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तमिलनाडु: मजबूरी या जरूरी, DMK-कांग्रेस गठबंधन में रहकर भी अलग-अलग कैसे?

कांग्रेस के साथ गठबंधन करने वाले स्थानीय छत्रप अब डर रहे हैं। बिहार से लेकर महाराष्ट्र तक, कांग्रेस भी मजबूत पार्टियों के हार की एक वजह बनी है।

MK Stalin

एमके स्टालिन। Photo Credit: PTI

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तमिलनाडु की राजनीति में द्रविड़ मुनेत्र कझगम (DMK) सत्ता में तो रहती है लेकिन न तो कांग्रेस को मंत्रिमंडल में शामिल करती है, न ही कांग्रेस के स्थानीय नेतृत्व को उभरने देती है। ऑल इंडिया द्रविड़ मुनेत्र कझगम (AIADMK) और कांग्रेस के अपने विचारकों को भी यही लगता है कि कांग्रेस, इस गठबंधन में अकारण है। एमके स्टालिन और उदयनिधि की एंटी हिंदी और और प्रो द्रविड़ियन राजनीति कांग्रेस के लिए भी सहज स्थिति नहीं है।

तमिलनाडु में DMK की एक कामयाबी यह है कि वह सेक्युलर प्रोग्रेसिव अलायंस (SPA) के साथ बीते 9 साल से एकजुट है। ये दल, काफी हद तक, एंटी हिंदी-हिंदुत्व, पेरियार और द्रविड़ राजनीति पर एक जैसी विचारधारा रखते हैं। मुख्यमंत्री एमके स्टालिन हों या उनके बेटे उदयनिधि स्टालिन, दोनों के सनातन धर्म और हिंदुत्व पर विचार कांग्रेस को असहज कर जाते हैं।    

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DMK के पास कांग्रेस का काट क्या है?

कांग्रेस के साथ गठबंधन में रहने और संख्या बल में मजबूत रहने के बाद भी DMK कांग्रेस को वह दर्जा कभी नहीं देती, जिस दर्जे की हकदार, दूसरे गठबंधनों में रहने वाली पार्टियां होती हैं। बिहार को ही देख लीजिए। उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी राष्ट्रीय लोक मंच के सिर्फ 4 विधायक है। जेडीयू और बीजेपी के पास बहुमत है, फिर भी मंत्रिमंडल में जगह मिलती है। कांग्रेस 20 से ज्यादा सीटें होने के बाद भी मंत्रिमंडल में जगह नहीं पाती है। 

चुनाव से पहले छोटे दलों को भाव क्यों देती है DMK?

क्षेत्रीय दलों के साथ डीएमके की वैचारिक समता है। तमिलनाडु आर्य बनाम द्रविड़ की बहस में दशकों से उलझा है। सभी घटकों के बीच साझा हिंदुत्व-विरोधी वैचारिक जुड़ाव है। तमिलनाडु में 23 अप्रैल को चुनाव हैं, लेकिन इस बार गठबंधन को लेकर पेच थोड़ा फंस गया है।   

क्या कांग्रेस पर DMK रुख बदल रही है?

DMK कांग्रेस को गठबंधन में 3 सीट ज्यादा देने के लिए तैयार हुई है। राज्यसभा की भी एक एक सीट दी है। कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व की आलोचना एक तरफ होती रही, कांग्रेस ने DMK की इस मन:स्थिति को भांप लिया था कि पार्टी, उपेक्षा करती है। 

कांग्रेस ने अपने गठबंधन में शामिल होने के लिए सुपरस्टार विजय की पार्टी तमिलगा वेट्री कझगम के साथ जाने की कोशिश की। साल 2019 में जैसे एमके स्टालिन ने राहुल गांधी को प्रधानमंत्री पद का दावेदार बता दिया था, वैसे ही राहुल गांधी की तरफ से भी गठबंधन की तकरार खत्म करने की कोशिश की गई। दिलचस्प बात है कि इसके बाद भी कांग्रेस, डीएमको को बड़ी भूमिका देने से बच रही है। 

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DMK छोटे दलों पर दबाव बना रही है?

DMK कांग्रेस की जिद में कांग्रेस की बात तो मान रही है लेकिन कांग्रेस के खाते की सीटें, सहयोगियों से छीन रही है। CPI, CPI (M), विदुथलाई चिरुथाइगल काची (VCK) और ADMK ने 2017 में डीएमके के साथ गठबंधन किया था। यह गठबंधन, आज भी है। केंद्रीय योजनाओं, बीजेपी, हिंदी राष्ट्रवाद पर इन दलों के सुर एक जैसे है।
 

अभी तक सीट शेयरिंग का प्लान क्या है? 

