तमिलनाडु की राजनीति में सामाजिक कल्याण के नाम पर फ्री में पैसा और सामान बांटना दशकों पुरानी परंपरा रही है। पार्टियां चुनाव से पहले वादा करती हैं कि अगर वह सत्ता में आई तो वह जनता को क्या-क्या फ्री में देंगी। सरकार बनने के बाद जनता पर उन्हीं के टैक्स का पैसा लुटाया जाता है लेकिन इससे राज्य के आर्थिक विकास पर भी असर पड़ता है। यह परंपरा तमिलनाडु में 1950-1960 के दशक से चली आ रही है। तमिलनाडु में एक बार फिर चुनावी संग्राम छिड़ा हुआ है और सभी राजनीति पार्टियों में होड़ लगी है कि कौन क्या फ्री में देने का वादा करता है।
तमिलनाडु की राजनीति की एक खास बात यह भी रही है कि फ्री के वादे एक पार्टी करती है। सत्ता में आने के बाद वादा पूरा भी करती है। पांच साल बाद जब सत्ता परिवर्तन होता है तो दूसरी पार्टी आकर पहली सरकार की योजना को जारी रखती है और उन्होंने जो फ्री में देने का वादा किया था उसको भी पूरा करने की कोशिश करती है। यह परंपरा पूर्व मुख्यमंत्री के. कामराज और एमजी रामचंद्रन से शुरू होकर एम के स्टालिन तक पहुंच गई है।
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क्या-क्या मिलता है मुफ्त?
तमिलनाडु में सरकारें बदलती गईं लेकिन फ्री की योजनाएं जारी रहीं। जनता को मुफ्त में मिक्सर, ग्राइंडर, टेबल फैन, फ्रिज और अन्य सामान दिया जाता है। इसके अलावा कई ऐसी योजनाएं हैं जिनके जरिए जनता को सीधा लाभ देने की कोशिश की जाती है।
तमिलनाडु में सत्तारूढ़ DMK सरकार पहले ही 1.37 करोड़ से ज्यादा महिलाओं को हर महीने 1000 रुपये दे रही है। नए घोषणापत्र में इसे बढ़ाकर 2000 रुपये का वादा किया गया है। छात्राओं को हायर एजुकेशन के लिए हर महीने 1 हजार रुपये मिलते हैं जिन्हें बढ़ाकर 1500 करने का वादा DMK ने किया है। इसके साथ ही 20 लाख से ज्यादा किसान फ्री बिजली का लाभ उठा रहे हैं।
सरकार पर कितना बोझ?
टैक्स के पैसे से सरकार को सामाजिक कल्याण के साथ-साथ राज्य के विकास के लिए निवेश भी करना होता है। नए संस्थान, स्कूल, कॉलेज, सड़कें, अस्पताल और अन्य परियोजनाओं के लिए पैसा देना होता है। ऐसे में जब सरकार कल्याणकारी योजनाओं और फ्री के वादे पूरे करने में पैसा खर्च करती है तो अन्य परियोजनाओं को खर्चों में कटौती करनी पड़ती है।
'कलाईनार मगलीर उरिमाई योजना' के मौजूदा समय में राज्य सरकार हर महीने 1000 रुपये महिलाओं को दे रही है। इस योजना पर सालान योजना पर सालाना लगभग 12,000 से 13,720 करोड़ रुपये का खर्च आता है। अगर सरकार ने यह राशि 1500 रुपये कर दी तो राज्य सरकार पर सीधा 6 हजार करोड़ का बोझ बढ़ जाएगा।
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लगातार बढ़ रहा कर्ज
इसके साथ ही सरकार घरेलू उपभोक्ताओं को बिजली सब्सिडी देती है। इसके लिए सालान 7500 करोड़ रुपये खर्च किए जाते हैं। भारी सब्सिडी के कारण तमिलनाडु का राजस्व घाटा 2025-26 में लगभग 41,635 करोड़ रुपये रहने का अनुमान है। राज्य का कुल बकाया कर्ज 8 लाख करोड़ रुपये से ऊपर जा चुका है। ऐसे में सभी राजनीतिक दल जब चुनाव बाद फ्री में योजनाएं चलाने, कूपन, सामान और पैसा देने का वादा कर रहे हैं तो सरकार पर आने वाले दिनों में वजन बढ़ना तय है।