जिन्हें बाहरी बताती थी TMC, उन्होंने ममता के गढ़ में किया खेला, यह हुआ कैसे?
ममता बनर्जी साल 2011 से पश्चिम बंगाल की सत्ता में डटी थीं। उनकी सियासी जमीन कैसे दरकी, आइए समझते हैं।

पश्चिम बंगाल की एक जनसभा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और सुवेंदु अधिकारी। फाइल फोटो। Photo Credit: PTI
पश्चिम बंगाल, श्यामा प्रसाद मुखर्जी की मातृभूमि है। भारतीय जनता पार्टी जिन्हें अपना आदर्श मानती है, जिनके 'एक ध्वज, एक देश, एक संविधान' वाले नारे पर भारतीय जनता पार्टी की राजनीति टिकी है, उसी पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी दशकों तक हाशिए पर रही। भारतीय जनता पार्टी, श्यामा प्रसाद मुखर्जी के 'नहीं चलेगा एक देश में दो विधान, दो प्रधान और दो निशान', सपने को तो पूरा कर चुकी है, अब उन्हें पार्टी ने सही अर्थों में श्रद्धांजलि दी है।
कभी जवाहर लाल नेहरू की अंतरिम सरकार में उद्योग एंव आपूर्ति मंत्री रहे श्याम प्रसाद मुखर्जी ने 21 अक्तूबर 1951 में जनसंघ की नींव रखी थी। भारतीय जनता पार्टी की मूल आत्मा, जनसंघ है, जिसकी नींव 6 अप्रैल 1980 को पड़ी। 23 जून 1953 को कश्मीर में उनकी संदिग्ध मौत हुई थी। पश्चिम बंगाल, बीजेपी के 'आदर्श पुरुष' की जमीन रही लेकिन यहीं पार्टी सबसे कमजोर रही, सत्ता नहीं मिली।
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बंगाल पर दशकों से रही है BJP की नजर
कभी कांग्रेस, कभी लेफ्ट, कभी तृणमूल कांग्रेस, बीजेपी की हालत हमेशा यहां हाशिए पर पड़े किसी सियासी दल की तरह रही। अब पश्चिम बंगाल में 9 मई को सरकार बनने जा रही है। वामपंथी पार्टियों का 34 साल शासन रहा, अब हाशिए पर हैं। 294 विधानसभाओं में से सिर्फ 2 सीटें ऐसी हैं, जहां कांग्रेस के प्रत्याशी जीते है। तृणमूल कांग्रेस गिरते-पड़ते, 80 विधानसभा सीटों को जीतने में कामयाब हुई है। बीजेपी के पास 206 विधायक हैं। बीजेपी ने कैसे ममता बनर्जी को, उन्हीं के गढ़ में घुसकर हराया, आइए समझते हैं-
नरेंद्र मोदी युग की शुरुआत और BJP की जोर-आजमइश
साल 2013। गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी का सफर, भारत की ओर मुड़ा। मुख्यमंत्री थे, उन्हें बीजेपी ने दल का नेता चुनाव, प्रधानमंत्री उम्मीदवार घोषित किया। देश में मोदी की लहर चल गई। साल 2014 में हुए लोकसभा चुनाव में बीजेपी प्रंचड बहुमत से सत्ता में आई। 2019 और 2024 के चुनाव में भी बीजेपी को जीत मिली। इस जीत में पश्चिम बंगाल भेदने की शुरुआत हुई साल 2016 में।
2016, पहली कोशिश, करारी हार
साल 2016। ममता बनर्जी, 2011 में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री बनीं। ममता बनर्जी का बतौर मुख्यमंत्री दूसरा चुनाव था। तृणमूल कांग्रेस ने इस चुनाव में प्रचंड बहुमत हासिल किया। 211 विधानसभा सीटों पर TMC ने जीत हासिल की। कांग्रेस तब दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बनी 44 सीटें आईं। बीजेपी सिर्फ 3 सीट हासिल कर पाई। वह भी तब जब नरेंद्र मोदी अपनी पूरी पलटन के साथ बंगाल में उतर गए थे। लेफ्ट की सीटें भी बीजेपी से ज्यादा थीं, 26 विधायक चुने गए।
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हार से बीजेपी ने सब क्या लिया?