तमिलनाडु विधानसभा में कुल 234 सीटें हैं। इन सीटों पर कांग्रेस को SPA गठबंधन में 28 सीटें मिली हैं, CPI 5 सीटों पर प्रत्याशी उतारेगी, MDMK को 4 सीट मिली है, IUML को 2 सीटें दी गई हैं। शेष सीटों पर डीएमके ही चुनाव लड़ेगी।  तमिलागा वाझवुरीमाई काची के अध्यक्ष टी वेलमुरुगन रविवार को गठबंधन से बाहर हो गए। उन्हें सिर्फ एक सीट दी गई थी। 

क्यों DMK सहयोगियों पर नरम नहीं है?

DMK की योजना, 175 सीटों पर चुनाव लड़ने की है। अगर चुनाव में जीत मिली तो बहुमत अपने दम पर आ सकती है। खेल बिगड़ा तो कांग्रेस है ही। छोटे दलों को भी  अब DMK बहुत बातचीत का मौका नहीं देती है। सहयोगियों पर निर्भरता से स्टालिन को एतराज है।

कांग्रेस को ज्यादा सीटें क्यों नहीं?

DMK छोटे दलों पर इसलिए भरोसा जताती है क्योंकि इनके पास अपने-अपने समुदाय का वोट है। सहयोगियों की सीटों पर गठबंध को बढ़त मिलती है, राज्य स्तर पर डीएमके को बढ़त मिलती है। कांग्रेस के पा अपना जनाधार कम है। कांग्रेस डीएमके की निर्भरता पर ही टिकी है। डीएमके यह मानने लगी है कि कांग्रेस NDA गठबंधन का साथ दे नहीं सकती है। ऐसे में कांग्रेस पास समर्थन देने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। डीएमके इसी वजह से मनमाने तरीके से गठबंधन की शर्तें तय करती है। कांग्रेस राष्ट्रीय पार्टी तो है लेकिन तमिलनाडु में 'छोटे भाई' की भूमिका में है। एमके स्टालिन, राहुल गांधी को छोटा भाई, राहुल गांधी स्टालिन को 'बड़ा भाई' बता चुके हैं।

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और कहां फंस जाती है बात?

कांग्रेस, ज्यादा सीटें मांगती है, DMK तैयार नहीं होती है। छोटे दल, डीएमके साथ देने के लिए तैयार हो जाते हैं, क्योंकि उन्हें सत्ता में हिस्सेदारी मिल जाती है। वे चुनौती तो नहीं दे पाते, सहयोगी की भूमिका में रहते है। DMK की विचारधारा के करीब, तमिलनाडु में स्थानीय दल हैं। सामाजिक न्याय, द्रविड़ राजनीति और राज्य की स्वायत्तता के मुद्दे पर वैचारिक एकता है। कांग्रेस और डीएमकी राजनीति काफी अलग है। 
 
कांग्रेस, केंद्रीय और राष्ट्रीय मुद्दों पर कई बार सरकार के फैसलों के साथ दिख जाती है। तमिलनाडु की स्थानीय पार्टियां, जो एनडीए के खिलाफ हैं, वे दूर-दूर तक केंद्र के साथ नहीं होती हैं। दिल्ली के हस्तक्षेप के खिलाफ इन दलों की आवाज हमेशा मुखर रहती है। यही तालमेल, डीएमके के पक्ष में जाता है। 

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छोटे दलों को साधती क्यों है DMK?

DMK, छोटे दलों की कीमत जानती है। अगर ये दल, अकेले लड़े तो DMK के 2 से 3 फीसदी वोट काट सकते हैं। यही वजह है कि मक्कल निधि मय्यम के अध्यक्ष कमल हासन को स्टालिन, राज्यसभा भेज देते हैं। छोटे दल, राज्य में सत्ता विरोधी दल को खारिज करने में सफल रहते हैं। DMK का छोटे दलों पर भरोसा जोखिम करना है। अगर कांग्रेस को बड़ा मौका दिया तो ऐसा भी हो सकता है कि कांग्रेस अपना प्रभाव तमिलनाडु में और बढ़ाए। अगर कांग्रेस का जनाधार बढ़ा तो डीएमके का खिसकेगा। DMK के अध्यक्ष स्टालिन यह जानते हैं कि कांग्रेस के साथ गठबंधन में रहने में फायदा है लेकिन बड़ी भूमिका देना, अपनी पार्टी को कमजोर करने जैसा है।  


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