कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु में 10 फरवरी मैसूर सैंडल सोप का एक इवेंट हुआ था। इस इवेंट में तमन्ना भाटिया इस ब्रांड की एंबेसडर के तौर पर शामिल हुईं। जहां उन्होंने 57 नए प्रोडक्ट्स को बेंगलुरु में लॉन्च किया। जानकारी के लिए बता दें कि मैसूर सैंडल सोप का निर्माण केएसडीएल (कर्नाटक सोप्स एंड डिटर्जेंट्स लिमिटेड) में किया जाता है, जिसकी ब्रांड एंबेसडर तमन्ना भाटिया हैं। लोगों का कहना है कि यह ब्रांड कर्नाटक में जन्मा है और इसका 109 साल पुराना इतिहास है। इसलिए इस ब्रांड का एंबेसडर कर्नाटक की किसी अभिनेत्री को होना चाहिए, न कि मुंबई की।
इस विवाद को देखते हुए कई लोगों के मन में सवाल उठ रहा है कि तमन्ना भाटिया से पहले केएसडीएल का ब्रांड एंबेसडर कौन-कौन रह चुका है। साथ ही यह भी सवाल है कि मैसूर सैंडल सोप ब्रांड का 109 साल का इतिहास क्या है।
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KSDL के ब्रांड एंबेसडर
केएसडीएल ब्रांड के प्रमोशन के लिए अब तक कई हस्तियों को एंबेसडर बनाया जा चुका है। साल 1992 में रामायण सीरियल में सीता का किरदार निभाने वाली दीपिका चिखलिया को एंबेसडर बनाया गया था। उन्हें 1993 तक के प्रमोशन के लिए 25 लाख रुपये मिले थे। साल 2003 में क्रिकेटर डोड्डा गणेश को एंबेसडर बनाया गया था, जिन्हें 25 लाख रुपये दिए गए थे। इसके बाद 2013 में भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी को एंबेसडर नियुक्त किया गया। उन्हें लगभग 84 लाख रुपये दिए गए थे।
2025 में तमन्ना भाटिया को एंबेसडर बनाया गया, जिन्हें इस ब्रांड के प्रमोशन के लिए 6.20 करोड़ रुपये दिए गए हैं। तमन्ना पहली ऐसी एंबेसडर हैं जिन्हें इतनी बड़ी रकम दी जा रही है। कई जानकार यह कयास लगा रहे हैं कि ब्रांड की ओर से ज्यादा पैसे दिए जाने के कारण लोग नाराज हैं। साथ ही, कुछ लोगों का कहना है कि तमन्ना उत्तर भारत से जुड़ी हैं, इसी वजह से उनका विरोध किया जा रहा है।
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जानकारी के लिए बता दें कि केएसडीएल ब्रांड कर्नाटक सरकार के अंतर्गत आता है। पिछले कई वर्षों से इस कंपनी का संचालन राज्य सरकार ही करती है। इस विवाद के बाद उद्योग मंत्री एम.बी. पाटिल ने कारण बताया कि आखिर क्यों तमन्ना भाटिया को एंबेसडर बनाया गया। सरकार के अनुसार, कंपनी की लगभग 18 प्रतिशत बिक्री (करीब 324 करोड़ रुपये) कर्नाटक में होती है, जबकि 82 प्रतिशत (लगभग 1,500 करोड़ रुपये) बिक्री अन्य राज्यों में होती है। इसी वजह से व्यापक पहचान रखने वाले चेहरे को एंबेसडर बनाया गया है।
इस विवाद से एक बात साफ हो गई है कि मैसूर सैंडल सोप से लोगों का भावनात्मक जुड़ाव है। इसी वजह से लोग इस मुद्दे पर प्रतिक्रिया दे रहे हैं। अब सवाल उठता है कि इस ब्रांड का ऐसा क्या इतिहास है, जिससे कर्नाटक के लोगों को इससे इतना लगाव है।
मैसूर सैंडल सोप का इतिहास
देश और दुनिया में साबुन बनाने वाली कई कंपनियां हैं लेकिन बहुत कम कंपनियां ऐसी हैं जिन्होंने 109 साल का सफल सफर तय किया हो। मैसूर सैंडल सोप उन्हीं में से एक है। इसकी शुरुआत ब्रिटिश काल में मैसूर के राजा ने की थी।
प्रथम विश्व युद्ध के दौरान मैसूर के राजा वोडियार चतुर्थ थे। उनके दीवान मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया थे, जिन्हें देश के महान इंजीनियरों में गिना जाता है। प्रथम विश्व युद्ध के कारण ब्रिटिश शासन मैसूर के चंदन की लकड़ियों को विदेशों में सप्लाई नहीं कर पा रहा था। इससे राज्य में चंदन की लकड़ियों का भंडार जमा हो गया।
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इन चंदन की लकड़ियों से चंदन का तेल बनाया जाता था, जिसका उपयोग राजा बड़े शौक से करते थे। एक दिन राजा के दरबार में फ्रांस के दो लोग आए, जिन्होंने चंदन का साबुन दिखाया। इसके बाद राजा के मन में विचार आया कि क्यों न मैसूर के चंदन का उपयोग कर खुद चंदन का साबुन बनाया जाए। इसके बाद एम. विश्वेश्वरैया ने बंबई से विशेषज्ञों को बुलाकर चंदन का साबुन बनाने की प्रक्रिया शुरू करवाई। वर्ष 1918 में बेंगलुरु के कब्बन पार्क के पास एक फैक्ट्री में साबुन का निर्माण शुरू हुआ। शुरुआत में इस साबुन का उपयोग केवल राजा और राजपरिवार ही करते थे। बाद में बड़े पैमाने पर इसका उत्पादन शुरू हुआ, ताकि पूरे राज्य के लोग इसका उपयोग कर सकें।