कहीं 135 तो कहीं 211, पुडुचेरी में एक-एक बूथ से पलट जाते हैं चुनाव के नतीजे
पुडुचेरी में कई विधानसभा सीटें हर बार ऐसी होती हैं जिन पर हार-जीत का अंतर बेहद कम होता है। यही सीटें सरकार बनाने में निर्णायक साबित होती हैं।

पुडुचेरी में बेहद रोचक है चुनाव, Photo Credit: Khabargaon
केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी में विधानसभा की सिर्फ 30 सीटें हैं। सरकार बनाने के लिए 16 सीटों की जरूरत है और पिछले कई चुनावों से यह देखा जा रहा है कि सत्ता पर काबिज गठबंधन मामूली अंतर से कुछ सीटें हारता है और सरकार पलट जाती है। पुडुचेरी के चुनाव में हार-जीत का अंतर इतना कम होता है कि निर्दलीय उम्मीदवार तय कर देते हैं कि किसकी सरकार बनेगी और कौन सत्ता से बाहर होगा। 2021 के चुनाव में भी 9 सीटें ऐसी थीं जिन पर जीत और हार का अंतर 2000 से भी कम था। कम अंतर वाली इन सीटों में से 4 पर निर्दलीय, 3 पर एनडीए और 2 पर डीएमके-कांग्रेस गठबंधन को जीत मिली थी। बाद में कई निर्दलीय विधायकों ने एनडीए गठबंधन की मदद भी की।
2021 के विधानसभा चुनाव में पुडुचेरी की 30 विधानसभा सीटों में से सबसे ज्यादा 10 सीटों पर ऑल इंडिया एन आर कांग्रेस (AINRC) को मिली थीं। AINRC की सहयोगी भारतीय जनता पार्टी (BJP) को 6, कांग्रेस को 2 और कांग्रेस की सहयोगी द्रविड़ मुनेत्र कझकम (DMK) को 6 सीटों पर जीत मिली। इस तरह AINRC-BJP गठबंधन को 16 सीटें मिलीं और उसने सरकार बनाई। कुल 6 निर्दलीय जीते। कांग्रेस-DMK के गठबंधन को सिर्फ 8 सीटें मिली थीं तो वह सरकार बनाने की रेस से बाहर थी।
अब अगर 2016 के चुनाव की बात करें तो कांग्रेस को अकेले 15 सीटों पर जीत मिली थी। यानी 2016 में 15 सीटें जीतने वाली कांग्रेस 2021 में सिर्फ 2 सीटों पर आ गई। AIADMK को 2021 में एक भी सीट नहीं मिली जबकि 2016 में उसके 4 विधायक जीते थे। निर्दलीयों की संख्या 2016 में सिर्फ 1 थी और 2021 में 6 हो गई। AINRC को 2016 में 8 सीटें मिली थीं और 2021 में उसे 10 सीटों पर जीत मिली और वह सत्ता में आ गई। 2011 में नतीजे 2016 के ठीक उलट थे। तब AINRC को 15 सीटें मिली थीं और कांग्रेस को 7 सीटों पर जीत मिली थी। तब AIADMK को 5 और DMK को दो सीटों पर जीत मिली थी।
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ये नतीजे दिखाते हैं कि बस कुछ ही सीटों पर नतीजे बदलते ही पुडुचेरी में सत्ता बदल जाती है। यही वजह है कि पुडुचेरी में असली लड़ाई पार्टी या गठबंधनों की नहीं, एक-एक सीट पर उम्मीदवारों और समीकरणों की है। आइए इसे और विस्तार से समझते हैं।
2021 में कहां हो गया था खेल?
पुडुचेरी की 30 में से 7 सीटें ऐसी थीं जहां जीत और हार का अंतर 1000 वोट से भी कम था। इन 7 में से तीन उम्मीदवार निर्दलीय थे। एक की जीत का अंतर 819 वोट, दूसरे की जीत का अंतर 934 वोट और तीसरे की जात का अंतर 655 वोट था। दो सीटों पर AINRC-BJP गठबंधन को जीत मिली। AINRC के उम्मीदवार ने सिर्फ 135 वोटों के अंतर से चुनाव जीता और बीजेपी के उम्मीदवार को 496 वोटों से जीत मिली।
कम अंतर वाली 7 में से 2 सीटों पर DMK-कांग्रेस गठबंधन को जीत मिली थी। दो में से एक सीट पर कांग्रेस 300 वोटों से जीती और दूसरी सीट पर डीएमके को 211 वोटों से जीत मिली थी। अगर 1000 से 2000 वोटों के बीच का अंतर देखें तो ऐसी 2 सीटें थीं। इनमें से एक सीट पर बीजेपी के उम्मीदवार को 1880 वोटों से जीत मिली और दूसरी पर निर्दलीय उम्मीदवार शिवा को 1380 वोटों से जीत मिली।
6 सीटें ऐसी थीं जिन पर जीत और हार का अंतर 2 हजार से 3 हजार के बीच था। इसमें से 3 सीटों पर AINRC, 2 पर निर्दलीय और 1 पर बीजेपी को जीत हासिल हुई। 2 सीटें ऐसी थीं जिन पर 3 से 4 हजार का अंतर था। इसमें से एक सीट पर बीजेपी और दूसरी पर AINRC को जीत हासिल हुई।
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कुल मिलाकर देखें तो कम अंतर वाली 17 सीटों में से BJP-AINRC गठबंधन को 9 सीटों पर जीत मिली और 5 सीटों पर निर्दलीय उम्मीदवार जीते। यह दिखाता है कि अगर इन सीटों पर वोट नहीं बंटते और कांग्रेस-DMK गठबंधन इन सीटों को जीतने में कामयाब रहता तो वह सरकार बनाने की स्थिति में भी आ सकता था। यही हाल पहले के चुनावों में भी होता रहा है। यही वजह है कि सत्ता में रहने वाली पार्टी की सीटें तेजी से कम हो जाती है और वह सरकार से बाहर हो जाती है।
इस बार क्या हैं समीकरण?
कांग्रेस-DMK गठबंधन ने सीटों का बंटवारा किया तो कांग्रेस के कई नेता बागी होकर चुनाव में उतर गए। नतीजा यह हुआ कि कांग्रेस को अपने 6 बागी नेताओं को पार्टी से निलंबित करना पड़ा। दूसरी तरफ BJP, AIADMK और AINRC का गठबंधन है। बीजेपी ने जोर देकर जोस मार्टिन की पार्टी को भी इस गठबंधन में शामिल करवा लिया है। पिछली बार जीते 6 निर्दलीय विधायकों में से तीन विधायक इस बार कांग्रेस-DMK गठबंधन के उम्मीदवार बन गए हैं। एक विधायक इस बार चुनाव नहीं लड़ रहे हैं। बाकी के एक-एक उम्मीदवार TVK और NMK के उम्मीदवार हैं।
थलपति विजय के उतरने और कुछ बागियों के मैदान में आ जाने से कई सीटों पर फिर से त्रिकोणीय लड़ाई है। यही वजह है कि हर सीट पर हर गठबंधन जोर लगा रहा है। ऐसे में पुडुचेरी का ही ऐसा चुनाव है जिसके बारे में कुछ भी स्पष्ट तौर पर नहीं कहा जा सकता है। जो पार्टी या उम्मीदवार अपने बूथों को मजबूत रख पाएगी और एक-एक सीट जीतने के लिए आखिरी वक्त तक जद्दोजहद कर पाएगी, उसे ही जीत मिलेगी।
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