ईरान के बवाल से गरीब हो जाएंगे 25 लाख भारतीय! हैरान कर देगी यह रिपोर्ट
पश्चिमी एशिया में जारी बवाल का असर भारत पर देखने को मिल रहा है। अब संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट ने इशारा किया है कि इस संकट से भारत के 25 लाख लोग गरीब हो सकते हैं।

प्रतीकात्मक तस्वीर, Photo Credit: Sora AI
ईरान बनाम इजरायल-अमेरिका का टकराव अभी खत्म होता नहीं दिख रहा है। हमले तो फिलहाल रुक गए हैं लेकिन कई आर्थिक गतिविधियां अभी भी प्रभावित हैं। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बंद होने के चलते बहुत सारे कारोबार प्रभावित हैं, गैस की किल्लत है, कंपनियों का काम प्रभावित हो रहा है और इसका अंतिम प्रभाव इम लोगों पर बड़ रहा है। इस बीच संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट कह रही है कि पश्चिमी एशिया के इस संघर्ष से भारत के 25 लाख लोगों के गरीबी में धकेल दिए जाने की आशंका है। वैश्विक स्तर पर 88 लाख लोगों भंयकर रूप से गरीब हो सकते हैं और दुनिया के कई देशों में गरीबी बढ़ सकती है।
संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) ने ‘पश्चिम एशिया में सैन्य वृद्धि: एशिया और प्रशांत क्षेत्र में मानव विकास पर प्रभाव’ शीर्षक वाली रिपोर्ट में कहा है कि यह संघर्ष एशिया और प्रशांत क्षेत्र में मानव विकास के दबाव को बढ़ा रहा है। रिपोर्ट में कहा गया है कि ईंधन, मालभाड़ा और कच्चे माल की लागत बढ़ने से घरेलू लोगों की चीजें खरीदने की क्षमता घट रही है, खाद्य असुरक्षा बढ़ रही है, सरकारी बजट पर दबाव पड़ रहा है और आजीविका कमजोर हो रही है। शुरुआती आकलन के अनुसार, वैश्विक स्तर पर 88 लाख लोग गरीबी के जोखिम में आ सकते हैं और इस सैन्य तनाव से एशिया-प्रशांत क्षेत्र को 299 अरब डॉलर तक का नुकसान हो सकता है।
6 गुना बढ़ सकती है गरीबों की संख्या
इस रिपोर्ट के अनुसार, भारत में गरीबी से प्रभावित लोगों की संख्या लगभग चार लाख से बढ़कर 25 लाख तक पहुंचने का अनुमान है। संघर्ष के कारण दुनियाभर में गरीबी में धकेले जाने वाले लोगों की संख्या लगभग 19 लाख से बढ़कर करीब 88 लाख तक हो सकती है जिसमें दक्षिण एशिया के लोग सबसे अधिक होंगे। चीन में गरीबी की चपेट में आने वाले लोगों की संख्या में मामूली बढ़ोतरी का अनुमान है जो लगभग 1,15,000 से बढ़कर 6,20,000 से अधिक हो जाएगी। हालांकि, यह बहुत बड़ी जनसंख्या के मुकाबले मामूली प्रभाव को दर्शाता है। इसमें कहा गया कि सबसे गंभीर परिदृश्य में भारत की गरीबी दर 23.9 प्रतिशत से बढ़कर 24.2 प्रतिशत हो सकती है जिससे 24,64,698 लोग गरीबी में चले जाएंगे। इस संकट के बाद देश में गरीबी में रहने वालों की संख्या 35.40 करोड़ तक पहुंच सकती है जो पहले 35.15 करोड़ थी।
यह भी पढ़ें: अमेरिका-ईरान युद्ध क्या खाद्य संकट भी लाएगा या हमने 2008 और 2022 से कुछ सीखा है?
