बिना विदेशी मदद के भारत कैसे पूरा करेगा ब्लू इकॉनमी का सपना? इनसाइड स्टोरी
भारत 3 तरफ से समुद्र से घिरा है फिर भी समुद्री क्षेत्रों में मौजूद खनिजों का सबसे कम दोहन करता है। ब्लू इकॉनमी की सबसे बड़ी बाधाएं क्या हैं, चुनौतियां क्या हैं, पढ़ें रिपोर्ट।

भारत की ब्लू इकॉनमी, सप्तधारा योजनाओं में से एक है। प्रतीकात्मक तस्वीर। AI इमेज। Photo Credit: ChatGPT
केंद्र सरकार जिन 'सप्तधारा' शक्तियों के सहारे विकसित भारत 2047 तक पहुंचने का लक्ष्य रख रही है, उसमें से एक हिस्सा ब्लू इकोनॉमी का भी है। प्रधानमंत्री
नरेंद्र मोदी
ने लाल किले की प्राचीर से इसे सातवीं शक्ति कहा था। उन्होंने कहा था कि ब्लू इकोनॉमी के कई क्षेत्रों में भारत तेज प्रगति कर रहा है। समुद्री संसाधनों का सही उपयोग विकास का नया इंजन बनेगा। जिस ब्लू-ग्रीन अर्थव्यवस्था पर सरकार इतना जोर दे रही है, उसकी राह में सबसे बड़ी चुनौती है भारत की विदेशी निर्भरता।
शिपिंग से लेकर खनिजों तक, हम कई मामलों पर विदेशी मदद पर निर्भर हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मई 2026 में नॉर्डिक देशों का दौरा किया था, कई देशों के साथ ग्रीन-ब्लू इकॉनमी से जुड़े कुछ समझौते हुए थे। इन समझौतों की मदद से ही भारत अर्थव्यवस्था के इस क्षेत्र में अपना भविष्य संवारने का सपना देख रहा था। अब ब्लू इकॉनमी को लेकर सरकार ने अपना रुख बदला है।
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ब्लू इकॉनमी की राह क्या हो सकती है?
पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय ने मई 2025 में 'अर्न्स्ट एंड यंग' के साथ मिलकर 'ट्रांसफॉर्मिंग इंडियाज ब्लू इकॉनमी' नाम से एक रिपोर्ट तैयार की थी। इस रिपोर्ट में भारत के समुद्री संसाधनों से जुड़ी अर्थव्यवस्था की मौजूदा स्थिति, चुनौतियों और भविष्य की संभावनाओं का पूरा खाका तैयार किया गया था। भारत के पास 11,098 किलोमीटर लंबी तटरेखा और 2.4 करोड़ वर्ग किलोमीटर का विशाल एक्सक्लूसिव इकॉनॉमिक जोन (EEZ) है, जो इसे समुद्री अर्थव्यवस्था के मामले में दुनिया के प्रमुख देशों में शामिल होने का मौका देता है। अब केंद्र सरकार ने इन इलाकों को रिसर्च के लिए खोल दिया है, जिससे नई संभावनाएं पैदा हो सकती हैं। अगर आपेक्षित नतीजे रहे तो नॉर्डिक देशों पर देश की निर्भरता कम होगी।
ब्लू इकॉनमी है क्या?
पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय भारत के संदर्भ में इसे समुद्री अर्थव्यवस्था के नजरिए से देखता है। यह राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था का वह हिस्सा है जिसमें समुद्री संसाधन और तटीय इलाकों में बनाए गए संसाधनों को रखा जाता है। इस क्षेत्र में सिर्फ पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय ही नहीं, बल्कि 24 अन्य मंत्रालय भी शामिल हैं। बंदरगाह, जहाजरानी और जलमार्ग मंत्रालय (MoPSW), मत्स्य पालन मंत्रालय, और पर्यावरण मंत्रालय। इसके अलावा 9 तटीय राज्य और 4 केंद्रशासित प्रदेश भी अपने स्तर पर योजनाएं चला रहे हैं।
सरकार का मकसद क्या है?
