हासिल किया। सरकार चलाई। पार्टी चलाई। हालांकि, दोनों को अपने शुरुआती दिनों में प्रभावशाली पुरुष नेताओं का साथ मिला। मायावती को कांशीराम और जयललिता को एमजी रामचंद्रन का समर्थन था। ममता बनर्जी के साथ ऐसा कुछ भी नहीं था। उन्हें अपने ही सहयोगियों से लगातार चुनौती मिलती रही और यह केवल राजनीतिक ही नहीं थी। कितनी ही बार उन पर जानलेवा हमले हुए। कितनी ही बार गिरफ्तारी दी और उस लक्ष्य के लिए लड़ती रही जो कॉलेज के दिनों से ही उन्होंने तय कर रखा था- परिवर्तन।

जीत की हैट्रिक और ममता का जलवा

 

परिवर्तन हुआ और इस परिवर्तन की नायक थीं ममता बनर्जी। जिन्होंने 34 सालों से पश्चिम बंगाल की सत्ता पर काबिज लेफ्ट को उखाड़ फेंका था। 2011 के बाद 2016, 2021 में जीत दर्ज कर ममता बनर्जी ने हैट्रिक लगाई। पिछले 14 सालों से राज्य में उनकी सरकार है। राज्य की राजनीति में लेफ्ट और कांग्रेस नाम मात्र की पार्टी बनकर रह गई हैं और नई चुनौती है भारतीय जनता पार्टी की। जो उसी तरह से ममता बनर्जी सरकार से बंगाल को मुक्त कराने की लड़ाई लड़ने का दावा कर रही है जैसे कभी ममता बनर्जी, लेफ्ट से आजादी के नाम पर लड़ती थीं। उसकी वजह भी है। सरकार बनने के बाद से ही TMC नेताओं पर भ्रष्टाचार के आरोप लगने शुरू हो गए। पिछले 14 साल की सरकार में घोटालों की एक लंबी लिस्ट दिखाई देती है। सारदा चिट फंड घोटाला, पोंजी स्कीम घोटाला, नारदा स्टिंग, कोयला तस्करी, राशन वितरण घोटाला, SSC शिक्षक भर्ती घोटाला आदि और इसमें पार्टी के कई मंत्रियों और सांसदों के खिलाफ कार्रवाई हुई। छापे पड़े, गिरफ्तारी हुई। इन गिरफ्तारियों और कार्रवाइयों को ममता बनर्जी बदले की कार्रवाई बताती रहीं। केंद्रीय एजेंसियों के दुरुपयोग के आरोप लगाती रहीं। 

 

कई बार CBI-ED जैसी केंद्रीय एजेंसियों और बंगाल पुलिस के बीच टकराव भी हुआ। टकराव, राजभवन से भी खूब हुआ। फिर चाहे राज्यपाल केशरीनाथ त्रिपाठी रहे हों, जगदीप घनखड़ रहे हों या फिर सीवी आनंद बोस। ममता बनर्जी केंद्र में सत्तारूढ़ मोदी सरकार पर बंगाल से भेदभाव का आरोप लगाती हैं। उज्ज्वला, पीएम आवास और मनरेगा जैसी केंद्र की तमाम योजनाओं के लिए फंड रोकने का आरोप लगाती हैं और कहतीं हैं कि मोदी-शाह किसी भी तरह से बंगाल को अपने नियंत्रण में लेना चाहते हैं। वहीं, दूसरी तरफ राज्य की राजनीति में मुख्य विपक्ष की भूमिका निभा रही बीजेपी, ममता बनर्जी का चित्रण एक तानाशाह की तरह करती है।

 

2021 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने बंगाल में आक्रामक चुनाव अभियान चलाया। टीएमसी के दिग्गज नेता और ममता बनर्जी के बेहद खास रहे सुवेंदु अधिकारी बीजेपी में शामिल हो गए। नंदीग्राम विधानसभा सीट पर सुवेंदु ने ममता बनर्जी को चुनौती दी और उन्हें हरा भी दिया। हालांकि, अपनी नेता की हार के बावजूद टीएमसी ने 2021 में अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया और 213 सीटों पर जीत दर्ज की। बीजेपी के हिस्से 77 सीटें आईं। उधर लेफ्ट और कांग्रेस का खाता तक नहीं खुला। पश्चिम बंगाल का चुनाव बीजेपी के लिए प्रतिष्ठा का चुनाव था और उसने इस नतीजे के पीछे अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी और इसकी तैयारी भी काफी पहले से ही शुरू कर दी गई थी। लेफ्ट ने अपनी जमीन खो दी थी। सत्ता के साथ जो मशीनरी थी वह TMC के साथ हो ली थी। ऐसे में विपक्ष के खाली स्पेस को बीजेपी ने तेजी से भरना शुरू कर दिया था। 