रिपोर्ट में मानव विकास सूचकांक (HDI) पर प्रभाव का भी आकलन किया गया है। इसमें कहा गया कि भारत में HDI की बढ़ोतरी में लगभग 0.03 से 0.12 वर्ष तक की गिरावट हो सकती है। इसके बाद नेपाल (0.02–0.09 वर्ष) और वियतनाम (0.02–0.07 वर्ष) का स्थान है जबकि चीन पर प्रभाव अपेक्षाकृत कम (0.01–0.05 वर्ष) रहने का अनुमान है। इस रिपोर्ट के अनुसार, भारत अपनी 90 प्रतिशत से अधिक तेल जरूरतों के लिए आयात पर निर्भर है और कच्चे तेल का 40 प्रतिशत से ज्यादा और एलपीजी का 90 प्रतिशत आयात पश्चिम एशिया से करता है। इसके अलावा, उर्वरक आयात का 45 प्रतिशत से अधिक हिस्सा भी इसी क्षेत्र से आता है।
एनर्जी, फूड सिक्योरिटी और खेती पर बुरा असर
अरब क्षेत्र में जारी संघर्ष के कारण ऊर्जा विकल्पों पर भी असर पड़ा है। एलएनजी कीमतें बढ़ने से भारत समेत कई देशों ने कोयला आधारित बिजली उत्पादन पर निर्भरता बढ़ाई है। व्यापार और सप्लाई चेन पर असर को लेकर रिपोर्ट में कहा गया है कि 36 में से 25 देशों में मालभाड़ा शुल्क, युद्ध जोखिम बीमा, मार्ग परिवर्तन और देरी जैसी समस्याएं देखी गई हैं। भारत के कुल निर्यात का 14 प्रतिशत और आयात का 20.9 प्रतिशत पश्चिम एशिया से जुड़ा है। रिपोर्ट में कहा गया है कि बांग्लादेश पर भी असर पड़ा है जहां खाड़ी देशों की विमानन कंपनियों ने उड़ानें रद्द कर दीं और भारत-बांग्लादेश से भेजा गया माल फंस गया।
खाद्य सुरक्षा पर प्रभाव के बारे में रिपोर्ट में कहा गया कि भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल और फिलीपींस जैसे देशों में रेमिटेंस (विदेश से अपने देश में पैसे भेजने) में कमी के कारण खाद्य सुरक्षा पर दबाव बढ़ सकता है। भारत के लिए यह समय विशेष रूप से संवेदनशील है क्योंकि किसी भी लंबे व्यवधान का असर खरीफ (मानसून फसल) की तैयारी पर पड़ सकता है जो जून में शुरू होती है। रिपोर्ट में कहा गया है कि यूरिया का भंडार 61.14 लाख टन है, जो कुछ समय की राहत देता है लेकिन लंबे समय तक व्यवधान रहने पर पर्याप्त नहीं होगा।
यह भी पढ़ें: होर्मुज पर कंट्रोल ईरान का, अमेरिका कैसे करेगा नाकेबंदी? ट्रंप का प्लान समझिए
रेमिटेंस भी हो रहा कम
इसमें कहा गया कि खाड़ी देशों के श्रम बाजार और रेमिटेंस पर निर्भरता कई देशों के लिए महत्वपूर्ण है और भारत का इसमें सबसे बड़ा हिस्सा है। विदेश मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, अक्टूबर 2024 तक खाड़ी सहयोग परिषद (जीसीसी) के देशों में 93.7 लाख भारतीय रह रहे थे जो भारत में आने वाले कुल पैसों का 38-40 प्रतिशत भेजते हैं। आतिथ्य, खाद्य प्रसंस्करण, निर्माण सामग्री, इस्पात आधारित उद्योग और रत्न-हीरा क्षेत्र की छोटी कंपनियों को उच्च लागत, सप्लाई की कमी और ऑर्डर में देरी या रद्द होने जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है।
इन परिस्थितियों का असर रोजगार, काम के घंटे और व्यवसाय की निरंतरता पर पड़ सकता है विशेषकर असंगठित एवं प्रवासी श्रमिकों पर। भारत में मेडिकल उपकरणों से जुड़े माल की लागत भी होर्मुज ब्लॉक होने के कारण लगभग 50 प्रतिशत तक बढ़ने की आशंका है जबकि दवाओं के थोक दाम पहले ही 10-15 प्रतिशत बढ़ चुके हैं। संयुक्त राष्ट्र की सहायक महासचिव और एशिया-प्रशांत क्षेत्र के लिए यूएनडीपी की क्षेत्रीय निदेशक कन्नी विग्नराजा ने कहा कि इस स्थिति के बीच देशों के पास दीर्घकालिक मजबूती बढ़ाने के अवसर भी हैं जैसे अनुकूल सामाजिक सुरक्षा, मजबूत स्थानीय और रीजनल सप्लाई चेन और विविध ऊर्जा और फूड चेन विकसित करना।
और पढ़ें
Copyright ©️ TIF MULTIMEDIA PRIVATE LIMITED | All Rights Reserved | Developed By TIF Technologies
CONTACT US | PRIVACY POLICY | TERMS OF USE | Sitemap


