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कल बंगाल के चुनाव नतीजे, BJP और TMC में सीधी भिड़ंत; समझिए 5 समीकरण

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजे सोमवार यानी 4 मई को आएंगे। दोपहर तक साफ हो जाएगा कि कोलकाता की गद्दी पर अगले पांच साल कौन राज करेगा। मुख्य मुकाबला टीएमसी और बीजेपी के बीच है, लेकिन छोटे दलों ने मुकाबले को दिलचस्प बना दिया है।

West Bengal Elections

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव। (AI-generated image)

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पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजे आज यानी 4 मई को आएंगे। इस बार का चुनाव बेहद अहम है। बीजेपी पहली बार विपक्ष से सत्ता तक पहुंचने के प्रयास में है। वहीं ममता बनर्जी को पिछले डेढ़ दशक में सबसे बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। टीएमसी की हार और जीत राष्ट्रीय स्तर पर ममता बनर्जी की भूमिका का निर्धारण करेगी। वंगाल की सियासत में वाम दल लगभग-लगभग नेपथ्य में जा चुके हैं। अबकी बार का चुनाव उनके उदय का भी गवाह बन सकता है। आइये जानते हैं बंगाल चुनाव से जुड़े पांच अहम बातें...

क्या टीएमसी दिखा पाएगी करिश्मा?

2021 विधानसभा चुनाव में टीएमसी को प्रदेश की कुल 294 सीटों में से 215 पर जीत मिली थी। बीजेपी ने पहली बार 77 सीटों पर कब्जा जमाया था। इससे पहले यहां उसके अधिकतम विधायकों की संख्या 3 थी। राष्ट्रीय सेक्युलर मजलिस पार्टी और निर्दलीय को एक-एक सीट पर जीत मिली थी। अगर वोट शेयर की बात करें तो टीएमसी को सबसे अधिक 48.5 और बीजेपी को 38.4 फीसद वोट मिले थे।

 

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अबकी पार्टी का दावा है कि वह 200 से अधिक सीट जीतेगी। मगर पिछले डेढ़ दशक में उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती खड़ी हुई है। टीएमसी अलग होकर हुमायूं कबीर ने अलग पार्टी बना ली है। ऐसे में पार्टी के सामने अपने मुस्लिम वोट बैंक को भी बचाने की चुनौती है।

पिछले प्रदर्शन से बीजेपी उत्साहित

2021 विधानसभा चुनाव से पहले बंगाल में बीजेपी का खास जनाधार नहीं था। मगर पिछले चुनाव में बीजेपी ने अपनी सियासी धमक बेहद मजबूती से महसूस करवाई। पार्टी 3 से सीधे 77 सीटों तक पहुंच गई। पिछले चुनाव के परिणाम से बीजेपी नेता खासा उत्साहित हैं। उन्हें भरोसा है कि पार्टी बहुमत के आंकड़ों को पाने में सफल होगी। बंगाल में पहले कांग्रेस और वापदल मुख्य विपक्षी दल होते थे। अब उनकी जगह बीजेपी मुख्य विपक्षी दल है।

 

उत्तरी बंगाल बीजेपी का गढ़ है। पार्टी अधिकांश सीटें यही जीती थीं। इन सीटों पर पहले चरण में मतदान हो चुका है। पार्टी के सामने चुनौती यह है कि उसे अपने गढ़ को बचाना होगा। इसके अलावा दक्षिण बंगाल में अपना प्रभाव दिखाना होगा, क्योंकि यह टीएमसी का गढ़ है।

कांग्रेस और वाम दल के सामने अस्तित्व का सवाल

एक समय ऐसा था कि पश्चिम बंगाल में कांग्रेस का दबदबा था। बाद में वापदलों ने अपनी पकड़ मजबूत बनाई और दशकों तक शासन किया। 2011 में ममता बनर्जी ने बंगाल की सियासत से वाम दलों की विदाई की और आज तक सत्ता में काबिज हैं। 2011 में कांग्रेस और वाम दलों ने गठबंधन में चुनाव लड़ा था। मगर सफलता टीएमसी को मिली थी। अब 15 साल बाद दोनों दलों के सामने अपनी मौजूदगी दर्ज कराने और प्रभाव बचाने की चुनौती है। मु्स्लिम बहुल सीटों पर कांग्रेस ने खूब पसीना बहाया है। अगर यहां कांग्रेस को समर्थन मिलता है तो इसका खामियाजा सीधे टीएमसी को मिलेगी।

 

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मुस्लिम वोट बंटा तो क्या होगा?

2021 में फुरफुरा शरीफ के मौलवी अब्बास सिद्दीकी ने इंडियन सेकुलर फ्रंट की स्थापना की। बीजेपी, टीएमसी और वामदलों के मुकाबले की खातिर इसकी स्थापनी की गई। पार्टी अनुसूचित जाति और मुस्लिम समुदायों के मुद्दों को अहमियत देती है। अब्बास सिद्दीकी के भाई नवसाद सिद्दीकी ने 2021 में भंगर से विधानसभा चुनाव जीता था। दूसरी तरफ टीएमसी से निलंबित विधायक हुमायूं कबीर ने बाबरी मस्जिद की नींव रखकर नई बहस छेड़ दी। इन दोनों दलों का फोकस मुस्लिम वोट बैंक पर है। अगर मुस्लिम वोट झिटका तो टीएमसी को नुकसान उठाना पड़ सकता है। ओवैसी की पार्टी भी चुनाव मैदान में है। उसका भी लक्षित वोट मुस्लिम समुदाय ही है। 

क्या अपनी सीट बचा पाएगी ममता?

सीएम ममता बनर्जी 2011 से भवानीपुर विधानसभा सीट से विधायक हैं। मगर उनके सामने अबकी बार सुवेंदु अधिकारी की चुनौती है। बीजेपी ने अधिकारी को नंदीग्राम के अलावा भवानीपुर सीट से भी उतारा है। पिछले चुनाव में सुवेंदु ने ममता बनर्जी को नंदीग्राम से 1900 वोटों के अंतर से हराया था।


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