केंद्र में प्रंचड बहुमत से बैठे नरेंद्र मोदी और बीजेपी के नेतृत्व को यह बात सालती रही कि कैसे पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी सत्ता में बैठी हैं। वह बीजेपी सरकार को सीधी चुनौती देने लगीं, सांप्रदायिक बताने लगीं। नरेंद्र मोदी से लेकर अमित शाह तक से सार्वजनिक मंचों पर उलझने लगीं, केंद्रीय योजनाओं को नकारने लगीं। 2016 में मिले हार के सबक को बीजेपी ने सबक की तरह ही लिया।
ममता बनर्जी को सत्ता में रहे 10 साल हो गए। अगला चुनाव 2021 का था। बीजेपी दूसरी बार सत्ता में चुनकर आ गई थी। वह भी प्रचंड बहुमत से। बीजेपी ने इन 5 साल में अपना सारा जोर, पश्चिम बंगाल पर लगाया। तत्कालीन केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी से लेकर बीजेपी के तत्कालीन महासचिव कैलाश विजय वर्गीय तक पश्चिम बंगाल में डटे रहे। नतीजे चौंकाने वाले रहे। 3 सीट वाली बीजेपी ने ममता बनर्जी के किले में तगड़ी सेंध लगाई।
दूसरी कोशिश लेकिन नेता विपक्ष कुर्सी हथियाई
ममता बनर्जी, नंद्रीग्राम से चुनावी मैदान में उतरीं, उन्हें, उन्हीं के गढ़ में सुवेंदु अधिकारी ने हरा दिया। ममता बनर्जी को इस हार से इतनी बौखला गईं कि वह हर जगह कहने लगीं कि बीजेपी ने चुनाव में धांधली में की है, वह हार गईं थीं लेकिन हार मानने के लिए तैयार नहीं हुईं। बीजेपी ने इस साल असाधारण प्रदर्शन दिखाते हुए 77 सीटों पर जीत दर्ज की थी। ममता बनर्जी ने 215 सीटें हासिल कीं। 2014 की तुलना में 4 सीटें ज्यादा। इतनी ज्यादा सीटें कि 2026 में प्रचंड बहुमत के बाद भी बीजेपी यह आंकड़ा नहीं छू पाई। गौर करने वाली बात यह रही कि इससे पहले के चुनाव में जिस कांग्रेस के पास दहाई में सीटें थीं, वह गायब हो गई। लेफ्ट भी साफ हो गई।
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तीसरी कोशिश में साफ ही हो गई
बीजेपी, पश्चिम बंगाल में तीसरी कोशिश में कामयाब हुई। 294 विधानसभा सीटों में से बीजेपी ने 206 सीटें हासिल कीं। ममता बनर्जी, महज 80 सीटों पर सिमट गई। पिछले चुनाव में शून्य सीटों वाली कांग्रेस, 2 सीटों पर आ गई। लेफ्ट, बंगाल में अंतिम सांस गिन रहा है।
सिर्फ विधानसभा नहीं, लोकसभा चुनाव का भी खेल समझिए
पश्चिम बंगाल में कुल 42 विधानसभा सीटें हैं। 2014 में बीजेपी के पास सिर्फ 2 सीट थी, तृणमूल कांग्रेस के पास 34। सिर्फ 5 साल में बीजेपी ने जी तोड़ मेहनत की पार्टी ने 18 लोकसभा सीटों पर जीत हासिल की। तृणमूल कांग्रेस गठकर 22 सीटों पर आ गई। बीजेपी जीत से उत्साहित थी। दावा किया गया कि इस बार दीदी साफ हैं लेकिन 2024 में समीकरण बदले। तृणमूल कांग्रेस ने 29 सीटों पर जीत हासिल की तो बीजेपी सिर्फ 12 सीट पर गई। 6 सीटें कम हो गईं। तृणमूल कांग्रेस ने बीजेपी को हल्के में लिया।
ममता बनर्जी की विदाई कैसे हुई, इनसाइड स्टोरी