 

श्यामा प्रसाद मुखर्जी की धरती को हिंदुत्व की राजनीति की नई प्रयोगशाला बनाया और वही परिवर्तन का नारा दिया जो ममता कभी लेफ्ट के खिलाफ देती थीं। जो आरोप कभी ममता बनर्जी, लेफ्ट पर लगाती थीं। वहीं अब उन पर लगने लगे। जिस तरह से वह CPM मिलिशिया पर गुंडागर्दी और दादागिरी के आरोप लगाती थीं। अब वही ममता बनर्जी पर लगने लगे। चुनाव चाहे पंचायत के हों या फिर विधानसभा या लोकसभा के। बंगाल में चुनावी हिंसा सुर्खियों में रहती है। उसी तरह से विपक्षी दलों के कार्यकर्ताओं की हत्या की खबरें आती हैं जैसे पहले आती थीं। बस अब कुर्सी पर बैठे नेताओं के चेहरे बदल गए हैं। जो ममता बनर्जी, बलात्कार के आरोपी सत्ताधारी पार्टी के नेता के खिलाफ प्रदर्शन करते हुए राइटर्स बिल्डिंग में घुस जाती थीं। उन्हीं ममता बनर्जी की पार्टी के नेताओं पर कॉलेज में रेप के आरोप लगे। आरजी कार मेडिकल कॉलेज रेप केस में महीनों तक सरकार के खिलाफ प्रदर्शन हुए। खुद महिलाओं की आजादी की वकालत करने वाली ममता बनर्जी के एक बेतुके बयान की भी खूब निंदा हुई जिसमें उन्होंने कहा, 'लड़कियों को रात में बाहर नहीं जाना चाहिए।' 

 

ममता बनर्जी की सरकार के खिलाफ, उन्हीं की स्टाइल में उन्हीं के सिपहसालारों के सहारे बीजेपी हमलावर है। 2011 से 2025 तक ममता बनर्जी के कई सारे सहयोगी छोड़कर जा चुके हैं। उनके ऑटोक्रेटिक रवैये का जिक्र होता है। हालांकि, इन सब से बेफिक्र ममता अपनी मां, माटी और मानुस की राजनीति को चला रही हैं।

 

एक बार ज्योति बसु ने कहा था- बंगाल में सिर्फ दो जातियां हैं- धनी और गरीब पर ममता और बीजेपी के बाद ना सिर्फ जातियां महसूस होने लगी हैं बल्कि धर्म भी। बंगाल की राजनीति में जेनेटिक बदलाव आ रहा है। इन तमाम हंगामों के बीच ममता की अनप्रेडिक्टेबल पर्सनैसिटी भारतीय जनता के लिए पहेली बनी रहेगी। हालांकि, पुरुष वर्चस्व से भरी राजनीति में एक साधारण महिला का कंट्रोल है, यह सोचकर ही लोग पैरानायड हो जाएंगे। यह कंट्रोल कैसे बना हुआ है, यह सोचने का विषय है।

 

ऐसा भी नहीं है कि ममता हमेशा गुस्से में रहती हैं। वह पेंटिंग भी करती हैं। पियानो भी बजाती हैं। कविताएं भी लिखती हैं। 2019 लोकसभा चुनावों के बाद उनका एक वीडियो वायरल हुआ जिसमें वह पियानो बजा रही थीं। उनके मूड को लेकर एक मजेदार वाकया भी है। यूपीए वन के दौरान महिलाओं के संसद में आरक्षण पर एक बिल पेश होना था। समाजवादी पार्टी के नेता काफी हंगामा काट रहे थे। एक नेता ने ममता को पैर लगाकर गिरा दिया। ममता बाद में उस नेता का कॉलर पकड़कर खींचते हुए बाहर छोड़ आईं। उनके साथ बैठी एक महिला सांसद ने बाद में उनसे पूछा, 'आप गुस्से को कंट्रोल क्यों नहीं करतीं?' 
ममता ने जवाब दिया, 'उसने मुझे गिराया। मैं तो उसे बाल पकड़कर खींचना चाहती थी लेकिन वह गंजा था।'