उत्तर प्रदेश के ग्रेटर नोएडा की ज्यादातर सोसायटी में मिलने वाले फ्लैट्स की कीमत करोड़ों रुपये में है। मेगा सिटी की तर्ज पर बसाया गया यह शहर आज भी बदहाली की मार झेल रहा है। बारिश में इस शहर की सड़कों पर पानी भर जाता है तो अब बिना बारिश के ही एक युवा इंजीनियर 'सिस्टम की गलती' से भरे पानी में डूबकर अपनी जान गंवा बैठा। आलम ऐसा था कि पुलिस को पता था, प्रशासन को पता था, आपदा में मदद पहुंचाने के लिए बने SDRF और NDRF को भी पता था लेकिन सड़क से चंद फीट दूर भरे पानी में एक युवा डूब गया और सिस्टम अपनी ही चाल चलता रह गया। सिस्टम की इस कछुआ चाल का नतीजा यह है कि एक पिता ने अपना बेटा खो दिया है और वह न्याय की गुहार मांग रहा है। न्याय के नाम पर कुछ अफसरों के तबादले हो गए, कुछ को हटा दिया गया और लीपापोती शुरू हो गई। 

 

यह मामला गौतम बुद्ध नगर जिले के नोएडा सेक्टर 150 का है। अगल-बगल खड़ी करोड़ों की इमारतों के बीच एक ऐसी सड़क गुजरती है जो ठीक 90 डिग्री पर मुड़ जाती है। जहां सड़क मुड़ती है वहां अथाह पानी भरा हुआ है। सिस्टम के लिए यह 'मामूली समस्या' हो सकती है कि यह पानी इतना है कि किसी परिवार के सारे सपने तोड़ दे। इस बार इसी सिस्टम का शिकार बने हैं युवराज मेहता। 

युवराज के पिता ने खोली सिस्टम की पोल

 

इस घटना के बारे में युवराज के पिता राजुकमार मेहता कहते हैं, 'मेरे जीवन में ऐसा पहली बार हुआ जब मैं इतना लाचार था। मेरा बेटा मेरे सामने मर गया। मैं न्याय के लड़ूंगा और इसके लिए जिम्मेदार एक-एक आदमी को जेल पहुंचाऊंगा। उसने मुझे फोन किया और कहा- मेरा ऐक्सीडेंट हो गया है, मुझे बचा लो पाता है। मैंने पुलिस को फोन किया। मैं घटनास्थल पर पहुंचा तो मैं सुन कता था कि वह मदद के लिए चीख रहा था। मैं सो नहीं पा रहा हूं, मुझे उसकी आवाज सुनाई दे रही है।'

 

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इस घटना में यह साफ देखने को मिला है कि हर संस्था ने अपने-अपने तर्क या यूं कहें कि बहाने गिना दिए। पुलिस ने कह दिया कि उसके लोगों को तैरना नहीं आता, फायर ब्रिगेड ने कह दिया कि उसके पास नाव नहीं थी और NDRF और SDRF की टीम को तो आने में ही देरी लग गई। ऐसे में सवाल उठते हैं कि अगर करोड़ों खर्च करके कोई शख्स इन शहरों में रहने आया है तो क्या वह इन बहानों के सहारे ही जिएगा? क्या ऐसे हादसे होने पर नोएडा के लोगों को न्याय के नाम पर सिर्फ बहाने मिलेंगे?

 

बयान बदलने का दबाव

 

इस हादसे के बाद एक डिलीवरी बॉय काफी चर्चा में है। मोनिंदर नाम के इस शख्स का दावा है कि वह अपनी कमर में रस्सी बांधकर पानी के अंदर उतरा भी था लेकिन उसे भी कोई कामयाबी नहीं मिली। एक ही दिन में मोनिंदर का बयान भी बदल गया है। पहले मोनिंदर का कहना था कि जब वह आया तब पुलिस के लोग बाहर बैठे थे और पानी में उतरने को तैयार नहीं थे। दूसरे बयान में मोनिंदर ने कहा है कि पुलिस के लोग मौजूद थे और बहुत मशक्कत कर रहे थे। पहले बयान में मोनिंदर ने कहा कि वह सुबह 5:30 बजे घटनास्थल से गए तब तक युवराज को निकाला नहीं जा सका था। बाद में मोनिंदर का एक और वीडियो आया जिसमें वह कह रहे हैं कि पुलिस की टीम ने सही समय से रेस्क्यू कर लिया था। 

 

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इन दो वीडियो के बाद मोनिंदर ने कहा है कि उन पर दबाव बनाया जा रहा है। उनका कहना है, 'मुझे कहा गया कि पुलिस के पक्ष में रहो तुम्हारी मुलाकात ACP से कराई जाएगी। मेरा बयान रिकॉर्ड हो चुका है, मैं उन तीन पुलिसवालों को पहचान सकता हूं। मुझे धमकियां मिल रही हैं और मैं डरा हुआ हूं।'  


क्या बोले अधिकारी?