अंजन दत्ता, पश्चिम बंगाल की राजनीति पर नजर रखते हैं और पेशे से सुप्रीम कोर्ट में वकील हैं। कई सरकारी पैनलों में पश्चिम बंगाल सरकार की तरफ से स्टैंडिंग काउंसिल भी रहे हैं। उन्होंने कहा, 'पश्चिम बंगाल में तुष्टीकरण से इनकार किया नहीं जा सकता। त्योहारों पर सांप्रदायिक झड़प, संवेदनशील इलाकों में तनाव, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, हत्याएं, तृणमूल कांग्रेस सरकार में 15 सालों की उपलब्धि यही है। ममता बनर्जी से पूछ लिया जाए कि विकास कहां किया है, वह गिना नहीं पाएंगी। उनकी सारी राजनीति, मुस्लिम, केंद्र से भिड़ने और विपक्षियों के दमन पर रहा है। डेढ़ दशक, लंबा अंतराल होता है, जिससे जनता ऊब गई थी और परिवर्तन चाहती थी। बीजेपी की अपनी मेहनत कुछ भी हो, एक तथ्य यह भी है।'
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कट्टर प्रशासक, फिर कैसे बीजेपी ने सेंध लगाई, समझिए
- राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ: पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी पर हिंदुओं के दमन के आरोप संघ और बीजेपी की तरफ से लगाए गए। संघ, 1950 के दशक से ही पश्चिम बंगाल में संगठन स्तर पर काम कर रहा है। साल 2014 के बाद संघ ने अपनी गतिविधियां और बढ़ाईं। 2019 के बाद से संघ प्रमुख मोहन भागवत ने खुद कई बार दौरा किया। घुसपैठ, हिंदुत्व के मुद्दे उठाते रहे। संघ, भले ही खुद को सांस्कृतिक संगठन बताता रहा हो लेकिन संघ ने पश्चिम बंगाल में बीजेपी के लिए सधे कदमों से जमीन तैयार की।
- बीजेपी का मजबूत संघठन: बीजेपी ने आपसी कलह को ताक पर रखा। दिलीप घोष से लेकर समिक भट्टाचार्य तक, एक मंच पर आए। सुवेंदु अधिकारी नेता विपक्ष रहे लेकिन पूरी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ जमीन पर उतरी। ममता बनर्जी, जब स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन और वक्फ जैसे मुद्दों पर केंद्र को घेर रहीं थीं, बीजपी कार्यकर्ता घर-घर जाकर चुनाव प्रचार कर रहे थे। अमित शाह खुद 50 से ज्यादा रैलियां कर चुके थे, पीएम मोदी भी जमकर जनसभाएं करते थे। केंद्रीय मंत्रिमंडल, पश्चिम बंगाल में उतर गया था। ममता का ध्यान, SIR से आगे वह बढ़ ही नहीं पाईं।
- परिवारवाद का विरोध: ममता बनर्जी, पार्टी में अपनी कद का दूसरा नेता खड़ा ही नहीं कर पाईं। अभिषेक बनर्जी को वह पार्टी की कमान सौंप बैठीं, टिकट बंटवारे तक में उनकी दखल हो गई। कल्याण बनर्जी, महुआ मोइत्रा, डेरेक ओ ब्रायन जैसे नेता दरकिनार हुए और अभिषेक को पार्टी का महासचिव बनाया गया। यह मैसेज भी साफ गया कि तृणमूल कांग्रेस, परिवारवादी पार्टी है, जिसका हित, सिर्फ अपने परिवार तक सीमित है।
