जब कोई बड़ा बिजनेस ग्रुप होता है तो उसकी कई अलग-अलग कंपनियां होती हैं। कानूनी कागज पर ये सभी कंपनियां भले ही अलग हों लेकिन आपस में इनका पैसों का लेन-देन, कर्ज और एक-दूसरे के लिए गारंटी देना आम बात है। ऐसे में बड़ा सवाल यह उठता है कि अगर ग्रुप की एक कंपनी डूबी तो क्या बाकी कंपनियों पर भी इसका असर पड़ेगा?
इसी सिलसिले में हाल ही में भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने बड़े वित्तीय संस्थानों (NBFCs) की निगरानी के संबंध में नियमों को साफ किया है। उनका कहना है कि बड़ी NBFCs और टाटा संस जैसी कंपनियां अपने ग्रुप की बैलेंस शीट का इस्तेमाल करती हैं। इसलिए उन्हें रजिस्टर और लिस्ट होना होगा।
दरअसल, टाटा संस ने अपना भारी-भरकम कर्ज चुकाने के बाद RBI से अपना रजिस्ट्रेशन रद्द करने की मांग की थी। ताकि उसे शेयर बाजार में लिस्ट होने से छूट मिल सके। RBI ने यह कहकर उसकी अर्जी खारिज करते हुए साफ कह दिया है कि सिर्फ कर्ज चुका देने से नियमों से छूट नहीं मिलेगी।
यह भी पढ़ें: बढ़त के साथ शेयर मार्केट की शुरुआत, बैंकएक्स में गिरावट; सोना-चांदी का भाव जानिए
जानें मामला कहां फंसता है?
यह पूरा मामला टाटा संस के संदर्भ में चर्चा का विषय बना हुआ है। यह टाटा ग्रुप की मुख्य होल्डिंग कंपनी है। RBI ने सितंबर 2026 में टाटा संस की उस अर्जी को खारिज कर दिया जिसमें उसने अपना रजिस्ट्रेशन रद्द करने की मांग की थी। RBI ने साफ कहा कि कंपनी को शेयर बाजार में लिस्ट होने से जुड़े नियमों का पालन करना ही होगा। आखिर RBI की सख्ती की असली वजह है क्या?
इस मामले में सबसे पहले यह समझना बहुत जरूरी है कि होल्डिंग कंपनी क्या होती है। होल्डिंग कंपनी वह कंपनी होती है जो खुद कोई सामान नहीं बनाती या सीधे बाजार में उत्पाद नहीं बेचती बल्कि दूसरी कंपनियों में अपनी हिस्सेदारी रखती है। साथ ही उनके बड़े फैसले तय करती है। टाटा संस भी टाटा ग्रुप की ऐसी ही मुख्य कंपनी है।
कानूनी तौर पर हर कंपनी की अपनी पहचान होती है इसलिए एक कंपनी का कर्ज अपने-आप दूसरी कंपनी का कर्ज नहीं बन जाता। मामला तब फंसता है जब ये कंपनियां आपस में एक-दूसरे को पैसा देती हैं। एक-दूसरे के कर्ज की गारंटी लेती हैं या मिलकर बैंक से लोन उठाती हैं। ऐसी स्थिति में एक की परेशानी दूसरे के लिए मुसीबत बन सकती है।
कर्ज चुका दिया फिर RBI क्यों छोड़ नहीं रहा?
टाटा संस ने वित्त वर्ष 2023-24 में लगभग 21,813 करोड़ रुपये का अपना कर्ज चुका दिया था। इसके बाद कंपनी ने RBI से गुहार लगाई कि जब हमारा कर्ज ही नहीं बचा तो हमें 'कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी' (CIC) के रजिस्ट्रेशन से छूट दी जाए। साथ ही शेयर बाजार में लिस्ट होने की शर्त से भी बाहर किया जाए। इस पर RBI का नजरिया बिल्कुल अलग है।
RBI का मानना है कि किसी कंपनी का अपना व्यक्तिगत कर्ज जीरो हो जाना और उसका पूरी वित्तीय व्यवस्था से अलग हो जाना दो अलग बातें हैं। अगर होल्डिंग कंपनी भले ही कर्जमुक्त हो लेकिन उसके जरिए ग्रुप की बाकी कंपनियां अगर भारी पैसा उठा रही हैं तो पूरे सिस्टम पर जोखिम बना रहता है। यही वजह है कि RBI केवल यह नहीं देखता कि कंपनी ने खुद कितना उधार लिया है। बल्कि यह भी देखता है कि उसका पूरा नेटवर्क कितना बड़ा और कितना जोखिम भरा है।
नियमों में क्या बदलाव आया है?
RBI ने बड़ी NBFCs पर शिकंजा कसने के लिए पहले ही 2022 में एक ढांचा बनाया था। इसके तहत तय हुआ था कि जो कंपनियां सबसे ऊंची निगरानी वाली श्रेणी यानी 'अपर लेयर' में आती हैं। उन्हें तीन साल के भीतर शेयर बाजार में लिस्ट होना होगा। पहले इन कंपनियों की पहचान के लिए प्वाइंट्स का एक फार्मूला इस्तेमाल होता था। लेकिन 2026 में RBI ने नियमों को और स्पष्ट करते हुए तय कर दिया कि 1 लाख करोड़ रुपये या उससे अधिक की संपत्ति वाली NBFCs सीधे 'अपर लेयर' में आएंगी।
यह भी पढ़ें: खुलते ही शेयर मार्केट क्रैश, सेंसेक्स-निफ्टी फिसला; सोना-चांदी का भाव जानिए
उन्हें हर हाल में लिस्टिंग के नियमों का पालन करना होगा। टाटा संस चूंकि इसी दायरे में आती है इसलिए उसे बाजार में उतरना ही होगा। RBI का संदेश एकदम साफ है। कंपनी चाहे जितनी बड़ी और प्रतिष्ठित क्यों न हो, नियम सबके लिए एक जैसे हैं और पारदर्शिता के साथ कोई समझौता नहीं किया जाएगा।