समुद्र दल से करीब 10,500 फीट की ऊंचाई पर उत्तराखंड में एक गांव बसा है। यह गांव, माणा है। भारत का पहला गांव। किसी जमाने में इसे भारत का आखिरी गांव कहा जाता था। माणा के बाद, दूर-दूर तक, कोई आबादी नहीं है। यह गांव, माणा दर्रे से पहले का आखिरी गांव है। भारत और तिब्बत की भौगोलिक सीमा, यहां से करीब 26 किलोमीटर दूर है। माणा गांव, चर्चा में इसलिए भी है क्योंकि इन दिनों लोग, चारधाम यात्रा के तहत बद्रीनाथ धाम में बड़ी संख्या में पहुंच रहे हैं। बद्रीनाथ धाम से सिर्फ 3 किलोमीटर की दूरी पर बसे इस आखिरी गांव में भी लोग उमड़ रहे हैं।
माणा गां-व ही सरस्वती नदी का उद्गम स्थल कहा जाता है, यहां से ही सरस्वती, अलकनंदा में मिलती हैं। माणा गांव में कई होम स्टे हैं, जहां लोग ठहरते हैं, रुकते हैं। कुछ लोग, बद्रीनाथ में पिट्ठू का काम करते हैं। यह गांव, आम नागरिकों के लिए मार्च से मई से अक्तूबर या नवंबर तक खुला रहता है। पर्यटकों के आने से यहां अच्छी कमाई भी हो जाती है लेकिन भोटिया समुदाय के कई लोग, अब यहां से रोजी-रोटी की तलाश में पलायन कर चुके हैं क्योंकि कमाई आदमी को 12 महीने चाहिए, कुछ महीनों से सालभर बैठकर नहीं खाया जा सकता।
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माणा गांव से समझिए पलायन का दर्द
माणा गांव में दाखिल होते ही कुछ सीढ़िया हैं। सीढ़ियों के दाएं और बाएं दोनों कोनों पर कुछ दुकानें हैं। ज्यादातर दुकानें, माणा गांव के भोटिया समुदाय की ही हैं। कुछ आबादी, सीजन में यहां रहती है, बड़ी आबादी पलायन कर चुकी है, कुछ घरों पर ताले हैं या जो लोग हैं, कोई कोल्ड ड्रिंक बेच रहा है, कोई हाथ से बुने स्वेटर। कहीं-कहीं इक्का-दुक्का मैगी की दुकानें दिखती हैं। किसी जमाने में यह समुदाय, दुर्गम रास्तों का अहम व्यापारी वर्ग था।
साल 1962 के जंग से पहले तिब्बत और चीन के साथ, इसी रास्ते व्यापार होता था। माणा गांव से तिब्बत तक, व्यापार, माणा पास के होता था। इसे ही 'डुंगरी ला' के नाम से लोग जानते हैं। यह दर्रा, करीब 18,192 फीट की ऊंचाई पर है। तब आज की तरह, हाइवे बनाने की कोशिश, सरकार नहीं कर रही थी। कभी याक, कभी खच्चर के जरिए नमक, अनाज, स्वेटर, टोपियों और भारतीय शिल्प कला से जुड़ी चीजें तिब्बत और चीन तक पहुंचती थीं।
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यह राह, मणा गांव से शुरू होती, सरस्वती नदी के किनारे-किनारे देवताल से माणा पास तक जाती थी। जब लोग, माना दर्रा पास करते तो 'दाबा' और 'थोलिंग' जैसे व्यापारिक केंद्रों में सामान खरीदते और बेचते थे। यहां से ही लोग कैलाश-मानसरोवर तक की भी यात्रा करते थे। अब, हालात अलग हैं और व्यापार, इस मार्ग से बंद हो चुका है। साल 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद इस अंतरराष्ट्रीय सीमा को बंद कर दिया गया। बंद का असर यह हुआ कि माणा गांव, व्यापार का केंद्र नहीं रहा। अब इस मार्ग पर केवल भारतीय सेना और आईटीबीपी (ITBP) की चौकियां हैं, जिनका काम, भारत की सीमाओं की हिफाजत करना है।
उत्तराखंड के लिए अभिशाप बन गया है पलायन
उत्तराखंड में यह एक गांव की स्थिति नहीं है। ऊंची पहाड़ियों बसे ज्यादातर गांवों में ताले लगे होते हैं। लोग बस त्योहारों या किसी धार्मिक-सामुदायिक आयोजनों में उमड़ते हैं। बर्फबारी के दिनों में रहे सहे लोग भी निचले इलाकों में उतर आते हैं। कुछ आबादी यहां रहती है, कुछ आबादी देहरादून, ऋषिकेश, हरिद्वार या दिल्ली जैसे मैदानी इलाकों की ओर बसती चली गई। उत्तराखंड के कई गांव, अब धीरे-धीरे वीरान हो रहे हैं।
