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मसाले, पनीर, दारू और दवा, नकली चीजों से घिरे हैं आप, हैरान कर देंगी ये खबरें

बीते दिनों देश भर के कई शहरों में ऐसे-ऐसे नकली प्रोडक्ट पकड़े गए हैं जो हूबहू असली की तरह दिखते हैं। ये नकली प्रोडक्ट ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों तरह से बेचे जा रहे हैं।

fake products being sold in india

धड़ल्ले से बिक रहे हैं नकली उत्पाद, Photo Credit: Khabargaon

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आमतौर पर आप किसी ब्रांड के नाम से कोई चीज खरीदते हैं तो यह सोचकर खरीदते हैं कि वह चीज असली होगी और फायदेमंद होगी। पैकेट, रैपर या डिब्बे पर ब्रांड का नाम छपा होने या प्रतिष्ठित दुकान से सामान खरीदने से ग्राहकों को भरोसा रहता है कि चीज असली है। इस भरोसे को तोड़ने वाली कई घटनाएं पिछले कुछ ही समय में हुई हैं। कहीं फर्जी टूथपेस्ट की फैक्ट्री पकड़ी गई है तो कहीं कोई नकली इंजेक्शन बनाकर बेच रहा है। नकली मसाले, फर्जी दवाएं, केमिकल से बना पनीर, हानिकारक चीजों से बनी खाने-पीने की चीजें हैरान करने वाली हैं और लोगों के भरोसे को भी तोड़ रही हैं।

 

हैरानी की बात है कि इस तरह के उत्पाद बनाने वाले लोग बहुत कम संख्या में पकड़े जा रहे हैं। कई मामलों में यह भी देखा गया है कि ऐसे नकली प्रोडक्ट बनाने वाले लोग लंबे समय से काम करते आ रहे हैं और जब तक उन्हें पकड़ा गया तब तक वे लाखों-करोड़ों रुपये के सामान बेच रहे थे। इन नकली चीजों में हर दिन इस्तेमाल होने वाली खाने-पीने की चीजें, दवाएं, कॉस्मेटिक्स और अन्य ऐसे उत्पाद शामिल हैं जो इंसानों के शरीर को गंभीर नुकसान पहुंचा सकते हैं।

क्या कहती है स्टडी?

नकली उत्पादों को लेकर ऑथेंटिकेशन सॉल्युशन प्रोवाइडर्स असोसिएशन और CRISIL इंटेलिजेंस की एक रिपोर्ट 'स्टेट ऑफ काउंटफीटिंग इन इंडिया 2025' की एक रिपोर्ट कई अहम खुलासे करती है। यह रिपोर्ट बताती है कि ये नकली उत्पाद सिर्फ दुकानों तक ही सीमित नहीं हैं। ऑनलाइन मार्केट प्लेस और ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म पर भी इस तरह की चीजें धड़ल्ले से बिक रही हैं। यह रिपोर्ट बताती है कि पिछले साल यानी साल 2025 में भारत के लगभग 35 प्रतिशत ग्राहोकों ने नकली सामान खरीदे। शहरी क्षेत्रों में लगभग 89 प्रतिशत लोगों ने यह माना कि उन्होंने अपने जीवन में कम से कम एक बार कोई न कोई नकली सामान जरूर खरीदा।

 

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पूरे देश में की गई इस स्टडी में दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चेन्नई, बेंगलुरु, हैदराबाद, अहमदाबाद, जयपुर और इंदौर के 1639 लोगों से बात की गई। इसमें से 31 पर्सेंट लोगों ने माना कि उन्होंने ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों ही माध्यम से जो कपड़े खरीदे वे किसी न किसी ब्रांड की नकली कॉपी थे। इसी तरह 27 पर्सेंट लोगों ने माना कि उन्होंने फास्ट मूविंग कंज्यूमिर गुड्स यानी घरेलू इस्तेमाल की चीजें जैसे कि खाने-पीने की चीजें, निजी इस्तेमाल की चीजें और घर के सामान खरीदे और वे नकली निकले। 

 

यह स्टडी बताती है कि नकली सामान बेचने वालों में 53 प्रतिशत हिस्सेदारी ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स की है और इनके जरिए फर्जीवाड़े का काम और आसान हो गया है।

 

report over fake products 

असली नहीं, नकली चीजें खा रहे आप

देश की राजधानी दिल्ली में 21 अप्रैल को एक फैक्ट्री पकड़ी गई जो ENO के नकली पैकेट और Nescafe की नकली कॉफी बनाकर पैक कर रही थी। पुलिस ने नकली कच्चा माल और फर्जी पैकेट भी बरामद किए हैं। भारी मात्रा में तैयार प्रोडक्ट भी पकड़े गए हैं। 

