भारत के बढ़ते फॉरेक्स रिजर्व के बावजूद रुपया कमजोर क्यों हो रहा है?
भारत का विदेशी मुद्रा भंडार लगभग 700 बिलियन डॉलर का है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर रुपया कमजोर कैसे हो रहा है।

प्रतीकात्मक तस्वीर । Photo Credit: AI Generated
भारत के विदेशी मुद्रा भंडार को अक्सर आर्थिक ताकत का प्रतीक बताया जाता है। जब भी आंकड़े आते हैं तो यह बात सहज ही उठती है कि अगर देश के पास इतना बड़ा डॉलर भंडार है, तो फिर रुपया डॉलर के मुकाबले कमजोर क्यों दिखता है? यह सवाल इसलिए भी अहम है क्योंकि हाल के वर्षों में विदेशी मुद्रा भंडार ऊंचे स्तर पर रहने के बावजूद रुपया लगातार दबाव में रहा है।
भारत में विदेशी मुद्रा भंडार की बात करें तो वह करीब 700 बिलयन डॉलर है। हालांकि, फॉरेक्स रिज़र्व और रुपये की ताकत के बीच रिश्ता जितना सीधा दिखता है, उतना है नहीं। इस आर्टिकिल में हम इसी को समझने की कोशिश करेंगे।
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विदेशी मुद्रा भंडार क्यों अहम है?
भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में मुख्य रूप से चार चीजें शामिल की जाती हैं-
- विदेशी मुद्रा संपत्ति (Foreign Currency Assets – FCA)
- सोना
- IMF के Special Drawing Rights (SDR)
- IMF में भारत की Reserve Tranche Position
हाल के वर्षों में भारत का फॉरेक्स रिज़र्व 600–700 अरब डॉलर के दायरे में बना रहा है। यह स्तर काफी अच्छा माना जाता है। आर्थिक मानकों के अनुसार इस फॉरेक्स रिजर्व से भारत के पास 9–11 महीने के आयात को कवर करने लायक भंडार है और अल्पकालिक विदेशी कर्ज़ (short-term external debt) की तुलना में रिज़र्व पर्याप्त है। यानी किसी बाहरी झटके (जैसे 2008 या 2013 जैसा संकट) से निपटने की क्षमता कागज़ पर मजबूत दिखती है।
फिर रुपया क्यों कमजोर?
यह समझने के लिए सबसे पहले एक मिथक तोड़ना ज़रूरी है। मतलब यह कि रुपये की वैल्यू के लिए खाली विदेशी मुद्रा भंडार ही जिम्मेदार नहीं होता। हकीकत यह है कि विदेशी मुद्रा भंडार रुपये को 'बचाने की गारंटी' नहीं, बल्कि संकट के समय इसके शॉक को सहने की क्षमता देता है। अब कारणों को एक-एक करके समझते हैं।
डॉलर वैश्विक ताकत है
रुपये की कमजोरी को सिर्फ भारत के चश्मे से नहीं देखा जा सकता। पिछले कुछ सालों में डॉलर वैश्विक स्तर पर बेहद मजबूत रहा है। इसके पीछे कारण हैं-
- अमेरिका में ऊंची ब्याज दरें
- अमेरिकी बॉन्ड पर बेहतर रिटर्न
- वैश्विक अनिश्चितता (युद्ध, रेड सी संकट, जियो-पॉलिटिकल तनाव)
जब दुनिया भर के निवेशक 'सेफ हेवन' के तौर पर डॉलर की ओर भागते हैं, तो उभरती अर्थव्यवस्थाओं (जैसे भारत) की मुद्राएं दबाव में आती हैं, विदेशी निवेशक डॉलर निकालते हैं और स्थानीय मुद्रा कमजोर होती है। इस हालात में RBI चाहे जितना रिज़र्व रखे, वह डॉलर की वैश्विक मांग को पूरी तरह पलट नहीं सकता।
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फॉरेक्स रिज़र्व बढ़ने का मतलब क्या
एक और अहम बिंदु है जिस पर विचार नहीं किया जाता कि फॉरेक्स रिज़र्व का बढ़ना ≠ डॉलर इनफ्लो का बढ़ना। उदाहरण के लिए अगर सोने की अंतर्राष्ट्रीय कीमत बढ़ती है, तो भारत के गोल्ड रिज़र्व का डॉलर वैल्यू बढ़ जाता है और बिना एक भी नया डॉलर आए, फॉरेक्स रिज़र्व बढ़ा हुआ दिखता है
इसी तरह यूरो, पाउंड या येन की वैल्यू बदलने से भी रिज़र्व का कुल डॉलर मूल्य ऊपर-नीचे हो सकता है। यानी आंकड़ों में 'रिकॉर्ड रिज़र्व' दिख सकता है, लेकिन स्पॉट मार्केट में डॉलर की उपलब्धता वहीं की वहीं रह सकती है।
आयात-निर्भर इकॉनमी भी वजह
भारत आज भी कई अहम चीज़ों के लिए आयात पर निर्भर है। जैसे- कच्चा तेल, गैस, इलेक्ट्रॉनिक्स, रक्षा उपकरण, खाद्य तेल और सोना। इसलिए जब भी तेल की कीमतें बढ़ती हैं या आयात बढ़ता है तो डॉलर की मांग बढ़ जाती है और रुपया दबाव में आता है। यह दबाव तब भी रहता है जब फॉरेक्स रिज़र्व ऊंचा हो, क्योंकि रिज़र्व रोज़मर्रा के व्यापार के लिए नहीं बल्कि आपात स्थिति के लिए होता है।
विदेशी निवेश
रुपये की कीमत में विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (FPI/FII) की बड़ी भूमिका होती है। जब वैश्विक जोखिम बढ़ता है तो विदेशी निवेशक भारतीय शेयर और बॉन्ड बाज़ार से पैसा निकालते हैं, इससे डॉलर बाहर जाता है और रुपया कमजोर होता है। यह प्रक्रिया कई बार फॉरेक्स रिज़र्व बढ़ने के बावजूद चलती रहती है।
उतार-चढ़ाव को रोकता है
भारतीय रिज़र्व बैंक अपनी नीतियों के जरिए रुपये को किसी एक तय स्तर पर बांधकर नहीं रखता बल्कि वह सिर्फ अत्यधिक उतार-चढ़ाव को रोकता है। यानी अगर रुपया धीरे-धीरे 1–2% कमजोर होता है तो RBI चिंतिंत नहीं होती लेकिन अगर अचानक तेज गिरावट हो तो RBI डॉलर बेचकर इसे संतुलित करने की कोशिश करता है। RBI फॉरेक्स रिज़र्व का इस्तेमाल 'रुपये को मजबूत दिखाने' के लिए नहीं, बल्कि 'बाज़ार में घबराहट रोकने' के लिए करता है।
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रुपया मजबूती का वादा नहीं
विदेशी मुद्रा भंडार भारत की आर्थिक ढाल है, संकट में भरोसा देता है, निवेशकों का विश्वास बढ़ाता है, लेकिन यह रुपये को हर हाल में मजबूत रखने का वादा नहीं करता, डॉलर की वैश्विक राजनीति, इन्वेस्टमेंट इन्फ्लो और आयात-निर्भरता इन सबके सामने रिज़र्व सिर्फ एक कुशन है, ताला नहीं। इसलिए रिकॉर्ड फॉरेक्स रिज़र्व के दौर में भी अगर रुपया दबाव में दिखे, तो यह विरोधाभास नहीं, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था की हकीकत है।
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