पश्चिम एशिया में चल रहे युद्ध और तनाव ने भारतीय चाय बाजार की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते टकराव की वजह से न केवल चाय की खेप बीच समुद्र में फंसी हुई है बल्कि करोड़ों रुपये का भुगतान भी अटक गया है। निर्यातकों का कहना है कि अगर हालात जल्द नहीं सुधरे, तो इसका असर सिर्फ खाड़ी देशों तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि अमेरिका और यूरोप जाने वाली चाय की लागत और समय भी बढ़ जाएगा।
आपको यह जानना भी जरूरी है कि भारतीय चाय के लिए पश्चिम एशिया सबसे बड़ा बाजार है। यहां कुल निर्यात का लगभग 41% हिस्सा जाता है। वर्तमान स्थिति यह है कि शिपिंग कंपनियों ने नए ऑर्डर लेना तक बंद कर दिया है। युद्ध के खतरे को देखते हुए कंपनियों ने दाम बढ़ाने की तैयारी कर ली है। इसकी वजह से भारतीय चाय वैश्विक बाजार में महंगी हो सकती है।
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अटका भुगतान और स्टॉक
भारतीय चाय निर्यातक संघ के अनुसार, ईरान भेजी गई चाय का पैसा फंस गया है। बहुत सारा स्टॉक गोदामों में तैयार खड़ा है लेकिन हालातों की अनिश्चितता के कारण उसे भेजा नहीं जा रहा है।
दक्षिण भारत के निर्यातकों का कहना है कि पूरी सप्लाई चेन उन्हीं रास्तों जैसे होर्मुज स्ट्रेट और बंदरगाहों पर टिकी है जहां हमले हो रहे हैं। ऐसे में नुकसान का सही अंदाजा लगाना फिलहाल मुश्किल है।
कई बड़े निर्यातकों को उनके विदेशी खरीदारों ने फिलहाल शिपमेंट रोकने की सलाह दी है। कुछ कंपनियों का तो 70% तक कारोबार इसी क्षेत्र पर निर्भर है।
आंकड़ों की नजर में संकट
यह क्षेत्र भारतीय चाय के लिए एक बहुत बड़ा मार्केट है। देश के कुल चाय के निर्यात का 41 प्रतिशत हिस्सा यही जाता है। चाय बोर्ड के जारी आंकड़ों के अनुसार, साल 2025 में भारत ने कुल 28.04 करोड़ किलो चाय निर्यात किया था।
इसमें से अकेले यूएई, ईरान और इराक का हिस्सा 11.45 करोड़ किलो था। जानकारों का मानना है कि जहाजों के रास्ते बदलने और देरी होने से माल ढुलाई की लागत में भारी उछाल आ सकता है।
ईरान भारत का प्रमुख आयातक है, जहां 2025 में 11.25 मिलियन किग्रा चाय निर्यात हुई। वहीं 2024 में भारत ने ईरान को लगभग 40 मिलियन डॉलर यानी करीब 340 करोड़ रुपये की चाय निर्यात की।
क्या चीन बनेगा सहारा?
चाय बोर्ड का मानना है कि ईरान मुख्य रूप से 'ऑर्थोडॉक्स' चाय खरीदता है। अच्छी बात यह है कि चीन में भारतीय चाय की मांग तेजी से बढ़ी है। आंकड़ों की मानें तो पहले यह 62 लाख किलो था जो बढ़कर 1.61 करोड़ किलो हो गया।
मुमकिन है कि ईरान न जाने वाली कुछ चाय चीन खरीद ले लेकिन खाड़ी देशों की भरपाई कर पाना किसी एक देश के लिए मुमकिन नहीं है। यदि यह तनाव लंबा खिंचता है, तो भारतीय चाय उद्योग को अपनी बाजार हिस्सेदारी वापस पाने के लिए कड़ा संघर्ष करना पड़ सकता है।
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चूंकि चीन के पास मध्य एशियाई देशों के माध्यम से जमीन के रास्ते व्यापार करने का विकल्प है, वह समुद्री मार्ग की बाधाओं से काफी हद तक बच सकता है।
आगे की राह चुनौतीपूर्ण
फिलहाल उत्तर भारत में चाय का ऑफ-सीजन है लेकिन महीने के अंत से नया सीजन शुरू होने वाला है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर यह तनाव नहीं होता, तो 2026 में निर्यात 30 करोड़ किलो के पार जा सकता था लेकिन अब इस पर अनिश्चितता के काले बादल छाए हुए हैं।