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तमिलनाडु चुनाव से पहले क्यों गूंज रहा है चंदन तस्कर वीरप्पन का नाम? जानिए

तमिलनाडु के विधानसभा चुनाव में चंदन तस्कर वीरप्पन की पत्नी और बेटी भी बतौर उम्मीदवार खड़ी हैं। वीरप्पन को तमिलनाडु पुलिस ने 2004 में मार गिराया था।

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वीरप्पन और विघारानी Photo Credit- Social media

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तमिलनाडु के विधानसभा चुनाव का शंखनाद हो चुका है। यहां 23 अप्रैल को वोटर्स वोट देने वाले हैं। इसी बीच तमिलनाडु का चंदन तस्कर डाकू वीरप्पन का नाम चर्चा के केंद्र में है क्योंकि वीरप्पन की बेटी विघारानी और पत्नी मुतुलक्ष्मी चुनाव में खड़ी हैं। ये दोनों ही तमिलर काची पार्टी से चुनाव में उतरी हैं। जहां एक तरफ वीरप्पन की बेटी विघारानी मेट्टूर सीट से चुनाव लड़ रही हैं, वहीं दूसरी तरफ मुतुलक्ष्मी कृष्णागिरी से तामिलागा वाझवुरिमाई काची सीट पर उम्मीदवार के तौर पर खड़ी हैं।

 

वीरप्पन एक समय में कुख्यात चंदन तस्कर थे, जिन्होंने तमिलनाडु के जंगलों से चंदन की लकड़ियां काटकर अवैध रूप से बेचा था। इन्हीं अपराधों को रोकने के लिए पुलिस ने साल 2004 में वीरप्पन को मार गिराया था। अब सवाल उठता है कि क्या वीरप्पन की बेटी और पत्नी की वही छवि है जो वीरप्पन की थी। साथ ही यह भी सवाल है कि क्या विघारानी और मुतुलक्ष्मी पहले भी चुनावी मैदान में उतर चुकी हैं।

 

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विघारानी और मुतुलक्ष्मी का राजनीतिक सफर

विघारानी ने वकालत की पढ़ाई की है। उन्होंने कई साल वकील और एक्टिविस्ट के तौर पर काम किया है। इसके बाद साल 2020 में बीजेपी में शामिल हुई थीं, जहां उन्होंने यूथ ब्रिगेड की उपाध्यक्ष के तौर पर काम किया। इसके बाद वह 2024 में नाम तमिलर काची पार्टी में शामिल हुईं, जो कि निर्देशक और एक्टर सीमान की पार्टी है। 2024 में विघारानी ने लोकसभा चुनाव में कृष्णागिरी से चुनाव लड़ा था। राजनीति से पहले उन्होंने कई साल वकील और एक्टिविस्ट के तौर पर काम किया। एक्टिविस्ट के रूप में उन्होंने आदिवासी और दलित लोगों के अधिकारों के लिए काम किया है।

 

मुतुलक्ष्मी साल 2006 में निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ चुकी हैं। 2026 के विधानसभा चुनाव में मुतुलक्ष्मी खुद की छवि वीरप्पन जैसी बनाने में जुटी हैं। उनका मानना है कि वीरप्पन एक अच्छे व्यक्ति थे और उनकी डाकू वाली छवि बनाई गई थी।

 

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विघारानी  का वीरप्पन के प्रति क्या है विचार?

विघारानी और मुतुलक्ष्मी ने चुनावी रैलियों में कहा है कि वीरप्पन ने अपने पूरे जीवनकाल में लोगों की मदद की और अन्याय के खिलाफ लड़ाई लड़ी। इसके अलावा विघारानी ने कहा है  अगर उनके पिता वीरप्पन जिंदा होते, तो लोकतंत्र को बढ़ावा देने के लिए राजनीति के मैदान में जरूर आते। इन बयानों और भाषणों को देखते हुए कई राजनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार, विघारानी अपने पिता की सकारात्मक छवि बनाकर चुनाव जीतना चाह रही हैं।


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