उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में के घने जंगल, इन दिनों सुलग रहे हैं। शिवालिक पर्वतमाला से शुरू होकर हिमालयी पर्वत श्रृंखला तक के जंगलों में आग की लपटें नजर आ रही हैं। जंगल दिन-रात सुलग रहे हैं। वन और दमकल दोनों विभाग, जंगल की आग से जूझ रहे हैं। उत्तराखंड के जंगलों में लगने वाली आग, कई वन्य जीवों के लिए हर बार संकट बनकर आता है। शिवालिक हो या पर्वतीय शृंखलाएं, दोनों में दुर्लभ वन्य जीव रहते हैं, एक बड़ी आबादी इनके पास बसती है।
उत्तराखंड के पहाड़ी जंगल, लगातार सुलगते हैं, ऊंचाई इतनी है कि दमकल विभाग की पहुंच से बाहर होते हैं, वन विभाग के पास भी आग बुझाने के सीमित विकल्प हैं। खुद दमकल अधिकारी मानते हैं कि ऊंची पहाड़ियों पर जिन जंगलों में आग लगती है, हम उनकी सूचना वन विभाग को देते हैं लेकिन उन्हें बुझाने के संसाधन बेहद सीमित हैं।
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रिया खंडेलवाल, दमकल अधिकारी, रुद्र प्रयाग:-
'आबादी वाले इलाकों में आम तौर पर 18 से 20 मीटर दूरी तक हम आग बुझाने की कोशिश करते हैं। पहाड़ियों पर हमारी टीमें पहुंच जाती हैं लेकिन ऊपरी पहाड़ियों की जिम्मेदारी वन विभाग की है। हम वन विभाग को सूचित करते हैं, फिर वन विभाग इसे देखता है।'
लगातार सुलगते जगंल, दमकल-वन विभाग बेबस
खबरगांव ने हरिद्वार से लेकर रुद्र प्रयाग, कर्ण प्रयाग से लेकर भारत के पहले गांव 'माणा' तक पड़ताल की। जोशीमठ से कुछ ऊपर तक पहाड़ी जंगल सुलगते नजर आए। शुरुआत ऋषिकेष से होती है और चमोली तक के जंगलों में आग सुलगती नजर आ रही है। अप्रैल की शुरुआत से ऐसी घटनाएं बढ़ी हैं।
खबरगांव ने 26 अप्रैल को हरिद्वार से बद्रीनाथ धाम तक की यात्रा पूरी की। 20 से ज्यादा जगहों पर जंगल सुलगते नजर आए। जहां-जहां आग नजर आई, वहां दूर-दूर तक न तो दमकल विभाग के अधिकारी दिखे, न ही वन विभाग के। न ही स्थानीय लोगों की ऐसी कोशिश कि आग पर काबू पाया जा सके।
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'जंगल है, आग लगती ही रहती है, खुद बुझ जाती है'
देव प्रयाग में केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के पास की पहाड़ियां भी सुलगती नजर आईं। भागीरथी और अलकनंदा संगम के पास की पहाड़ियां सुलग रहीं थीं, जब वहां उतरकर स्थानीय लोगों ने खबरगांव ने बात की तो लोग इस आग से बेहरवाह नजर आए। देव प्रयाग में एक दुकानदार से पूछा कि क्या आग से आप लोगों को डर नहीं लगता तो जो जवाब मिला वह हैरान करने वाला रहा। उन्होंने कहा कि पहाड़ है, आग लगती रहती है, यहां कौन सा दमकल विभाग बुझाने पहुंचेगा।'
कौन से इलाके प्रभावित हैं?
खबरगांव ने सिर्फ हरिद्वार से बद्रीनाथ तक के इलाकों को कवर किया। इनमें 3 जिले और 5 प्रयाग से होकर बस गुजरी। हरिद्वार, पौड़ी गढ़वाल और चमोली। चमोली में ही बद्रीनाथ धाम है। देव प्रयाग, श्रीनगर, रुद्र प्रयाग, कर्ण प्रयाग, नंद प्रयाग और विष्णु प्रयाग जैसी पहाड़ियों पर भी जंगल की आग नजर आई।
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सरकार क्या कह रही है?
उत्तराखंड वन विभाग का कहना है कि 200 से ज्यादा जगहों पर आग लगी है। 130 हेक्टेयर से ज्यादा का जंगल जल गया है। चारधाम रूट पर जंगल की आग को साफ देखा जा सकता है। फरवरी से अब तक, रिजर्व फॉरेस्ट में करीब 126 आग लगने की घटनाएं सामने आईं हैं।
क्या कह रहा है वन विभाग?
रिया खंडेलवाल, दमकल अधिकारी, रुद्र प्रयाग:-
वन विभाग ने चार धाम मार्ग पर संवेदनशील जगहों पर विशेष टीमें तैनात कर दी हैं। क्विक रिस्पॉन्स टीमें भी तैयार रखी गई हैं, जिससे आग पर तुरंत काबू पाया जा सके। लाखों श्रद्धालु चार धाम यात्रा पर आने वाले हैं, इसलिए वन विभाग, पुलिस और फायर सर्विस हाई अलर्ट पर हैं।
कितना नुकसान हुआ?
15 फरवरी से 27 अप्रैल तक कुल 226 घटनाओं में 144.22 हेक्टेयर जंगल प्रभावित हुआ है। हरिद्वार से लेकर चमोली तक के जंगलों में आग लगी है। स्थानीय लोगों और व्यापारियों का कहना है कि जंगल की आग उन्हें डराती है लेकिन कोई बड़ा हादसा हुआ नहीं है। नागरिक इलाकों में उठता धुआं, आम लोगों को डराता है।
कैसे राहत मिल सकती है?
मौसम विभाग ने अनुमान जताया है कि 2 मई से लेकर 5 मई तक तक, उत्तराखंड में बारिश हो सकती है। तेज हवाएं चल सकती हैं, गरज-तड़क के साथ हल्की से मध्यम श्रेणी की बारिश हो सकती है। अगर उत्तराखंड में बारिश हुई तो वन और दमकल दोनों विभागों को राहत मिल सकती है।