 

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कुछ दिन पहले दिल्ली के ही कंझावला में एक फैक्ट्री पकड़ी गई जिसमें सेंसोडाइन का फर्जी टूथपेस्ट तैयार किया जा रहा था। इसमें खराब क्वालिटी के पेस्ट को सेंसोडाइन के पैकेट में पैक किया जा रहा था। पुलिस ने 10 हजार से ज्यादा खाली ट्यूब, 1800 से ज्यादा तैयार ट्यूब और 130 किलोग्राम पेस्ट बरामद किया था। इससे पहले मार्च के महीने में भी दिल्ली के समयपुर बादली में एक फैक्ट्री पकड़ी गई थी जो फर्जी सेंसोडाइन पेस्ट बना रही थी। इसी तरह पिछले साल अक्तूबर के महीने में दिल्ली के जगतपुर में नकली टूथपेस्ट और ENO बनाने वाली फैक्ट्री पकड़ी गई थी।

22 अप्रैल 2026 को उत्तर प्रदेश के अयोध्या में फॉर्चून कंपनी के नाम पर बेचे जा रहे फर्जी रिफाइंड ऑयल बरामद किए गए। रिपोर्ट के मुताबिक, नकली तेल को फॉर्चून की ब्रांडिंग के साथ बेचा जा रहा था। पुलिस ने 500 से ज्यादा कार्टन तेल बरामद किया है।

 

मसालों में भी खूब हो रही मिलावट

 

आमतौर पर घरों में इस्तेमाल वाले वाले पिसे मसाले बाजार से ही खरीदे जाते हैं। कई बार लोग कुछ मशहूर ब्रांड के मसाले खरीदते हैं तो कुछ बाजारों में कई अंजान नाम के मसाले बिकते हैं। इसी का फायदा मिलावटखोर लोग उठाते हैं। कई बार मसालों में सस्ते केमिकल, घोड़े और गधे की लीद और गोबर तक मिला देने के मामले सामने आ चुके हैं। ऐसे मसाले खाने का स्वाद तो फीका करते ही हैं, लंबे समय तक इन्हें खाने से आपकी सेहत पर भी बुरा असर हो सकता है।

 

मिर्च पाउडर के नाम पर केमिकल युक्त लाल रंग का पाउडर, हल्दी के नाम पर सस्ता पीला पाउडर और काली मिर्च के नाम पर पपीते के बीज जैसी चीजें बेचने के मामले सामने आते रहे हैं। त्योहारों के समय इन मसालों की खपत जब बढ़ती है तब ऐसे नकली सामान बाजार में खूब उतरते हैं। ऐसा काम करने वाले लोग त्योहारों की आपाधापी में अपना सामान खपा देते हैं और लाखों-करोड़ों रुपये कमा लेते हैं।

 

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कुछ साल पहले उत्तर प्रदेश के हाथरस में एक बड़ी फैक्ट्री पकड़ी गई थी जहां गधे की लीद और एसिड से मसाले बनाए जाए थे। इतना ही नहीं, इस नकली मसाले को ब्रांडेड कंपनियों के रैपर और पैकेट में भरकर बेच दिया जाता था।

 

इस साल फरवरी के महीने में मध्य प्रदेश के ग्वालियर में एक गिरोह पकड़ा गया जो गुजरात की एक कंपनी के नाम पर फर्जी जीरा बना रहा था। यह गिरोह सौंफ पर सीमेंट जैसा एक केमिकल लगाकर उसे जीरा बना दे रहा था और दूसरे ब्रांड के नाम पर बेच रहा था। तब ग्वालियर पुलिस ने इस नकली जीरे की 46 बोरियां बरामद की थीं। इसके अलावा, झाड़ू के कटे टुकड़ों, जंगली घास और कई अन्य चीजों से भी नकली जीरा बनाने और लंबे समय तक बेचने के मामले सामने आए हैं। 

डेयरी प्रोडक्ट से सबसे ज्यादा नुकसान

 

सबसे ज्यादा नकली चीजें डेयरी उत्पादों में पाई जा रही हैं। नकली घी, नकली खोया, सिंथेटिक पनीर और मिलावटी मिठाइयों का पकड़ा जाना तो आम हो गया है। हाल ही में राजस्थान के धौलपुर में 1270 किलोग्राम बदबूदार खोया पकड़ा गया। रिपोर्ट के मुताबिक, इसे उत्तर प्रदेश में होने वाली शादियों में खपाने के लिए भेजा जा रहा था लेकिन रास्ते में ही पकड़ लिया गया।