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उत्तराखंड में पलायन की तस्वीर क्या है? आंकड़ों से समझिए
ग्राम्य विकास एवं पलायन निवारण आयोग, उत्तराखंड, पौड़ी ने साल 2023 में एक पलायन पर अंतिरम रिपोर्ट प्रकाशित की थी। साल 2018 से 2022 के बीच उत्तराखंड के ग्रामीण क्षेत्रों में पलायन की स्थिति बताती है कि पहाड़ी क्षेत्रों में कृषि की चुनौतियां, रोजगार की कमी की वजह से आबादी, शहरों की ओर भाग रही है। एक वजह, लगातार गहराते प्राकृतिक आपदा के संकट का भी है। धाराली हादसे का दर्द, वहांं के रहने वाले लोग, आज भी नहीं भूल पाए हैं। उनका कहना है कि वे जिंदा, सिर्फ प्रकृति की कृपा पर हैं।
उत्तराखंड सरकार स्वरोजगार और 'रिवर्स माइग्रेशन' पर जोर दे रही है। दिल्ली के सिनेमा हॉल हों या मेट्रो स्टेशन, उत्तराखंड पर्यटन की तस्वीरों से पटे पड़े हैं, सरकार सड़क संपर्क तिब्बत सीमा तक बेहतर कर रही है, हर मौसम में पहुंच वाली सड़कें बनाईं जा रहीं हैं लेकिन सिर्फ यही नहीं काफी हैं।
किन जिलों में पलायन की स्थिति डराती है?
पौड़ी गढ़वाल, अल्मोड़ा, टिहरी गढ़वाल और पिथौरागढ़ में सबसे ज्यादा पलायन हुआ है। साल 2018 से 2022 तक जुटाए गए आंकड़े बताते हैं कि अभी तक सिर्फ अल्मोड़ा में 5,926 लोगों ने स्थाई और 54,519 लोगों ने अस्थाई पलायन किया है। टिहरी गढ़वाल, सबसे अधिक प्रभावित जगहों में से एक है। यहां 5,653 स्थाई और 41,359 अस्थाई प्रवासी दर्ज किए गए हैं। पौड़ी गढ़वाल जिले में 5,474 लोगों ने स्थाई और 29,093 लोगों ने अस्थाई रूप से गांव छोड़े हैं।
उत्तराखंड के निर्जन गांव, जिनके लिए परेशान सरकार
साल 2018 के बाद राज्य के 24 ग्राम पूरी तरह से आबादी रहित हो गए हैं। करीब 9 गांव टिहरी गढ़वाल जिले में हैं। साल 2011 से 2018 के बीच में 734 गांव ऐसे थे, जो निर्जन हो गए। पलायन की सबसे ज्यादा मार, पौड़ी गढ़वाल पर पड़ी। यहां के करीब 186 गांव निर्जन हैं।
ग्राम्य विकास एवं पलायन निवारण आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक आजीविका और रोजगार की कमी की वजह से 50.16 फीसदी आबादी यहां से पलायन कर चुकी है।
शिक्षा सुविधाओं के अभाव में करीब 15.21 फीसदी आबादी, उत्तराखंड से बाहर निकल चुकी है। स्वास्थ्य सेवाओं की कमी से करीब 8.83 फीसदी लोग, पलायन करते हैं। जंगली जानवरों का आतंक से 5.61 प्रतिशत और कृषि भूमि की कम पैदावार की वजह से करीब 5.44 फीसदी लोग पलायन करते हैं।
पलायन कर कहां जा रहे हैं लोग?
पलायन करने वाले लोगों में करीब 35 फीसदी लोग, अपने जिले के पास के छोटे शहरों में बस रहे हैं, जहां रोजगार के विकल्प हैं। देहरादून, हरिद्वार और हल्दावनी जैसै मैदानी जिलों में करीब 24 फीसदी लोग बस रहे हैं। 22 फीसदी लोग राज्य से बाहर जा रहे हैं, वहीं करीब 1 फीसदी लोग विदेश जाते हैं।
सरकार पलायन रोकने के लिए क्या कर रही है?
उत्तराखंड सरकार ने पलायन रोकने के लिए 'ग्राम्य विकास एवं पलायन निवारण आयोग' का गठन किया है। सरकार पलायन रोकने के लिए 'मुख्यमंत्री पलायन रोकथाम योजना' (MPRY) चलाती है। यह योजना पलायन प्रभावित गांवों के लिए बनाई गई है। मुख्यमंत्री स्वरोजगार योजना (MSY) के जरिए सरकार स्थानीय स्तर पर व्यवसाय शुरू करने के लिए ऋण और छूट देती है। सरकार, होमस्टे योजना को प्रोत्साहित करती है। यहां पर्यटन के माध्यम से गांवों में रोजगार सृजित करने के अवसर मुहैया कराए जाते हैं।
क्या ये उपाय काफी हैं?
जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर ने एक बार बिहार के विकास के बारे में बोलते हुए कहा था, 'बड़ी फैक्ट्री से कुछ नहीं होगा। मैं इसे नहीं मानता हूं। फैक्ट्री से विकास संभव नहीं है। कोई देश इससे आगे नहीं बढ़ा है। दुनिया के धनी देश बड़ी फैक्ट्रियों की वजह से आगे नहीं बढ़े हैं, हर घर में काम करने की सुविधा हो, अमेरिका की अर्थव्यवस्था में 65 फीसदी हिस्सा यहीं से आता है। सर्विस सेक्टर को सुधारना होगा।' उत्तराखंड से पलायन रोकने का एक तरीका सर्विस सेक्टर को सुधारना हो सकता है।
राहुल पांडेय, उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले आते हैं। पर्यटन सेक्टर से जुड़े हैं। उन्होंने खबरगांव से बातचीत में कहा, 'उत्तराखंड की मुख्य कमाई पर्यटन है। मैदानी इलाकों में कुछ उद्योग हैं जो अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं लेकिन पहाड़ी इलाकों में उद्योग लगाना प्रकृति के साथ खिलवाड़ है। यहां स्थानीय संसाधनों पर आधारित रोजगार देना सरकार का लक्ष्य होना चाहिए।'
राहुल पांडेय बताते हैं कि यहां पहाड़ों में होम स्टे, जैसे डेस्टिनेशन वेडिंग होती है, वैसे ही डेस्टिनेशन वर्क का चलन बढ़ा है। उसे सरकार को भुनाना चाहिए। बेहतर कनेक्टिविटी, रोड और नेटवर्क, इस काम में मदद कर सकता है। यहां औषधियां बेहतर हैं, कीवी और सेब की खेती हो सकती है। सर्विस सेक्टर में अपने उत्तराखंड नंबर वन हो सकता है, बस इसके लिए प्राइवेट और सरकारी प्लेयर रुचि दिखाएं।
कैसे चलता है उत्तराखंड का कामकाज?
उत्तराखंड का सकल घरेलू उत्पाद (GSDP) वित्त वर्ष 2026 में 4.29 लाख करोड़ रुपये पहुंचने का अनुमान है, जबकि वित्त वर्ष 2019 से 2026 के बीच 8.86 प्रतिशत की कंपाउंड एनुअल ग्रोथ रेट (CAGR) दर्ज की गई है। इंडिया ब्रांड इक्विटी फाउंडेशन की रिपोर्ट बताती है कि अक्टूबर 2019 से जून 2025 तक 28,965 करोड़ रुपये का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) आया है।
कैसे कमाई बढ़ाएगा उत्तराखंड?
पर्यटन क्षेत्र में राज्य सरकार ने 2030 तक पर्यटकों की संख्या दोगुनी कर 7 करोड़ करने का लक्ष्य रखा है। होटल टैरिफ पर GST 12 फीसदी से घटाकर 5 फीसदी किया गया है। 24 अक्टूबर 2025 को 18,520 करोड़ रुपये का शारदा कॉरिडोर प्रोजेक्ट शुरू किया गया। इसके अलावा सोनप्रयाग-गौरीकुंड-केदारनाथ रोपवे, मसूरी-यमुनोत्री रोपवे और गोविंदघाट-हेमकुंड साहिब रोपवे जैसे बड़े प्रोजेक्ट्स चल रहे हैं।
पलायन रोकने की कोशिशें क्या हैं?
उत्तराखंड सरकार 5 हजार से ज्यादा होम स्टे पर जोर दे रही है। स्थानीय आजीविका को बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है। कृषि, हॉर्टिकल्चर और लघु और मध्यम उद्योगों (MSME) पर जोर दिया जा रहा है। उत्तराखंड औषधीय पौधों, फ्लोरिकल्चर और हॉर्टिकल्चर के लिए आदर्श है। बजट में हॉर्टिकल्चर के लिए 688 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं, 50,000 पॉलीहाउस बनाने और 6 एरोमा वैली विकसित करने की योजना है।
पहाड़ी उत्पादों पर GST घटाकर 5 फीसदी किया गया है। MSME क्षेत्र को 2030 तक 8.5 लाख रोजगार देने का लक्ष्य है। आईटी, फार्मास्यूटिकल्स, फूड प्रोसेसिंग और हाइड्रोपावर में निवेश बढ़ रहा है। सरकार ऋषिकेश-देहरादून में 547.8 करोड़ रुपये का बिजली इंफ्रा प्रोजेक्ट भी शुरू कर रही है। सवाल यह है कि क्या ये उपाय, राज्य में पलायन रोकने में काफी होंगे या और राज्य को और बड़े नजरिए की जरूरत है।