- सत्ता विरोधी लहर: बीजेपी, तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ माहौल बनाने में कामयाब हुई। ममता बनर्जी, 3 बार की मुख्यमंत्री रहीं लेकिन न राज्य में उद्योंगों की हालत ठीक हुई, न ही की कानून व्यवस्था दुरुस्त रही। आए दिन सांप्रदायिक दंगों ने भी ममता बनर्जी के खिलाफ माहौल बनाया। बीजेपी इसे भी भुनाने में कामयाब हो गई।
- मुद्दे से भटकीं ममता, सीट भी गंवाई, सत्ता भी: ममता बनर्जी उन मुद्दों पर लड़ रहीं थी, जिन पर बीजेपी, उन्हे घेर रही थी। उन्होंने नैरेटिव दिया कि अगर बंगाल में बीजेपी आई तो मछली-मांस खाने पर बैन लगेगा। अनुराग ठाकुर जैसे दिग्गज बीजेपी नेता जगह-जगह घूमकर मछली खाने लगे। महिलाओं के हक की आवाज उठाने का दावा करने वाली ममता को महिला आरक्षण पर बीजेपी ने बुरी तरह से घेरा। टीएमसी ने मनरेगा का पैसा न देने की बात की, जबकि केंद्र सरकार की कई योजनाओं को वह लगातार ठुकरा रहीं थीं। ये सारी बातें, ममता बनर्जी के खिलाफ चली गईं, चुनाव के नतीजे आए तो ममता बनर्जी सारा दोष, अब SIR और चुनाव आयोग पर मढ़ रहीं हैं।
- बाहरी वाला नैरेटिव भी फेल हुआ: बंगाल में ममता बनर्जी ने कहा बीजेपी सत्ता में आएगी तो गुजराती राज्य चलाएंगे। 2021 से ही विधानसभा में बीजेपी के कर्ता-धर्ता शुभेंदु अधिकारी हैं, राज्य में दिलीप घोष, सुकांता मजूमदार और सौमिक भट्टाचार्य जैसे नेता। इन लोगों को बीजेपी ने पूरी ताकत दी, क्षेत्र बांटे और ममता बनर्जी के इस नैरेटिव को भी धराशायी कर दिया। शुभेंदु का कद, पश्चिम बंगाल में ऐसे ही आंक सकते हैं कि वह लगातार, दो बार, ममता बनर्जी को उन्हीं के घर में हरा चुके हैं।
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और कौन सी वजहें रहीं जिम्मेदार?
ममता बनर्जी,राशन और शिक्षक भर्ती घोटाले को लेकर लगातार घिरी रहीं। कानून व्यवस्था का आलम यह था कि ED और CBI के अधिकारी, संदेशखाली में पीट दिए गए थे। मालदा, पश्चमी मेदनीपुर, हावड़ा, बर्धमान जैसी जगहों के दंगे भी गलत संदेश दे गए। आरजी कर मेडिकल कॉलेज रेप और हत्याकांड पर ममता बनर्जी के रुख ने भी लोगों में गलत संदेश दिया। ममता बनर्जी, 2026 में भी महिला आरक्षण के मुद्दे पर बीजेपी को घेरा, SIR पर घेरा, वक्फ पर घेरा। ममता बनर्जी को न महिलाओं का साथ मिला, न ही आम लोगों का। सिर्फ उन्हें उन्हीं सीटों पर जीत मिली है, जो अल्पसंख्यक बाहुल हैं।
अंग, बंग और कलिंग का सपना, जो 2026 में सच हुआ
अंग, बिहार है। बंग, पश्चिम बंगाल और कलिंग, ओडिशा। न तो बंग में बीजेपी थी न कलिंग में। कलिंग में 2 दशक से नवीन पटनायक मुख्यमंत्री थे, डेढ़ दशक से ममता बनर्जी बंग में। साल 2024 में हुए ओडिशा विधानसभा चुनावों में 2 दशक की पटनायक सरकार की विदाई हुई, बीजेपी सत्ता में आई। 2025 में विधानसभा चुनाव हुए, बीजेपी ने बिहार भी जीत लिया। अब बीजेपी का अंग, बंग और कलिंग का सपना पूरा हो गया।
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