 

सबसे ज्यादा फर्जीवाड़ा पनीर को लेकर हो रहा है। हर दूसरे दिन नकली पनीर पकड़ी जाती है। हाल ही में मेरठ में 28 क्विंटल नकली पनीर पकड़ा गया था। मार्च के महीने में गुजरात के सूरत में 1400 किलो नकली पनीर पकड़ा गया था जिसे पाम ऑयल और अन्य केमिकल से बनाया जा रहा था।

 

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यह नकली पनीर इतना खतरनाक है कि यह इंसानों की किडनी और लिवर तक को नुकसान पहुंचा सकता है। इसकी वजह है कि सिंथेटिक पनीर बनाने के लिए सस्ते एसिड का इस्तेमाल किया जाता है। यही एसिड टॉयलेट क्लीनर और फर्श साफ करने वाले केमिकल में बनाने में भी इस्तेमाल किया जाता है। इसके अलावा, मैदा, वनस्पति तेल और अन्य केमिकल भी धड़ल्ले से मिलाए जाते हैं जो बेहद नुकसानदायक होते हैं।

 

नकली दवाएं जान का खतरा

हाल ही में गुरुग्राम में फर्जी मौनजारो इंजेक्शन बनाने वाले एक गिरोह का भंडाफोड़ हुआ। यह गिरोह ना सिर्फ मौनजारो इंजेक्शन बना रहा था बल्कि इंडियामार्ट जैसी प्रतिष्ठित वेबसाइट पर उसे धड़ल्ले से बेच भी रहा था। अब पुलिस और अन्य विभाग यह पता लगाने में जुटे हैं कि इस गिरोह ने नकली इंजेक्शन कहां तक पहुंचा दिए हैं। यह जानना जरूरी है कि इस तरह के इंजेक्शन लगाने वालों को सेहत पर बुरा असर पड़ सकता है और वे बीमार भी पड़ सकते हैं।

 

इस केस में यह भी पाया गया कि मौनजारो इंजेक्शन बनाने के लिए यह गिरोह चीन से कोई कच्ची दवा मंगाता था और उसमें पानी मिलाकर बनाए गए लिक्विड को इंजेक्शन बताकर बेच देता था। 3 से 10 हजार रुपये तक मिलने वाला यह इंजेक्शन डायबिटीज के मरीजों या फिर वजन कम करने वाले लोग खरीदते हैं। अब अगर आप इस इंजेक्शन की जगह पानी वाला नकली इंजेक्शन लगाएंगे तो शायद ही कोई फायदा होगा। यह जरूर हो सकता है कि नकली इंजेक्शन आपके शरीर पर बुरा असर डाले।

 

ऐसा ही एक मामला उत्तराखंड के ऊधम सिंह नगर से सामने आया है। नगर पंचायत क्षेत्र में स्थानीय प्रशासन की टीम ने छापेमारी की तो उसे फर्जी दवाएं मिलीं। ये दवाएं हिरण से सींग और अन्य चीजों से बनाई जा रही थीं और उन्हें आयुर्वेदिक और अंग्रेजी दवाओं के नाम पर बेचा जा रहा था। ये दवाएं असम, बंगाल, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश समेत कई अन्य राज्यों के साथ-साथ विदेश में भी बेची जा रही थीं।

 

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इसी तरह बिहार के गया में फर्जी जिंक, पैरासिटामॉल, एजिंथ्रोमाइसिन टेबलेट बनाने वाली, गाजियाबाद के लोनी में फर्जी स्किन केयर क्रीम बनाने वाली और गाजियाबाद में पेन रिलीफ क्रीम बनाने वाली कंपनियों का भंडाफोड़ हो चुका है। ऐसे भी कई मामले आ चुके हैं जिनमें देखा गया है कि फर्जी दवाएं बनाने वाले आरोपी गिरफ्तार हुए और जेल से बाहर आए तो फिर से वही काम करने लगे।

 

इन चीजों के अलावा नकली शराब, नकली ब्रैंडेड कपड़े और नाम ब्रैंड से मिलते-जुलते नाम वाले ब्रैंड और कई अन्य उत्पाद पूरे मार्केट सिस्टम में घुसे हुए हैं। कई जगहों पर तो पकड़े गए बिना तमाम ऐसे उत्पाद लंबे समय से बिकते रहते हैं और ना तो खरीदने वालों को इसका पता चलता है और ना ही उन्हें बेच रहे दुकानदारों को पता चलता है कि असल में वे असली के बजाय नकली माल खरीद और बेच रहे हैं।

क्यों इतना आसान है फर्जीवाड़ा?

