गुड्स एंड सर्विस टैक्स (GST) काउंसिल ने 8 अक्टूबर को ई-कॉमर्स ऑपरेटरों (ECO) के जरिए दी जाने वाली कुछ डिलीवरी सेवाओं पर 5 फीसदी GST लगाने का प्रस्ताव रखा है। इन पर इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) नहीं मिलेगा। इसका मकसद ई-कॉमर्स डिलीवरी पर टैक्स के तरीके में समानता लाना है। अलग-अलग माध्यमों से सामान पहुंचाने पर GST लागू होने को लेकर सरकार भ्रम दूर करना चाहती है।
GST) काउंसिल के प्रस्ताव में कूरियर और डाक सेवाओं को छोड़कर बाकी डिलीवरी सेवाएं शामिल हैं। ये सेवाएं केंद्रीय GST (CGST) अधिनियम की धारा 9(5) के तहत ECO के जरिए दी जाती हैं। इनमें सेवा देने वाला व्यक्ति धारा 22(1) के तहत GST रजिस्ट्रेशन के लिए बाध्य नहीं होता।
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GTA की छूट हटाने की भी सिफारिश
ECO के जरिए बेचे या मंगाए गए सामान से जुड़ी डिलीवरी सेवाओं पर भी अलग से 5 फीसदी GST का प्रस्ताव है। इस पर भी ITC नहीं मिलेगा। सिफारिशों में गुड्स ट्रांसपोर्ट एजेंसी (GTA) की मौजूदा छूट हटाने की बात भी है। यह छूट गैर रजिस्टर्ड व्यक्तियों को सामान की ढुलाई पर मिलती है। हटाने की सिफारिश उन मामलों के लिए है, जहां सामान ECO के जरिए सप्लाई या ऑर्डर किया गया हो।
ई कॉमर्स पर 5 प्रतिशत GST
सरकारी सूत्रों ने स्पष्ट किया कि ई-कॉमर्स सामान की डिलीवरी किसी भी माध्यम से हो, उस पर 5 फीसदी GST लगेगा। पहले GTA के जरिए ढुलाई पर GST से छूट थी। अब सभी तरह के परिवहन माध्यमों से डिलीवरी पर 5 फीसदी GST लागू होगा। प्रस्तावित बदलावों से तेजी से बढ़ते ई-कॉमर्स और क्विक कॉमर्स सेक्टर में डिलीवरी पर GST के नियम ज्यादा साफ होंगे। हालांकि कुछ लेन-देन में टैक्स की लागत बढ़ सकती है।
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आम आदमी पर क्या असर होगा?
आम आदमी के लिए इस प्रस्ताव का सीधा मतलब यह है कि स्विगी, जोमैटो, ब्लिंकिट, जेप्टो और अमेजन जैसी ई-कॉमर्स और क्विक-कॉमर्स कंपनियों से सामान या खाना मंगवाना थोड़ा और महंगा हो सकता है। जब इन प्लेटफॉर्म्स द्वारा ली जाने वाली डिलीवरी फीस पर 5 प्रतिशत जीएसटी लगेगा और कंपनियों को इनपुट टैक्स क्रेडिट का फायदा भी नहीं मिलेगा।
कंपनियां इस अतिरिक्त टैक्स का बोझ सीधे ग्राहकों की जेब पर डाल सकती हैं। यह टैक्स पूरे सामान की कीमत पर नहीं, बल्कि केवल अलग से लगने वाले डिलीवरी और हैंडलिंग चार्ज पर होगा।जो लोग बार-बार ऑनलाइन ऑर्डर करते हैं, उनके लिए खर्च बढ़ जाएगा।