लॉर्ड्स का मैदान। क्रिकेट की दुनिया का वह ऐतिहासिक मंच, जहां टेस्ट मैच जीतने का सपना भारतीय क्रिकेट करीब 54 साल से देख रहा था। टीम इंडिया लॉर्ड्स में 10 बार प्रयास कर चुकी थी लेकिन इसके किले को फतह नहीं कर पाई थी। उन 10 टेस्ट में से 8 में भारत को हार का सामना करना पड़ा था। भारतीय टीम इंग्लैंड को उसके घर में टेस्ट सीरीज में हरा चुकी थी लेकिन क्रिकेट का मक्का कहे जाने वाले मैदान पर अभी भी जीत से महरूम थी और फिर एक दिन कपिल देव की कप्तानी वाली टीम पहुंची।

 

5 जून 1986 को जब कपिल देव ने टॉस जीता और इंग्लैंड को पहले बल्लेबाजी के लिए बुलाया, तब शायद ही किसी ने नहीं सोचा होगा कि अगले पांच दिनों में भारतीय क्रिकेट के इतिहास का एक बेहद खास पन्ना लिखा जाएगा। भारत ने इंग्लैंड को पांच विकेट से हराकर लॉर्ड्स का तिलिस्म तोड़ दिया। यह महज एक जीत नहीं थी। यह उस टीम की जीत थी, जो धीरे-धीरे विदेशी परिस्थितियों में खुद को साबित करना सीख रही थी।

 

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लॉर्ड्स में वेंगरसकर का दबदबा लेकिन जीत दूर की कौड़ी

भारतीय टीम ने इससे पहले 1971 में लॉर्ड्स टेस्ट में इंग्लैंड को कड़ी टक्कर दी थी और जीत के करीब दिख रही थी लेकिन आखिरी दिन आते-आते वह बारिश के चलते हारने से बची। तब भारत ने इस मैदान पर पहली बार टेस्ट मैच ड्रॉ कराया था। 1979 में दिलीप वेंगसरकर ने 103 और गुंडप्पा विश्वनाथ ने 113 रन बनाकर टीम इंडिया को हार से बचाया। 1982 में वेंगसरकर ने फिर 157 रन की शानदार पारी खेली लेकिन भारत सात विकेट से मैच हार गया। इसलिए 1986 में जब भारतीय टीम लॉर्ड्स पहुंची तो वेंगसरकर के लिए यह मैदान किसी पुराने परिचित की तरह था। उन्हें इस मैदान पर रन बनाना आता था लेकिन जीत अब भी दूर थी।

चेतन शर्मा का ने इंग्लैंड को किया ढेर

कपिल देव ने टॉस जीतकर गेंदबाजी चुनी। शुरुआत में भारतीय गेंदबाजों ने इंग्लैंड को परेशान किया लेकिन ग्राहम गूच दीवार बनकर खड़े हो गए। गूच ने 280 गेंद पर 114 रन की शानदार पारी खेली। उन्होंने भारतीय गेंदबाजों को लंबे समय तक इंतजार कराया। उनके साथ डेरेक प्रिंगल ने भी 63 रन बनाए। इंग्लैंड एक समय मजबूत स्थिति में दिखाई दे रहा था लेकिन भारत के पास चेतन शर्मा थे। चेतन ने एक के बाद एक महत्वपूर्ण विकेट निकाले। उन्होंने गूच, डेविड गॉवर, माइक गैटिंग, एलन लैम्ब और पॉल डाउटन को पवेलियन भेजा और 64 रन देकर 5 विकेट हासिल किए। इंग्लैंड की पहली पारी 294 रन पर सिमट गई।

 

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वेंगसरकर ने फिर लगाया शतक

भारत के लिए यह स्कोर चुनौतीपूर्ण जरूर था लेकिन डराने वाला नहीं। हालांकि शुरुआत आसान नहीं रही। सुनील गावस्कर 34 और कृष्णमाचारी श्रीकांत 20 रन बनाकर आउट हो गए। इसके बाद मोहिंदर अमरनाथ क्रीज पर आए। अमरनाथ ने 69 रन की धैर्यपूर्ण पारी खेली लेकिन दूसरी तरफ जिस बल्लेबाज पर लॉर्ड्स की नजरें टिकी थीं, वह थे वेंगसरकर। उन्होंने एक बार फिर शतक जड़ दिया। वेंगसरकर ने 213 गेंद पर नाबाद 126 रन बनाए, जिसमें 16 चौके शामिल थे। यह लॉर्ड्स पर उनका लगातार तीसरा टेस्ट शतक था। 

