म्यूचुअल फंड में जब आप पैसे लगाते हैं तो सबसे बड़ी चिंता यही होती है कि आपका पैसा सुरक्षित रहे। बाजार में कभी-कभी ऐसी स्थिति आ जाती है जब कुछ कंपनियां भारी घाटे में चली जाती हैं। ऐसे समय में निवेशकों के नुकसान को कम करने के लिए एक नियम काम आता है, जिसे 'साइड पॉकेट' या आसान शब्दों में कहें तो 'अलग किया हुआ हिस्सा' कहते हैं। यह तरीका निवेशकों के लिए एक सुरक्षा कवच की तरह है जो पूरे पैसे को डूबने से बचाती है।
जब कोई म्यूचुअल फंड किसी कंपनी के 'बॉन्ड' यानी कर्ज के पेपर में पैसा लगाता है तो वह कंपनी समय पर ब्याज और मूल पैसा लौटाने का वादा करती है। जब वह कंपनी कंगाल हो जाती है और कर्ज चुकाने से हाथ खड़े कर देती है तो उसे 'डिफॉल्ट' कहते हैं। ऐसे हालात में फंड मैनेजर उस डूबते हुए निवेश को बाकी के अच्छे और सुरक्षित पैसों से तुरंत अलग कर देता है। इस व्यवस्था को 'सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया' (SEBI) ने दिसंबर 2018 में 'इंफ्रास्ट्रक्चर लीजिंग एंड फाइनेंशियल सर्विसेज' (IL&FS) संकट के बाद लागू किया था जो हमारे देश में पूरे म्यूचुअल फंड बाजार के सुरक्षा की तरह काम करता है।
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यह साइड पॉकेट एक तरह की अलग थैली की तरह है। जब किसी म्यूचुअल फंड के पोर्टफोलियो में कोई कंपनी डिफॉल्ट करती है या उसकी 'क्रेडिट रेटिंग' बहुत नीचे गिर जाती है, तो उस खराब हिस्से को बाकी अच्छे निवेश से अलग कर दिया जाता है। क्रेडिट रेटिंग का सीधा मतलब है कि कोई कंपनी अपना कर्ज चुकाने में कितनी सक्षम है और यह रेटिंग 'क्रेडिट रेटिंग इंफॉर्मेशन सर्विसेज ऑफ इंडिया लिमिटेड' (CRISIL) और 'क्रेडिट एनालिसिस एंड रिसर्च लिमिटेड' (CARE) जैसी एजेंसियां देती हैं। रेटिंग का गिरना बताता है कि कंपनी बड़े आर्थिक संकट में है।
SEBI ने इसे कब और क्यों लागू किया?
भारत में साइड पॉकेट की शुरुआत 2018 में 'इंफ्रास्ट्रक्चर लीजिंग एंड फाइनेंशियल सर्विसेज' (IL&FS) संकट के बाद हुई थी। यह एक बहुत बड़ी कंपनी थी जो सड़कें और पुल बनाने के लिए लोन देती थी लेकिन यह अचानक डिफॉल्ट कर गई। इसके बाद 'नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनी' (NBFC) यानी जो बैंक नहीं होतीं लेकिन लोन देती हैं और होम लोन देने वाली कंपनियों के बॉन्ड भी मुश्किल में आ गए। बहुत सारे डेट म्यूचुअल फंड में इन कंपनियों के बॉन्ड थे जिससे निवेशकों में घबराहट फैली और उन्होंने एक साथ अपना पैसा निकालना शुरू किया।
इस परेशानी को देखते हुए 'एसोसिएशन ऑफ म्यूचुअल फंड्स इन इंडिया' (AMFI) जो कि सभी म्यूचुअल फंड कंपनियों का एक संगठन है उसने 5 अक्टूबर 2018 को 'सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया' (SEBI) को साइड पॉकेट का प्रस्ताव दिया। इसके बाद सेबी ने 28 दिसंबर 2018 को सर्कुलर जारी करके डेट म्यूचुअल फंड को खराब हिस्सा अलग करने की इजाजत दी। नवंबर 2019 में सेबी ने यह भी कहा कि सभी नई आने वाली स्कीम में साइड पॉकेट का प्रावधान जरूर शामिल करें।
साइड पॉकेट कैसे काम करता है?
जब किसी फंड में कोई कंपनी का बॉन्ड इन्वेस्टमेंट ग्रेड से नीचे आ जाता है यानी उसकी रेटिंग बहुत खराब हो जाती है तो 'एसेट मैनेजमेंट कंपनी' (AMC) यानी जो आपकी म्यूचुअल फंड स्कीम को चलाती है वह साइड पॉकेट बना सकती है। इसके लिए म्यूचुअल फंड के ट्रस्टीज की मंजूरी लेनी होती है। एक बार मंजूरी मिलने के बाद पूरा निवेश दो हिस्सों में बंट जाता है।
पहला हिस्सा 'मेन पोर्टफोलियो' होता है जिसमें सभी अच्छे निवेश रहते हैं। इसका 'नेट एसेट वैल्यू' (NAV) जो म्यूचुअल फंड की एक यूनिट की आज की बाजार कीमत होती है वह अलग होता है और आम निवेशक इसमें से जब चाहें अपना पैसा निकाल या लगा सकते हैं। दूसरा हिस्सा 'साइड पॉकेट पोर्टफोलियो' होता है जिसमें वो खराब निवेश होता है जो डिफॉल्ट हुआ है। इसकी एनऐवी को मुख्य फंड से अलग करके बहुत कम कर दिया जाता है।
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साइड पॉकेट बनने के बाद एएमसी एसएमएस और ईमेल के जरिए सभी निवेशकों को इसकी जानकारी देती है और इन यूनिट को शेयर बाजार यानी स्टॉक एक्सचेंज पर लिस्ट भी किया जाता है ताकि आगे जाकर इसे कोई बेचना चाहे तो बेच सके।
भारत में साइड पॉकेट के असली उदाहरण
भारत में इसका सबसे पहला उदाहरण 'दीवान हाउसिंग फाइनेंस कॉर्पोरेशन लिमिटेड' (DHFL) संकट के समय 2019 में देखा गया। इस बड़ी होम लोन देने वाली कंपनी ने पैसों की तंगी के कारण अचानक डिफॉल्ट किया और हाथ खड़े कर दिए। म्यूचुअल फंड कंपनियों का इस कंपनी में पूरे लगभग 5,336 करोड़ रुपये का निवेश फंसा हुआ था। तब 'टाटा म्यूचुअल फंड' पहली ऐसी ऐएमसी बनी जिसने सेबी के नियमों के तहत अपनी तीन स्कीम में डीएचएफएल का हिस्सा साइड पॉकेट में डालकर अलग कर दिया जिससे उनके बाकी निवेशकों का पैसा सुरक्षित रह सका।