सरकार का लक्ष्य 2030 तक ब्लू इकॉनमी को 100 अरब डॉलर तक पहुंचाना है। यह भारत के 'विकसित भारत 2047' विजन के 10 मुख्य स्तंभों में से एक है। भारत ने 2023 में G20 अध्यक्षता के दौरान 'चेन्नई हाई लेवल प्रिंसिपल्स' को अपनाकर समुद्री अर्थव्यवस्था को टिकाऊ बनाने का संकल्प लिया था।
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किन सेक्टर में काम हो रहा है?
'अर्न्स्ट एंड यंग' की रिपोर्ट के मुताबिक मत्स्य पालन क्षेत्र में प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना जैसी योजनाओं के जरिए मछली उत्पादन बढ़कर 17.25 मिलियन मीट्रिक टन हो गया है। करीब 48 लाख मछुआरों को इसका फायदा मिला है, जिसमें 30 प्रतिशत महिलाएं शामिल हैं। समुद्री परिवहन और शिपिंग क्षेत्र में सागरमाला कार्यक्रम के तहत 155 परियोजनाएं पूरी हो चुकी हैं। कार्गो क्षमता 1,534 मिलियन टन प्रति वर्ष तक पहुंच गई है। अपतटीय इलाके, जिन्हें 'ऑफशोर' कहा जाता है, वहां से रिन्यूएबल एनर्जी या नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में अपार संभावनाएं पैदा हो रहीं हैं। गुजरात तट पर सर्वे कर 36 गीगावाट पवन ऊर्जा क्षमता का पता लगाया गया है। 2030 तक 30 गीगावाट ऑफशोर पवन ऊर्जा का लक्ष्य रखा गया है।
'अर्न्स्ट एंड यंग' की रिपोर्ट बताती है कि साल 2025 तक तटीय पर्यटन को स्वदेश दर्शन योजना के जरिए सरकार बेहतर भविष्य की उम्मीद कर रही है। 15 तटीय सर्किट विकसित हुए हैं जिनसे 1.25 करोड़ पर्यटक आए और करीब 81 लाख नौकरियां पैदा हुईं। समुद्री जैव प्रौद्योगिकी में डीप ओशन मिशन के तहत नए यौगिकों की खोज हो रही है, और 30 स्टार्टअप्स को सहयोग मिला है। खनिज संसाधनों के क्षेत्र में 28 अपतटीय ब्लॉक आवंटित किए गए हैं जिनसे 50,000 करोड़ रुपये का निवेश आकर्षित हुआ है।
सफल मॉडल जिन्हें दोहराया जा सकता है
ओडिशा की चिलिका झील के आसपास महिलाओं के नेतृत्व में समुद्री शैवाल की खेती होती है। यहां मछली पकड़ने के घटते अवसरों के बीच 200 से ज्यादा स्वयं सहायता समूह अब शैवाल उगाकर आजीविका कमा रहे हैं। इससे 10,000 से ज्यादा तटीय परिवारों को अतिरिक्त आमदनी मिल रही है। यह पर्यावरण के लिए भी फायदेमंद है क्योंकि शैवाल कार्बन सोखता है। कोच्चि बंदरगाह का 'डिजिटल ट्विन' मॉडल, सेंसर और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद से बंदरगाह की पूरी वर्चुअल कॉपी बनाई गई है। जहाजों का वेटिंग पीरियड इससे घटा है और संचालन बेहतर हुआ है।
गुजरात के अलंग में शिपब्रेकिंग इंडस्ट्री का सर्कुलर इकॉनमी मॉडल बेहतर हुआ है। यह कभी प्रदूषण के लिए बदनाम था, अब हांगकांग कन्वेंशन के मानकों का पालन कर रहा है। स्टील और अन्य धातुओं को रिसाइकिल किया जा रहा है, जिससे इनका नए तरीके से इस्तेमाल हो सके। अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के लिए टिकाऊ पर्यटन मॉडल अपनाकर 2023 में 5 लाख पर्यटकों से 800 करोड़ रुपये की आमदनी हुई। 90 फीसदी कोरल रीफ को सुरक्षित रखा गया। पर्यटन हुआ लेकिन समुद्र के भीतर मौजूद जैव पारिस्थितिकी और संरचनाओं को छुआ तक नहीं गया।
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चुनौतियां क्या हैं?
