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डच डिजीज क्या है जिसने वेनेजुएला को शिखर से शून्य तक पहुंचाया?

वेनेजुएला की स्थिति को अर्थव्यवस्था में ‘डच डिजीज’ के नाम से जाना जाता है। तेल भंडार होने के बावजूद देश इस हालत में कैसे पहुंचा आइए समझते हैं।

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प्रतीकात्मक तस्वीर, Photo credit- AI Sora

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3 जनवरी की सुबह डोनाल्ड ट्रंप ने एक ऐसी जानकारी दी, जिससे पूरी दुनिया में हलचल मच गई। उन्होंने कहा कि अमेरिकी सेना ने वेनेजुएला पर बड़े स्तर पर सैन्य कार्रवाई की है। इस दौरान वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी सिलिया फ्लोरेस को हिरासत में लेकर देश से बाहर भेज दिया गया। इसके बाद यह सवाल तेजी से उठने लगा कि वेनेजुएला की हालत इतनी खराब क्यों हो गई। अगर सैन्य हमले को अलग रख दें तो सवाल यह भी है कि तेल के विशाल भंडार होने के बावजूद देश की अर्थव्यवस्था इस स्थिति तक कैसे पहुंची। इसका जवाब अर्थशास्त्र के एक शब्द में छिपा है, जिसे ‘डच डिजीज’ कहा जाता है।

 

डच डिजीज वेनेजुएला की कमजोर अर्थव्यवस्था को दर्शाता है, जिसने देश को कई तरह से नुकसान पहुंचाया। सरकार की खराब व्यवस्था, भ्रष्टाचार और गलत नीतियों ने हालात को और बिगाड़ दिया, जिससे यह समस्या पूरे देश के लिए एक अभिशाप बन गई।

 

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डच डिजीज क्या है?

'डच डिजीज' अर्थशास्त्र का एक ऐसा सिद्धांत है जो बताता है कि कैसे किसी देश को मिली एक बड़ी प्राकृतिक संसाधन की खोज उसकी अर्थव्यवस्था के लिए अभिशाप बन सकती है।  जैसे, वेनेजुएला इसका सबसे सटीक और दर्दनाक उदाहरण है। इस शब्द का जन्म 1960 के दशक में हुआ था, जब नीदरलैंड में प्राकृतिक गैस के विशाल भंडार मिले थे। जब किसी देश को तेल या गैस जैसा संसाधन मिलता है तो वह उसका भारी निर्यात शुरू करता है। विदेशी मुद्रा (जैसे डॉलर) देश में आती है जिससे उस देश की अपनी मुद्रा की वैल्यू बहुत बढ़ जाती है।

 

मुद्रा महंगी होने के कारण उस देश की अन्य चीजें (जैसे अनाज या मशीनें) विदेश के लिए बहुत महंगी हो जाती हैं। नतीजा यह होता है कि खेती और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर बर्बाद हो जाते हैं। देश की अपनी फैक्ट्रियां बंद हो जाती हैं और वह सुई से लेकर दवाइयों तक के लिए विदेश पर निर्भर हो जाता है।

वेनेजुएला का शिखर से शून्य तक का सफर

वेनेजुएला दुनिया में सबसे बड़े तेल भंडार वाला देश है। एक समय वह दक्षिण अमेरिका का सबसे अमीर देश था लेकिन आज यहां लोग बुनियादी चीजों के लिए तरस रहे हैं। 1950 से 1980 के बीच वेनेजुएला की गिनती दुनिया के सबसे समृद्ध देशों में होती थी। जब 2000 के दशक में कच्चे तेल की कीमतें आसमान छू रही थीं, तब वेनेजुएला के पास बेहिसाब पैसा आया। तत्कालीन राष्ट्रपति ह्यूगो शावेज ने इस पैसे को बड़े पैमाने पर सब्सिडी और सामाजिक कल्याण में खर्च किया।

पतन की शुरूआत

इसके बाद वेनेजुएला 'डच डिजीज' का शिकार हो गया। वेनेजुएला अपनी कमाई का 95% से ज्यादा हिस्सा सिर्फ तेल से कमाने लगा। उन्होंने खेती और अन्य उद्योगों को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया। सरकार ने तेल कंपनी (PDVSA) का पैसा रिसर्च और मशीनों में लगाने के बजाय राजनीतिक कामों में खर्च किया। कुशल इंजीनियरों की जगह वफादारों को भर दिया गया, जिससे तेल का उत्पादन गिरने लगा।


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सरकार ने चीजों की कीमतें इतनी कम तय कर दीं कि स्थानीय व्यापारियों को सामान बनाना घाटे का सौदा लगने लगा। फैक्ट्रियां बंद हो गईं और वेनेजुएला हर छोटी चीज आयात करने लगा। 2014 के बाद जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें गिरीं तो वेनेजुएला की अर्थव्यवस्था को तगड़ा झटका लगा और देश की इकोनॉमी अचानक से  ताश के महल की तरह ढह गई। 

 

तेल से देश की कमाई आधी रह गई लेकिन सरकार की मुफ्त योजनाएं जारी थीं। इससे देश में हाइपरइन्फ्लेशन का दौर आ गया। सरकार ने पैसा छापना शुरू किया, जिससे मुद्रा की वैल्यू खत्म हो गई। स्थिति यह हो गई कि एक किलो चिकन खरीदने के लिए बैग भरकर नोट ले जाने पड़ते थे। भूख और बदहाली के कारण लाखों लोग देश छोड़कर भाग गए।


दुनिया में वेनेजुएला जैसे कम उदाहरण है। कोई भी देश केवल एक प्राकृतिक संसाधन पर निर्भर नहीं रहता। डच डिजीज से बचने का एकमात्र तरीका  'आर्थिक विविधीकरण' है। इसके भी कई उदाहरण है जैसे नॉर्वे या सऊदी अरब कर रहे हैं।


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