 

कल्पना कीजिए - एक भारतीय बल्लेबाज, इंग्लैंड के सबसे प्रतिष्ठित मैदान पर, लगातार तीसरे टेस्ट में शतक बना रहा था। यह सिर्फ आंकड़ा नहीं था। यह वेंगसरकर का लॉर्ड्स के साथ खास रिश्ता था और इस बार उस रिश्ते में जीत भी शामिल होने वाली थी।

 

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कपिल देव ने दूसरी पारी में बरपाया कहर

भारत ने पहली पारी में 341 रन बनाए और इंग्लैंड पर 47 रन की बढ़त हासिल की। मैच अब भारत की पकड़ में था लेकिन टेस्ट क्रिकेट में कुछ भी पहले से तय नहीं होता। इंग्लैंड को दूसरी पारी में बड़ा स्कोर बनाना था। मगर भारतीय गेंदबाजों ने उन्हें सांस लेने का ज्यादा मौका नहीं दिया। इंग्लैंड की पूरी टीम सिर्फ 180 रन पर आउट हो गई।

 

कपिल देव ने सामने से अगुवाई करते हुए 4 विकेट झटके। मनिंदर सिंह ने 3 विकेट अपनी झोली में डाले, जबकि चेतन शर्मा, रोजर बिन्नी और रवि शास्त्री के खाते में 1-1 विकेट रहे। भारतीय गेंदबाजों ने इंग्लैंड की बल्लेबाजी को इस कदर बांधकर रखा कि मेजबान टीम 200 का आंकड़ा भी पार नहीं कर सकी। भारत को जीत के लिए सिर्फ 134 रन का लक्ष्य मिला।

 

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कपिल देव ने उस जमाने में की टी20 के अंदाज में बैटिंग

लॉर्ड्स में पहली जीत अब नजरों के सामने थी लेकिन क्रिकेट की खूबसूरती यही है कि आसान दिखने वाला रास्ता भी कभी-कभी मुश्किल हो जाता है। भारत ने लक्ष्य का पीछा करते हुए 10 रन पर ही श्रीकांत का विकेट गंवा दिया। कुछ देर बाद गावस्कर भी चलते बने। 31 के कुल स्कोर पर टीम इंडिया के दोनों सलामी बल्लेबाज पवेलियन लौट चुके थे। मुकाबले के पांचवें दिन भारतीय टीम टारगेट चेज कर रही थी। ऐसे में किसी अनहोनी की आहट आने लगी।

 

वेंगसरकर और अमरनाथ ने चौथे विकेट के लिए 45 रन की साझेदारी कर स्थिति को संभाला। हालांकि दोनों ही 2 रन के अंतराल में आउट हो गए। अब भारत का स्कोर 78/4 हो गया था। जीत की दहलीज पार करने के लिए अभी भी 56 रन चाहिए थे। 

 

युवा मोहम्मद अजहरुद्दीन और रवि शास्त्री ने पांचवें विकेट के लिए 32 रन की साझेदारी कर टीम को 110 रन तक पहुंचाया। जीत की खुशबू आने लगी थी, तभी अजहरुद्दीन रन आउट हो गए। अब क्रीज पर आए कप्तान कपिल देव, जिन्होंने बाकी बचे 24 रन से में से 23 रन महज 10 गेंद में ठोक दिए। भारत ने धमाकेदार अंदाज में 5 विकेट से मुकाबला अपने नाम कर लिया।

लॉर्ड्स के करिश्मे के बाद सीरीज भी अपने नाम

कपिल देव ने उस दिन दुनिया को यह एहसास करा दिया था कि भारतीय टीम अब विदेशी जमीन पर सिर्फ मुकाबला करने नहीं, जीतने उतरती है। लॉर्ड्स की जीत कोई अकेला चमत्कार नहीं थी। भारत ने 1986 की तीन टेस्ट मैचों की सीरीज 2-0 से अपने नाम की। लॉर्ड्स में जीत के बाद टीम इंडिया ने दूसरा टेस्ट भी जीता, जबकि बर्मिंघम में तीसरा टेस्ट ड्रॉ रहा। पूरी सीरीज में वेंगसरकर का बल्ला सिर चढ़कर बोला। उन्होंने 90 की औसत से 360 रन बटोरे। चेतन शर्मा ने गेंद से कहर बरपाते हुए 16 विकेट अपने नाम किए।