'अर्न्स्ट एंड यंग' की रिपोर्ट के मुताबिक मछली पकड़ने के क्षेत्र में ओवरफिशिंग और प्रदूषण से मछली भंडार घट रहे हैं। कोल्ड चेन सुविधाओं की कमी से फसल कटाई के बाद नुकसान हो रहा है। छोटे मछुआरों को कर्ज मिलना मुश्किल है, उनके पास गिरवी रखने के लिए कुछ नहीं है। शिपिंग क्षेत्र में लॉजिस्टिक्स लागत ज्यादा है और जहाज निर्माण क्षमता सीमित है। अपतटीय ऊर्जा परियोजनाओं में आयात पर निर्भरता के कारण लागत ज्यादा आती है और प्रशिक्षित तकनीशियनों की भारी कमी है।
तटीय पर्यटन में कई जगह सैनिटेशन और परिवहन जैसी बुनियादी सुविधाओं की कमी है। मरीन बायोटेक्नोलॉजी में शोध की धीमी रफ्तार और आयातित उपकरणों पर निर्भरता बड़ी समस्या है। हर क्षेत्र में एक समान समस्या दिखती है, निजी निवेश की कमी, तकनीकी कमजोरी, कुशल कामगारों की कमी और महिलाओं और स्थानीय समुदायों की सीमित भागीदारी। सरकार इससे कैसे निपटेगी इसका खाका अभी तक तैयार नहीं हुआ है।
पैसा कहां से आएगा?
पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय की ओर से जारी 'अर्न्स्ट एंड यंग' रिपोर्ट में तरीकों पर भी बात की गई है। इसमें ब्लू बॉन्ड्स , सार्वजनिक-निजी भागीदारी और नेशनल बैंक फॉर फाइनेंसिंग इंफ्रास्ट्रक्चर एंड डेवलपमेंट (NaBFID) जैसे फाइनेंशियल डेवलेपमेंट इंस्टीट्यूशन की मदद से लक्ष्य हासिल किया जा सकता है।
अभी सागरमाला की सिर्फ 15 फीसदी परियोजनाओं में ही निजी निवेश शामिल है। समुद्री अर्थव्यवस्था की दिशा में यह एक कमजोर बढ़त है। रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि सुंदरबन जैसे इलाकों में 'डेट-फॉर-नेचर स्वैप' जैसे नए वित्तीय उपकरणों को अपनाने की जरूरत है।
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उम्मीदें क्या हैं?
रिपोर्ट में 2035 तक के लिए एक रोडमैप तैयार किया गया है। रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि साल 2026 से मंत्रालयों के बीच समन्वय के लिए 'इंटर-मिनिस्टीरियल कोऑर्डिनेशन काउंसिल' बेहतर काम करे। साल 2027 तक डिजिटल ब्लू इकॉनमी डैशबोर्ड को सफल किया जाए। 2028 तक 50,000 कामगारों को प्रशिक्षित करने वाला 'नेशनल ब्लू स्किल्स प्रोग्राम' चलाया जाए। लक्ष्य यह है कि 2035 तक ब्लू इकॉनमी का योगदान 5 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच जाए।
रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत के पास समुद्र से जुड़ी अपार संभावनाएं हैं लेकिन इन्हें पूरी तरह भुनाने के लिए बेहतर तालमेल, ज्यादा निवेश, आधुनिक तकनीक की जरूरत है। तटीय समुदायों, महिलाओं और आदिवासी समूहों की भागीदारी से इसे स्थानीय विकास को भी जोड़ा जा सकता है। अगर 2047 तक इस लक्ष्य को हासिल करना है तो इस दिशा में काम भी करना होगा।
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