 

इस पूरे घटनाक्रम में पुलिस, फायर ब्रिगेड, SDRF और NDRF को मिलाकर लगभग 80 लोग मौजूद थे लेकिन कोई उस पानी में उतरना ही नहीं चाह रहा था। कई पुलिसकर्मियों ने खतरा जता दिया कि पानी ठंडा है और अंदर लोहे के सरिए भी हो सकते हैं। इसके बारे में पुलिस अधिकारी कहते हैं, 'जो पुलिसकर्मी वहां मौजूद थे, उनको तैरना आना अनिवार्य नहीं है। फायर ब्रिगेड के लोगों का काम आग बुझाने का है, उनके पास नाव होना अनिवार्य नहीं है। रेस्क्यू का काम NDRF और SDRF का है, उन्हें भी समय रहते सूचना दे दी गई थी।'

 

 

पुलिस अधिकारी आगे कहते हैं, 'आपने वीडियो देखे होंगे कि रेस्क्यू के लिए एक अधिकारी रस्सी की मदद ले रहा है। किसी भी सूरत में कोई रस्सी 25 मीटर से लंबी नहीं हो सकती। कार 30 मीटर से ज्यादा गहराई में चली गई थी। हाइड्रोलिक से उठाने की क्षमता भी 25 मीटर ही थी और ऑपरेशन प्रोटोकॉल के हिसाब से ही किया गया।'

 

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अडिशनल कमिश्नर (लॉ एंड ऑर्डर) राजीव नारायण मिश्रा कहते हैं, 'पुलिस और फायर ब्रिगेड की टीम ने क्रेन, सीढ़ी और सर्चलाइट का इस्तेमाल किया लेकिन विजिबिलिटी जीरो थी जिसके चलते रेस्क्यू ऑपरेशन में दिक्कत हुई।'

 

इस घटना के बारे में NDRF का कहना है, 'जहां यह घटना हुई वह गाजियाबाद में हमारे बेस से 40 किलोमीटर दूर है। शुक्रवार की रात कोहरा बहुत घना था इसके चलते हमें पहुंचने में समय लगा। हमारे टीम ने बहुत प्रयास भी किया। हमें सबसे पहले यह देखना था कि हम गड्ढे में कैसे उतर सकते हैं। अगर आप रेस्क्यू के विजुअल देखेंगे तो समझ आएगा कि 10 मीटर से आगे कुछ दिख ही नहीं रहा था।'

 

युवराज मेहता के पिता ने सवाल पूछे हैं, 'इमरजेंसी रेस्पॉन्स पहुंचने में इतना समय क्यों लगा? ऐसी खतरनाक जगह को खुला क्यों छोड़ा गया था? ऐसी घटनाओं के लिए पुलिस के पास एक्सपर्ट डाइवर क्यों नहीं हैं। अगर एक भी एक्सपर्ट मौके पर पहुंचा होता तो मेरे बेटे की जान बच जाती।'

 

क्या-क्या हुआ था?

 

17 जनवरी की रात युवराज घर लौट रहे थे और उनकी कार इसी 90 डिग्री वाले मोड़ पर बेकाबू हो गई और सड़क से उतरकर सीधे पानी में गिर गई। युवराज मेहता को जब समझ आया कि वह बुरी तरह फंस गए हैं, तब उन्होंने अपने पिता को फोन लगाया। उनके पिता ने 12 बजकर 6 मिनट पर पुलिस को सूचना दी, 9 मिनट में पुलिस मौके पर पहुंच भी गई। तकरीबन 45 मिनट बाद फायर ब्रिगेड की टीम आई। एक घंटे में SDRF की टीम आई और पौने दो घंटे में NDRF की टीम भी आई। ये सब मिलकर भी कुछ ऐसा नहीं कर सके जिससे युवराज की जान बचाई। सिस्टम के आगे तमाशा होता रहा और युवराज अपनी गाड़ी सहित इस दलदली पानी में धंसते चले गए। सुबह 4:30 बजे युवराज को निकाला गया और अस्पताल ले जाया गया लेकिन उनकी मौत हो चुकी थी।