मीडिया रिपोर्ट्स में कई विशेषज्ञ बताते हैं कि इस तरह के काम छोटे स्तर पर नहीं होते हैं। एक पूरा सिस्टम इसके पीछे काम करता है और हर स्तर पर सिस्टम के लूपहोल का इस्तेमाल किया जाता है। इसमें फर्जी पैकेजिंग मैटेरियल, नकली प्रोडक्ट और नकली लेबलिंग से लेकर तमाम विभागों के अधिकारियों से मिलीभगत और फर्जी बिल बनाने तक के काम शामिल हैं।

 

फर्जी GST बिल तक बन जाने से कई बड़े दुकानदार भी इन गिरोहों के चक्कर में फंस जाते हैं। इससे खरीदारों को तो नकली प्रोडक्ट मिलते ही हैं, सरकार को मिलने वाले GST में भी कमी आती है। साथ ही, कई असली ब्रांड के प्रोडक्ट रखे रह जाते हैं और उनके नाम पर नकली सामान बिकता रहा है। अलग-अलग स्तर पर हर चीज की नकल करने का असर यह है कि अब यह एक समानांतर इंडस्ट्री की तरह हो गया है।

लोगों की जागरूकता में कमी

आमतौर पर लोग पैकेट पर लिखे ब्रांड के नाम, उसके लोगो और ब्रैंडिंग से जुड़ी अन्य चीजों को देखकर यह मान लेते हैं कि प्रोडक्ट असली होगा। इसी का फायदा इस तरह के गिरोह उठा रहे हैं और वे नकली उत्पाद को असली पैकेजिंग की नकल के साथ बेच रहे हैं। इसमें फौरी तौर पर ना तो किसी दुकानदार को शक होता है और ना ही ग्राहक को। कई छोटे दुकानदार बिना ऐसे लोगों से सामान खरीदते हैं जो बाइक या अन्य गाड़ी से उनके घर तक सामान पहुंचाते हैं। कई इलाकों में इन सामानों का कोई पक्का बिल तक नहीं मिलता और दुकानदार बिल मांगते भी नहीं हैं। यहीं से फर्जीवाड़ा शुरू होता है और ऐसे नकली उत्पाद आसानी से खपा दिए जाते हैं।

 

खबरगांव के ही पत्रकार अजय सिंह के साथ ऐसा वाकया हुआ। जब दिल्ली में नकली सेंसोडाइन टूथपेस्ट की फैक्ट्री पकड़ी गई तो अजय को शक हुआ क्योंकि कुछ दिन पहले ही उन्होंने एक सेंसोडाइन टूथपेस्ट खरीदा था और इससे उनके दांतों में दिक्कत होने लगी थी। पहले तो उन्हें संदेह नहीं था लेकिन यह खबर पढ़ते ही उन्होंने भी टूथपेस्ट के पैकेट पर दिए बार कोड को स्कैन किया तो वह हैरान रह गए। वह बार कोड ही फर्जी था और उसे स्कैन करने पर खुलने वाली वेबसाइट विद्युत के सुचालक और कुचालक का अर्थ समझा रही थी। यह दिखाता है कि आप कितने नकली उत्पाद इस्तेमाल कर रहे हैं या कर चुके हैं, आपको भी एहसास नहीं होगा। इसकी वजह यह है कि उन चीजों की पैकेजिंग हूबहू असली ब्रांड जैसी होती है।

 

हमने नोएडा में ही कुछ दुकानदारों से इसके बारे में बातचीत तो उन्होंने नाम ना छापने की शर्त पर बताया कि कई बार ये डीलर मार्जन अच्छा देते हैं। उदाहरण के लिए- एक दुकानदार ने बताया कि बर्तन धोने वाले साबुन पर जितना मार्जिन असली कंपनी के डीलर देते हैं, उससे लगभग दोगुना मार्जिन हूबहू दिखने वाले नकली ब्रांड के सामान पर मिल जाता है। इस तरह का सामान बेचने वाले एक डीलर ने बताया कि यह काम इतना आसान है कि दुकानदार को पहले तो पता नहीं चलता और चल भी जाता है तो वह मार्जिन के लालच में कुछ नहीं कहता। दूसरी बड़ी बात है कि पैकेजिंग एकदम परफेक्ट होती है, एक्सपायरी डेट ठीक होती है, बैच नंबर जैसी चीजें ग्राहक कभी चेक नहीं करते तो काम आसानी से चलता रहता है।

 


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