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क्या 'नथिंग टू लूज' से इंस्पायर है सनी देओल की 'इक्का'?

सनी देओल की 'इक्का' नेटफ्लिक्स पर रिलीज हो गई है। लोग इस फिल्म को फ्रेंच मूवी 'नथिंग टू लूज' से इंस्पायर बता रहे हैं। आइए जानते हैं दोनों में क्या कॉमन है?

ikka and nothing to loose screen grab

'इक्का' और 'नथिंग टू लूज' सीन स्क्रीन ग्रैब, Photo Credit: Social media

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नेटफ्लिक्स पर 8 जुलाई को फ्रेंच फिल्म 'नथिंग टू लूज' रिलीज हुई थी। यह क्राइम ऐक्शन ड्रामा फिल्म है। 2 दिन बाद सनी देओल की फिल्म 'इक्का' रिलीज हुई थी। सोशल मीडिया पर लोगों को दावा है कि इन दोनों फिल्म का प्लॉट एक जैसा ही है। कुछ लोगों का कहना है कि सनी देओल की 'इक्का' फ्रेंच फिल्म से प्रेरित हैं। आइए जानते हैं क्या इन दोनों फिल्मों में क्या कॉमन और कौन सी ज्यादा बेहतर है?

 

'नथिंग टू लूज' और 'इक्का' का प्लॉट ल्यूकेमिया यानी ब्लड कैंसर और डोनर की तलाश पर आधारित है। दोनों ही फिल्मों में बच्चे की जान बचाने के लिए एक कम्पैटिबल डोनर की तलाश की जाती है। दोनों में माता पिता अपने बच्चे की जान बचाने के लिए किसी भी हद को पार कर सकते हैं। 'इक्का' में सनी देओल ने ईमानदार वकील अर्जुन मेहरा का रोल निभाया है जो अपनी बेटी की जान को बचाने के लिए अपने उसूलों को दांव पर लगा देता है। जबकि 'नथिंग टू लूज' में मां (जेड) अपने बेटे को बचाने के लिए सिस्टम के खिलाफ चल जाती हैं। 

 

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'नथिंग टू लूज' और 'इक्का' में क्या है अंतर?

इक्का

इस फिल्म में सनी देओल के साथ अक्षय खन्ना और तिलोत्तमा शोम मुख्य भूमिका में हैं। यह एक कोर्ट रूम ड्रामा है। फिल्म में अर्जुन मेहरा (सनी देओल) एक 

ईमानदार वकील है जिसने उसूलों के साथ अपना हर केस लड़ा और जीता है। उसे लोग इक्का बुलाते हैं। अर्जुन को पता चलता है कि उसकी बेटी को ब्लड कैंसर है। उसकी बेटी की जान उसका असली पिता अक्षय खन्ना बचा सकता है जिस पर मर्डर और रेप का आरोप है। सनी को अक्षय को उस केस से बचाना है तभी वह उसकी बेटी को अपना बोन मेरो देगा।

 

 

अश्रय खन्ना ने नेगेटिव रोल प्ले किया है। फिल्म में सरकारी वकील मधुरिमा बनर्जी का रोल तिलोत्तमा शोम ने निभाया है। फिल्म के आखिर में आपको सस्पेंस देखने को मिलेगा?

 

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नथिंग टू लूज

'नथिंग टू लूज' एक मां की दर्दभरी भावनात्मक कहानी है। जेड (नावेल मदानी) ने एक मुक्केबाजी ट्रेनर और मां के रूप में दिल दहला देने वाली परफॉर्मेंस दी है। जेड लंबे समय से अपने पार्टनर के साथ मां बनने को कोशिश करती है लेकिन नहीं होता पाता है। वह बाद में एम्बियो डोनेशन कराती हैं और एक बेटे की सिंगल मदर बनती है। उसकी खुशी तब तक दुख में बदल जाती है जब उसे पता चलका है कि उसके बेटे को ब्लड कैंसर है। 

 

 

ब्लड कैंसर का सिर्फ एक ही इलाज बोन मेरो ट्रांसप्लाट है। वह अपने बेटे को बचाने के लिए एक अस्पताल के पीडियाट्रिक विंग को बंधक बना लेती है ताकि सरकार उसके बेटे के लिए बोन मेरो ढूंढने में मदद करें। एक मां अपने बेटे को बचाने के लिए हर हद पार कर देती है। यह फिल्म बहुत इमोशनल है। 


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